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Shrimad Bhagvad Gita Chapter 6

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Bhagvad Gita Aatm sanyam yog chapter 6

 

 

 

आत्मसंयमयोग / ध्यान योग ~  छठा अध्याय

01-04 कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ के लक्षण, काम-संकल्प-त्याग कामहत्व

05-10 आत्म-उद्धार की प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण एवं एकांतसाधना का महत्व

11-15 आसन विधि, परमात्मा का ध्यान, योगी के चार प्रकार

16-32 विस्तार से ध्यान योग का विषय

33-36 मन के निग्रह का विषय

37-47 योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

 

 

आत्मसंयमयोग ~ छठा अध्याय

 

01-04 कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ के लक्षण, काम-संकल्प-त्याग का महत्व

 

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ৷৷6.1৷৷

 

श्रीभगवानुवाच–परम् भगवान ने कहा; अनाश्रितः-आश्रय न लेकर; कर्मफलं-कर्मफल; कार्यम्-कर्त्तव्य; कर्म-कार्यः करोति-निष्पादन; यः-वह जो; सः-वह व्यक्ति; संन्यासी-संसार से वैराग्य लेने वाला; च-और; योगी-योगी; च-और; न -नहीं; निः-रहित; अग्नि:-आग; न-नहीं; च-भी; अक्रियः-निष्क्रिय।।

 

परम प्रभु ने कहा! वे मनुष्य जो कर्मफल की कामना से रहित होकर अपने नियत कर्मों का पालन करते हैं वे वास्तव में संन्यासी और योगी होते हैं, न कि वे जो अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न नहीं करते अर्थात अग्नि नहीं जलाते और शारीरिक कर्म नहीं करते अर्थात केवल अग्नि का त्याग करने वाला ही संन्यासी नहीं कहलाता है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला ही योगी नहीं है। ৷৷6.1৷৷

 

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन ৷৷6.2৷৷

 

यम्-जिसे; संन्यासम्-वैराग्य; इति–इस प्रकार; प्राहुः-वे कहते हैं; योगम् -योग; तम्-उसे; विद्धि-जानो; पाण्डव-पाण्डुपुत्र, अर्जुन; न कभी नहीं; हि-निश्चय ही; असंन्यस्त-त्याग किए बिना; सङ्कल्पः-इच्छा; योगी-योगी; भवति–होता है; कश्चन-कोई;

 

हे अर्जुन! जिसे संन्यास के रूप में जाना जाता है अर्थात जिसको संन्यास कहते हैं उसी को तू योग जान । कोई भी सांसारिक कामनाओं का त्याग किए बिना निश्चित रूप से योगी या संन्यासी नहीं बन सकता ৷৷6.2৷৷

 

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ৷৷6.3৷৷

 

आरूरूक्षो:- जिसने योग सीखना आरम्भ किया है ; मुने:-मुनि की; योगम्-योगः कर्म – बिना आसक्ति के कार्य करना; कारणम्-कारण; उच्यते-कहा जाता है; योगारूढस्य-योग में सिद्धि प्राप्त; तस्य-उसका; एव-निश्चय ही; शमः- सम्पूर्ण भौतिक कार्य कलापों का त्याग ; कारणम्-कारण; उच्यते-कहा जाता है।

 

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले ( जिसने योग सीखना प्रारम्भ किया है ) अर्थात योग में पूर्णता की अभिलाषा करने वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना या बिना आसक्ति के कर्म करना ही हेतु या साधन कहलाता है और योगारूढ़ हो जाने पर अर्थात वे योगी जिन्हें पहले से योग में सिद्धि प्राप्त है उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों ( सभी भौतिक इच्छाओं और भौतिक कार्य कलापों तथा सभी प्रकार के कर्म फलों की इच्छाओं ) का अभाव है , वही कल्याण में या साधना में परम शान्ति का साधन कहा जाता है ৷৷6.3৷৷

( परमेश्र्वर से युक्त होने की विधि योग कहलाती है ।)

 

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ৷৷6.4৷৷

 

यदा-जब; हि-निश्चय ही; न-नहीं; इन्द्रिय अर्थेषु- इन्द्रिय विषयों के लिए; न- कभी नहीं; कर्मसु-कर्म करना; अनुषज्जते-आसक्ति होना; सर्व-सङ्कल्प-सभी प्रकार के कर्म फलों की कामना करना; संन्यासी-वैरागी; योग आरूढ:-योग विज्ञान में उन्नत; तदा-उस समय; उच्यते-कहा जाता है।

 

जब कोई मनुष्य न तो इन्द्रिय विषयों और भोगों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है और सभी प्रकार के कर्म फलों की सभी इच्छाओं का त्याग कर देता है ऐसे वैरागी तथा सन्यासी मनुष्य को योग मार्ग में आरूढ़ योगी कहा जाता है ৷৷6.4৷৷

 

05-10 आत्म-उद्धार की प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण एवं एकांतसाधना का महत्व

 

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ৷৷6.5৷৷

 

उद्धरेत्-उत्थान; आत्मना-मन द्वारा; आत्मानम्-जीव; न-नहीं; आत्मानम्-जीव; अवसादयेत्-पतन होना; आत्मा-मन; एव–निश्चय ही; हि-वास्तव में; आत्मनः-जीव का; बन्धुः-मित्र; आत्मा-मन; एव-निश्चय ही; रिपुः-शत्रु; आत्मनः-जीव का।

 

मन की शक्ति द्वारा अपना आत्म उत्थान करो और स्वयं का पतन न होने दो क्योंकि यह मन ही निश्चित रूप से जीवात्मा का मित्र भी है और शत्रु भी ৷৷6.5৷৷

( मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का भी कारण है | इन्द्रियविषयों में लीन मन बन्धन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का कारण है। अतः जो मन निरन्तर परमात्मा में लगा रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है) 

 

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ৷৷6.6৷৷

 

बन्धुः-मित्र; आत्मा–मन; आत्मनः-उस व्यक्ति के लिए; तस्य-उसका; येन-जिसने; आत्मा-मन; एव–निश्चय ही; आत्मना-जीवात्मा के लिए; जित:-विजेता; अनात्मनः-जो मन को वश नहीं कर सका; तु-लेकिन; शत्रुत्वे-शत्रुता का; वर्तेत – बना रहता है; आत्मा-मन; एव-जैसे; शत्रुवत्-शत्रु के समान।

 

जिन्होंने अपने मन पर विजय पा ली है, उनके लिए उनका मन उनका सबसे अच्छा मित्र है किन्तु जो ऐसा करने में असफल होते हैं उनका मन उनके शत्रु के समान कार्य करता है ৷৷6.6৷৷

( मन को वश में किये बिना योगाभ्यास करना मात्र समय को नष्ट करना है । किन्तु जब मन पर विजय प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य इच्छानुसार उस भगवान् की आज्ञा का पालन करता है जो सभी के हृदय में परमात्मास्वरूप स्थित है | वास्तविक योगाभ्यास हृदय के भीतर परमात्मा से भेंट करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना है । जो व्यक्ति साक्षात् प्रभु के प्रति समर्पण और भक्ति स्वीकार करता है वह भगवान् की आज्ञा के प्रति स्वतः समर्पित हो जाता है । )

 

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ৷৷6.7৷৷

 

जित आत्मन:-जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली हो; प्रशान्तस्य–शान्ति; परम आत्मा-परमात्मा; समाहितः-दृढ़ संकल्प से; शीत-सर्दी; उष्ण-गर्मी में; सुख-सुख, दुःखेषु – और दुख में; तथा -भी; मान-सम्मान; अपमानयोः-और अपमान।

 

वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है अर्थात जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं , वे शीत-ताप, सुख-दुख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। अर्थात जिसने मन को जीत लिया है और अपने आप पर विजय प्राप्त कर ली , उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे मनुष्य के लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं या ऐसा मनुष्य सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान में एक समान ही रहता है ৷৷6.7৷৷

( ऐसे योगी शान्त रहते हैं और भगवान की भक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा अटल होती है अर्थात ऐसे स्वाधीन आत्मावाले ( जिसका मन उसके अधीन है ) पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा स्थित होते हैं तथा उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं।)

 

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ৷৷6.8৷৷

 

ज्ञान- अर्जित ज्ञान; विज्ञान-आंतरिक ज्ञान या अनुभूत ज्ञान ; तृप्त आत्मा -पूर्णतया संतुष्ट मनुष्य; कूटस्थ:- आध्यात्मिक रूप से स्थित ; विजित इन्द्रियः-इन्द्रियों को वश में करने वाला; युक्तः- भगवान से निरन्तर साक्षात्कार करने वाला; इति–इस प्रकार; उच्यते- कहा जाता है; योगी- योगी; सम- समदर्शी; लोष्ट्र- कंकड़; अश्म- पत्थर; काञ्चनः- स्वर्ण;

 

वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है । ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है । वह सभी परिस्थितियों में अविचलित रहता है। वह सभी वस्तुओं को – चाहे वे कंकड़ हो , पत्थर हो या सोना हो  – एक समान देखता है ৷৷6.8৷৷

( जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है अर्थात जो आध्यात्मिक रूप से स्थित है , जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए कंकड़ , पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी भगवत्प्राप्त अर्थात भगवान् से निरंतर साक्षात्कार करने वाला है॥)

 

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ৷৷6.9৷৷

 

सुहत्-शुभ चिन्तक के प्रति; मित्र-मित्र; अरि-शत्रु; उदासीन-तटस्थ व्यक्ति; मध्यस्थ-मध्यस्थता करना; द्वेष्य – ईर्ष्यालु, बन्धुषु-संबंधियों; साधुषु-पुण्य आत्माएँ; अपि-उसी प्रकार से; च-तथा; पापेषु–पापियों के; सम-बुद्धिः-निष्पक्ष बुद्धि वाला; विशिष्यते-श्रेष्ठ हैं;

 

योगी शुभ चिन्तकों, मित्रों, शत्रुओं , पुण्यात्माओं और पापियों को निष्पक्ष होकर समान भाव से देखते हैं। इस प्रकार जो योगी मित्र, सहयोगी, शत्रु को समदृष्टि से देखते हैं और शत्रुओं एवं सगे संबंधियों के प्रति तटस्थ रहते हैं तथा पुण्यात्माओं और पापियों के बीच निष्पक्ष रहते हैं, वे मनुष्यों के मध्य विशिष्ट माने जाते हैं ৷৷6.9৷৷

 

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ৷৷6.10৷৷

 

योगी-योगी; युञ्जीत–साधना में लीन रहना; सततम्-निरन्तर; आत्मानम्-स्वयं; रहसि-एकान्त वास में; स्थित-रहकर; एकाकी-अकेला; यत चित्त आत्मा-नियंत्रित मन और शरीर के साथ; निराशी:-कामना रहित; अपरिग्रहः-सुखों का संग्रह करने की भावना से रहित।

 

योग की अवस्था प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान में रहें और मन एवं इन्द्रियों सहित शरीर को नियंत्रित कर निरन्तर भगवान के चिन्तन में लीन रहें तथा समस्त कामनाओं और सुखों का संग्रह करने से मुक्त रहें ৷৷ 6.10 ৷৷

 

आसन विधि, परमात्मा का ध्यान, योगी के चार प्रकार

 

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌ ৷৷6.11৷৷

 

शुचौ-स्वच्छ; देशे-स्थान; प्रतिष्ठाप्य-स्थापित करके; स्थिरम्-स्थिर; आसनम्-आसन; आत्मनः-जीव का; न-नहीं; अति-अधिक; उच्छ्रितम्-ऊँचा; न-न; अति-अधिक; नीचम्-निम्न; चैल–वस्त्र; अजिन-मृगछाला; कुश-घास; उत्तरम्-मृगछला से ढक कर;

 

योगाभ्यास के लिए स्वच्छ स्थान पर या शुद्ध भूमि पर कुशा बिछाकर उसे मृगछाला से ढककर उसके ऊपर वस्त्र बिछाना चाहिए। आसन बहुत ऊँचा या नीचा नहीं होना चाहिए ৷৷6.11৷৷

 

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ৷৷6.12৷৷

 

तत्रै-वहाँ; एकाग्रम्- एक बिन्दु पर केन्द्रित; मनः-मन; कृत्वा-करके; यतचित्ते–मन पर नियंत्रण; इन्द्रिय-इन्द्रियाँ; क्रियः-गतिविधि; उपविश्या-स्थिर होकर बैठना; आसने-आसन पर; युञ्जयात् योगम्-योग के अभ्यास के लिए प्रयास; आत्मविशुद्धये-मन का शुद्धिकरण।

 

उस आसन पर स्थिर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अर्थात एक बिंदु पर केंद्रित कर के अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे॥12॥

 

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ ৷৷6.13৷৷

 

समम्– सीधा; काय– शरीर; शिरः– सिर; ग्रीवम्– तथा गर्दन को; धारयन्– रखते हुए; अचलम्– अचल; स्थिरः– शान्त; सम्प्रेक्ष्य– देखकर; नासिका– नाक के; अग्रम्– अग्रभाग को; स्वम्– अपनी; दिशः– सभी दिशाओं में; च– भी; अनवलोकयन्– न देखते हुए; 

 

योगाभ्यास करने वाले को चाहिए कि शरीर , सिर और गर्दन को सीधा एवं अचल रख के स्थिर होकर, अन्य दिशाओं की ओर न देख कर अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाये ॥6.13॥

 

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ৷৷6.14৷৷

 

प्रशान्त-शान्त; आत्मा-मन; विगतभी:-भय रहित; ब्रह्मचारिव्रते-ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा; स्थित:-स्थित; मन:-मन को; संयम्य-नियंत्रित करना; मत् चित्तः-मन को मुझ में केन्द्रित करना; युक्तः-तल्लीन; आसीत-बैठना; मत् परः-मुझे परम लक्ष्य मानना।

 

इस प्रकार शांत, भयरहित और अविचलित मन से ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा में निष्ठ होकर भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाले सावधान और प्रबुद्ध योगी को मन से मेरा चिन्तन करना और केवल मुझे ही अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए ৷৷6.14৷৷

 

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ৷৷6.15৷৷

 

युज्जन्–मन को भगवान में तल्लीन करना; एवम्-इस प्रकार से; सदा-निरन्तर; आत्मानम्-मन; योगी-योगी; नियत-मानसः-संयमित मन वाला; शान्तिम्-शान्ति; निर्वाण-भौतिक बन्धनों से मुक्ति; परमाम्-परमानंद; मत्-संस्थाम्-मुझमें स्थित होना; अधिगच्छति-प्राप्त करना।

 

इस प्रकार मन को संयमित रखने वाला योगी मन को निरन्तर मुझमें तल्लीन कर निर्वाण ( मोक्ष अर्थात भौतिक बंधनों से मुक्ति ) प्राप्त करता है और मुझ में स्थित होकर परमानन्द की पराकाष्ठारूप परम शांति पाता है ৷৷6.15৷৷

 

विस्तार से ध्यान योग का विषय

 

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ৷৷6.16৷৷

 

न-कभी नहीं; अति-अधिक; अश्नतः-खाने वाले का; तु-लेकिन; योग:-योग; अस्ति–है; न-न तो; च-भी; एकान्तम्-नितान्त; अनश्नतः-भोजन न करने वाले का; न- न तो; च-भी; अति-अत्यधिक; स्वप्न-शीलस्य–सोने वाले का; जागृतः-जो पर्याप्त नींद नहीं लेता; न-नहीं; एव-ही; च-और; अर्जुन-अर्जुन।

 

हे अर्जुन! जो लोग बहुत अधिक भोजन ग्रहण करते हैं या अल्प भोजन ग्रहण करते हैं, बहुत अधिक नींद या कम नींद लेते हैं, वे योग में सफल नहीं हो सकते ৷৷6.16৷৷

 

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ৷৷6.17৷৷

 

युक्त- सामान्य; आहार- भोजन ग्रहण करना; विहारस्य– मनोरंजन; युक्तचेष्टस्यकर्मसु – कार्यों में संतुलन; युक्त- संयमित; स्वप्न-अवबोधस्य– सुप्त और जागरण अवस्था; योगः- योगः भवति– होता है; दु:खहा- कष्टों का विनाश करने वाला।

 

जो आहार और आमोद-प्रमोद को संयमित रखते हैं, कर्म को संतुलित रखते हैं और निद्रा पर नियंत्रण रखते हैं अर्थात यथायोग्य सोने तथा जागने वाले हैं , वे योग का अभ्यास कर अपने दुखों को कम कर सकते हैं  अर्थात उनका ही योग सिद्ध होता है ৷৷6.17৷৷

 

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ৷৷6.18৷৷

 

यदा-जब; विनियतम् – पूर्ण नियंत्रित; चित्तम्–मन; आत्मनि-आत्मा का; एव-निश्चय ही; अवतिष्ठते-स्थित होना; निस्पृह-लालसा रहित; सर्व-सभी प्रकार से; कामेभ्यः-इन्द्रिय तृप्ति की लालसा; तृप्तिः-योग में पूर्णतया स्थित; इति–इस प्रकार से; उच्यते-कहा जाता है; तदा-उस समय।

 

पूर्ण रूप से अनुशासित और नियंत्रित होकर जो अपने मन को स्वार्थों एवं लालसाओं से हटाना सीख लेते हैं और इसे अपनी आत्मा के सर्वोत्कृष्ट लाभ में लगा देते हैं अर्थात अत्यन्त वश में किया हुआ जिनका चित्त जिस समय परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है ऐसे मनुष्यों को उस समय योग में पूर्णतया स्थित या योगयुक्त कहा जाता है ऐसे योगी सभी प्रकार की इन्द्रिय लालसाओं और सभी प्रकार के विषय भोगों से मुक्त होते हैं ৷৷ 6.18 ৷৷

 

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ৷৷6.19৷৷

 

यथा-जैसे; दीपः-दीपक; निवातस्थ:-वायुरहित स्थान में; न-नहीं; इङ्गते–हिलना डुलना; सा-यह; उपमा-तुलना; स्मृता-मानी जाती है; योगिनः-योगी की; यतचित्तस्य–जिसका मन नियंत्रण में है; युञ्जतः-दृढ़ अनुपालन; योगम्-ध्यान में; आत्मन:-परम भगवान में।

 

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक की ज्योति हिलती डुलती नहीं है अर्थात स्थिर रहती है उसी प्रकार से संयमित मन वाला योगी अर्थात जिसका मन और इन्द्रियाँ उसके वश में या नियंत्रण में हैं , सदैव आत्म चिन्तन अर्थात आत्म तत्व या परमात्मा के ध्यान में स्थिर रहता है ৷৷ 6.19 ৷৷

 

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ৷৷6.20৷৷

 

यत्र-जैसे; उपरमते-आंतरिक सुख की अनुभूति; चित्तम्-मन; निरूद्धम्-हटाना; योगसेवया- योग के अभ्यास द्वारा; यत्र-जब; च-भी; एव-निश्चय ही; आत्मना-शुद्ध मन के साथ; आत्मानम्-आत्मा; आत्मनि-अपने में; तुष्यति-संतुष्ट हो जाना;

 

जब योग के अभ्यास के द्वारा मन भौतिक क्रियाओं से दूर हट कर स्थिर हो जाता है तब निश्चित रूप से योगी शुद्ध मन से आत्म-तत्त्व को देख सकता है और आंतरिक आनन्द में मगन हो जाता है अर्थात परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है ৷৷6.20৷৷

( योगाभ्यास की शक्ति से वायु रहित स्थान में रखे हुए दीपक की भाँति एकाग्र किया हुआ तथा योगसाधन से वश में किया हुआ चञ्चलता रहित चित्त जिस समय उपरत होता है उस काल में योगी समाधि द्वारा अति निर्मल अन्तःकरण से परम चैतन्य ज्योतिःस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार करता हुआ स्वयं अपने-आप से अपने-आप को देखता हुआ अपने आप में ही संतुष्ट हो जाता है। )

 

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌ ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ৷৷6.21৷৷

 

सुखम्-सुख; आत्यन्तिकम्-असीम; यत्-जो; तत्-वह; बुद्धि-बुद्धि द्वारा; ग्राह्मम्-ग्रहण करना; अतीन्द्रियम्-इन्द्रियातीत; वेत्ति-जानता है; यत्र-जिसमें; न- कभी नहीं; च -और; एव–निश्चय ही; अयम्-वह; स्थितः-स्थित; चलति–विपथ न होना; तत्त्वतः-परम सत्य से;

 

योग में चरम आनन्द की या सिद्धि की अवस्था अवस्था को समाधि कहते हैं जिसमें मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक और  मानसिक क्रियाओं से पूर्णतया संयमित हो जाता है तथा वह असीम दिव्य आनन्द प्राप्त करता है जो इन्द्रियों से परे है अर्थात विषयजनित सुख नहीं है और जो केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य अनन्त आनन्द है , ऐसे आनंद को अपने स्वरूप में स्थित हुआ योगी जिस काल में अनुभव कर लेता है फिर वह उस तत्त्व से और उसके  वास्तविक स्वरूप से कभी  विचलित नहीं होता अर्थात ऐसे सुख में स्थित हुआ ज्ञानी परम सत्य के पथ से विपथ नहीं होता। ऐसी सिद्धि की अवस्था में जीव शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आप में आनन्द उठा सकता है |  ৷৷6.21৷৷

 

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ৷৷6.22৷৷

 

यम्-जिसे; लब्ध्वा–प्राप्त कर; च – और; अपरम्-अन्य कोई; लाभम् – लाभ; मन्यते–मानता है; न–कभी नहीं; अधिकम्-अधिक; ततः-उससे; यस्मिन्-जिसमें; स्थित:-स्थित होकर; न – कभी नहीं; दुःखेन-दुखों से; गुरूणा-बड़ी; अपि-से; विचाल्यते-विचलित होना;

 

ऐसी अवस्था प्राप्त कर कोई और कुछ श्रेष्ठ पाने की इच्छा नहीं करता। ऐसी सिद्धि प्राप्त कर कोई मनुष्य बड़ी से बड़ी आपदाओं में विचलित नहीं होता अर्थात परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और और ऐसी अवस्था प्राप्त कर और कुछ श्रेष्ठ पाने की इच्छा नहीं करता। ऐसी परमात्मा प्राप्ति रूप जिस सिद्ध अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता। जिस लाभ की प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।৷৷6.22৷৷

 

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ৷৷6.23৷৷

 

तम्-उसको; विद्यात्-तुम जानो; दु:ख-संयोग-वियोगम्-वियोग से दुख की अनुभूति; योग-संज्ञितम्-योग के रूप में ज्ञान; निश्चयेन-दृढ़तापूर्वक; योक्तव्यो–अभ्यास करना चाहिए; योग-योग; अनिर्विण्णचेतसा-अविचलित मन के साथ।

 

दुःख या दुःखरूप संसार के संयोग से वियोग की अवस्था को योग के रूप में जाना जाता है। इस योग का दृढ़तापूर्वक दृढसंकल्प के साथ धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निराशा से मुक्त होकर पालन करना चाहिए अर्थात जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है৷৷6.23৷৷

 

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ৷৷6.24৷৷

 

संकल्प-दृढ़ संकल्पः प्रभवान्–उत्पन्न; कामान्–कामना; त्यक्त्वा-त्यागकर; सर्वान् समस्त; अशेषत:-पूर्णतया; मनसा-मन से; एव-निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम्-इन्द्रियों का समूह; विनियम्य-रोक कर; समन्ततः-सभी ओर से।

 

संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर॥6.24॥

 

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ৷৷6.25৷৷

 

शनै:-क्रमिक रूप से; उपरमेत्–शान्ति प्राप्त करना; बुद्धया-बुद्धि से; धृति-गृहीतया ग्रंथों के अनुसार दृढ़ संकल्प से प्राप्त करना; आत्म-संस्थम्-भगवान में स्थित; मन:-मन; कृत्वा-करके; न-नहीं; किञ्चित्-अन्य कुछ; अपि-भी; चिन्तयेत् सोचना

 

क्रमिक रूप से अर्थात धीरे धीरे अभ्यास करता हुआ धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा संसार से विरक्त हो कर , शांति को प्राप्त हो तथा समाधि में स्थित हो कर मन को आत्मा (परमात्मा ) में ही स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे ৷৷6.25৷৷

 

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ৷৷6.26৷৷

 

यतः-यत:-जब भी और जहाँ भी; निश्चरति-भटकने लगे; मन:-मन; चञ्चलम्-बेचैन; अस्थिरम्-अस्थिर; ततः-तत:-वहाँ से; नियम्य-हटाकर; एतत्-इस; आत्मनि-भगवान पर; एव-निश्चय ही; वशम्-नियंत्रण; नयेत्-ले आए।

 

जब और जहाँ भी मन बेचैन और अस्थिर होकर भटकने लगे अर्थात यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरने लगे तब तब उसे उस – उस विषय से खींच कर अर्थात वापस लाकर वश में कर के स्थिर करते हुए बार – बार  भगवान की ओर केन्द्रित करना चाहिए ৷৷6.26৷৷

 

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ৷৷6.27৷৷

 

प्रशान्त-शान्तिप्रियः मनसम्–मन; हि-निश्चय ही; एनम् यह; योगिनम्-योगी; सुखम्-उत्तमम्-परम आनन्द; उपैति-प्राप्त करता है; शान्त-रजसम्–जिसकी कामनाएँ शान्त हो चुकी हैं; ब्रह्म-भूतम्-भगवद् अनुभूति से युक्त; अकल्मषम्-पाप रहित।

 

जिस योगी का मन शांत हो जाता है और जिसकी वासनाएँ वश में हो जाती हैं अर्थात जिसका रजोगुण शांत हो गया है एवं जो निष्पाप है तथा जो प्रत्येक वस्तु का संबंध भगवान के साथ जोड़कर देखता है, ऐसे सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मों के फल से निवृत्त हो जाता है  ৷৷6.27৷৷

 

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ৷৷6.28৷৷

 

युञ्जन्–स्वयं को भगवान में एकीकृत करना; एवम्-इस प्रकार; सदा-सदैव; आत्मानम्-आत्मा; योगी-योगी; विगत-मुक्त रहना; कल्मषः-पाप से; सुखेन-सहजता से; ब्रह्म-संस्पर्शम् निरन्तर ब्रह्म के सम्पर्क में रहकर; अत्यन्तम्-परम; सुखम्-आनन्द; अश्नुते—प्राप्त करना।

 

इस प्रकार आत्म संयमी योगी आत्मा को भगवान में एकीकृत कर भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और निरन्तर परमेश्वर में तल्लीन होकर उसकी दिव्य प्रेममयी भक्ति में परम सुख प्राप्त करता है अर्थात वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है ৷৷6.28৷৷

 

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ৷৷6.29৷৷

 

सर्व-भूत-स्थम्-सभी प्राणियों में स्थित; आत्मानम्-परमात्मा; सर्व-सभी; भूतानि-जीवों को; च–भी; आत्मनि–भगवान में; ईक्षते-देखता है; योग-युक्त-आत्मा अपनी चेतना को भगवान के साथ जोड़ने वाला; सर्वत्र-सभी जगह; सम-दर्शनः-सम दृष्टि।

 

सच्चा योगी अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर समान दृष्टि से सभी जीवों में भगवान और भगवान को सभी जीवों में देखता है अर्थात सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है৷৷6.29৷৷

 

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ৷৷6.30৷৷

 

यः-जो; माम्-मुझे; पश्यति-देखता है; सर्वत्र-सभी जगह; सर्वम्-प्रत्येक पदार्थ में; च और; मयि–मुझमें; पश्यति-देखता है; तस्य-उसके लिए; अहम्-मैं; न-नहीं; प्रणश्यामि-अप्रकट होता हूँ; सः-वह; च-और; मे मेरे लिए; न-नहीं; प्रणश्यति–अदृश्य होता है।

 

वे जो मुझे सर्वत्र और प्रत्येक वस्तु में देखते हैं अर्थात जो सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ৷৷6.30৷৷

 

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ৷৷6.31৷৷

 

सर्व-भूत-सभी जीवों में स्थित; यः-जो; माम्-मुझको; भजति–आराधना करता है; एकत्वम्-एकीकृत; अस्थितः-विकसित; सर्वथा-सभी प्रकार से; वर्तमान:-करता हुआ; अपि-भी; सः-सह; योगी-योगी; मयि–मुझमें; वर्तते-निवास करता है।

 

जो योगी मुझमें एकनिष्ठ हो जाता है और परमात्मा के रूप में सभी प्राणियों में मुझे देखकर श्रद्धापूर्वक मेरी भक्ति करता है, वह सभी प्रकार के कर्म करता हुआ भी केवल मुझमें स्थित हो जाता है अर्थात जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है अर्थात वह सभी प्रकार के कर्म करता हुआ भी केवल मुझमें स्थित हो जाता है৷৷6.31৷৷

 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ৷৷6.32৷৷

 

आत्म-औपम्येन-अपने समान; सर्वत्र सभी जगह; समम्-समान रूप से; पश्यति-देखता है; यः-जो; अर्जुन-अर्जुनः सुखम्-आनन्द; वा-अथवा; यदि यदि; वा–अथवा; दुःखम्-दुख; सः-ऐसा; योगी-योगी; परमः-परम सिद्ध; मत:-माना जाता है।

 

मैं उन पूर्ण सिद्ध योगियों का सम्मान करता हूँ जो सभी जीवों में वास्तविक समानता के दर्शन करते हैं और दूसरों के सुखों और दुखों के प्रति ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, जैसे कि वे उनके अपने हों अर्थात ऐसा सर्वश्रेष्ठ योगी सदा इस प्रकार सोचता है कि जैसे मुझे सुख प्रिय और अनुकूल  है वैसे ही सभी प्राणियों को सुख प्रिय और अनुकूल हैं और जैसे दुःख मुझे अप्रिय और प्रतिकूल हैं वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय और प्रतिकूल हैं । इस प्रकार जो सब प्राणियों में अपने समान ही सुख और दुःख को तुल्य भाव से अर्थात एक समान रूप से अनुकूल और प्रतिकूल देखता है और किसी के भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता अर्थात अहिंसक होता है। ऐसा योगी सदैव सभी जीवो के कल्याण के लिए तत्पर रहता है। उनके दुःख में दुखी और उनके सुख में सुखी होता है । उनके दुःख को अपना दुःख और उनके सुख को अपना सुख समझता है ऐसे योगी को मैं सर्वश्रेष्ठ योगी समझता हूँ ৷৷6.32৷৷

 

[जो योगी अपनी भाँति ( जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना ‘अपनी भाँति’ सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है अर्थात मैं उन पूर्ण सिद्ध योगियों का सम्मान करता हूँ जो सभी जीवों में वास्तविक समानता के दर्शन करते हैं और दूसरों के सुखों और दुखों के प्रति ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, जैसे कि वे उनके अपने हों]

 

मन के निग्रह का विषय

 

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌ ৷৷6.33৷৷

 

अर्जुन उवाच-अर्जुन ने कहा; य:-जिस; अयम्-यह; योग:-योग की पद्धति; त्वया तुम्हारे द्वारा: प्रोक्तः-वर्णित; साम्येन–समानता से; मधुसूदन श्रीकृष्ण, मधु नाम के असुर का संहार करने वाले; एतस्य–इसकी; अहम्-मैं; न-नहीं; पश्यामि-देखता हूँ; चञ्चलत्वात्-बेचैन होने के कारण; स्थितिम्-स्थिति को; स्थिराम्-स्थिर।

 

अर्जुन ने कहा-हे मधुसूदन! आपने जिस योग पद्धति का वर्णन किया वह मेरे लिए अव्यवहारिक और अप्राप्य है क्योंकि मन चंचल है अर्थात आपने जो यह साम्य योग समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ৷৷6.33৷৷

( अर्जुन कह रहा कि यह योग पद्धति अत्यन कठिन है और वह इसका पालन करने में असमर्थ है । क्योंकि योग की ऐसी पद्दति तभी संभव है जब मन स्थिर हो, शांत हो , एकाग्र हो । परन्तु अर्जुन कह रहा है कि उसका मन चंचल है तथा अस्थिर है तो यह पद्धति अपनाना उसके लिए या अन्य सामान्य जानो के लिए अत्यंत कठिन है । क्योंकि इस योग शैली में एकांत वास , संसार से विरक्ति , आसान , यम , नियम , जीवन शैली , भौतिक कामनाओं का त्याग इत्यादि कठिन नियम हैं जो किसी भी साधारण मनुष्य के लिए पालन कर पाना अत्यंत कठिन है ।)

 

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ৷৷6.34৷৷

 

चञ्चलम्-बैचेन; हि-निश्चय ही; मनः-मन; कृष्ण-श्रीकृष्ण प्रमाथि–अशान्त; बल-वत्-बलवान्; दृढम् हठीला; तस्य-उसका; अहम्-मैं; निग्रहम् नियंत्रण में करना; मन्ये-विचार करना; वायोः-वायु की; इव-समान; सु-दुष्करम्-पालन में कठिनता।

 

हे कृष्ण! क्योंकि मन अति चंचल, अशांत, हठी और बलवान है। मुझे वायु की अपेक्षा मन को वश में करना अत्यंत कठिन लगता है ৷৷6.34৷৷

 

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ৷৷6.35৷৷

 

श्रीभगवान् उवाच-भगवान ने कहा; असंशयम् निस्सन्देह; महाबाहो-बलिष्ठ भुजाओं वाला, अर्जुन; मनः-मन को; दुर्निग्रहम् वश में करना कठिन है; चलम् बेचैन; अभ्यासेन–अभ्यास द्वारा; तु–लेकिन; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; वैराग्येण वैराग्य द्वारा; च और; गृह्यते नियंत्रण में लाया जा सकता है।

 

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहाहे महाबाहु कुन्तीपुत्र! जो तुमने कहा वह सत्य है। निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। इस चंचल मन को नियंत्रित और वश में करना वास्तव में कठिन है किन्तु अभ्यास और विरक्ति ( वैराग्य ) द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है ৷৷6.35৷৷

 

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ৷৷6.36৷৷

 

असंयत-आत्मना-निरंकुश मनवाला; योग:-योग; दुष्प्रापः-प्राप्त करना कठिन; इति–इस प्रकार; मे-मेरा; मति:-मत; वश्य-आत्मना-संयमित मन वाला; तु-लेकिन; यतता-प्रयत्न करने वाला; शक्यः-संभव; अवाप्तुम्–प्राप्त करना; उपायतः-उपयुक्त साधनों द्वारा।

 

जिनका मन निरंकुश है अर्थात जिनका मन उनके वश में नहीं है उनके लिए योग करना कठिन है लेकिन जिन्होंने मन को नियंत्रित करना सीख लिया है और जो समुचित ढंग से निष्ठापूर्वक प्रयास करते हैं, ऐसे वश में किये हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष उपयुक्त साधनों  द्वारा योग में पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। यह मेरा मत है ৷৷6.36৷৷

 

योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

 

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ৷৷6.37৷৷

 

अर्जुनः उवाच-अर्जुन ने कहा; अयतिः-आलस्य; श्रद्धया श्रद्धा के साथ; उपेतः-सम्पन्न; योगात्-योग से; चलित-मानस:-विचलित मन वाला; अप्राप्य प्राप्त करने में असफल; योग-संसिद्धिम् योग में परम सिद्धि; काम्-किस; गतिम्-लक्ष्य; कृष्ण-श्रीकृष्ण; गच्छति-प्राप्त करता है।

 

अर्जुन ने कहाः हे कृष्ण! योग में असफल उस योगी का भाग्य क्या होता है जो श्रद्धा के साथ इस पथ पर चलना प्रारम्भ तो करता है किन्तु जो अस्थिर मन के कारण भरपूर प्रयत्न नहीं करता और इस जीवन में योग के लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहता है अर्थात जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है ? ৷৷6.37৷৷

 

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ৷৷6.38৷৷

 

कच्चित्-क्या; न-नहीं; उभय-दोनों; विभ्रष्ट:-पथ भ्रष्ट; छिन्न-टूटना; अभ्रम्-बादल; इव-सदृश; नश्यति-नष्ट होना; अप्रतिष्ठ:-बिना किसी सहायता के; महा-बाहो-बलिष्ठ भुजाओं वाले श्रीकृष्ण; विमूढ़ः-मोहित; ब्रह्मणः-भगवद्प्राप्ति; पथि–मार्ग पर चलने वाला।

 

हे महाबाहु कृष्ण! क्या योग से पथ भ्रष्ट और भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित ऐसा व्यक्ति भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं से वंचित नहीं होता और छिन्न-भिन्न बादलों की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? जिसके परिणामस्वरूप वह किसी भी लोक में स्थान नहीं पाता? ৷৷6.38৷৷

 

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ৷৷6.39৷৷

 

एतत्-यह; मे–मेरा; संशयम्-सन्देह; कृष्ण-कृष्ण; छेत्तुम् निवारण करना; अर्हसि तुम कर सकते हो; अशेषतः-पूर्णतया; त्वत्-आपकी अपेक्षा; अन्यः-दूसरा; संशयस्य-सन्देह का; अस्य-इस; छेत्ता-निवारण करने वाला; न-नहीं; हि-निश्चय ही; उपपद्यते-समर्थ होना।।

 

हे कृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है । कृपया मेरे इस सन्देह का पूर्ण निवारण करें ৷৷6.39৷৷

 

श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ৷৷6.40৷৷

 

श्रीभगवानुवाच-भगवान् ने कहा; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; न-एव-कभी नहीं; इह-इस संसार में; न कभी नहीं; अमुत्र-परलोक में; विनाश:-नाश; तस्य-उसका; विद्यते-होता है; न कभी नहीं; हि-निश्चय ही; कल्याण-कृत्-भगवद्प्राप्ति के लिए प्रयासरत्; कश्चित्-कोई भी; दुर्गतिम्-पतन को; तात–मेरे प्रिय मित्र; गच्छति–जाता है।

 

परमेश्वर श्रीकृष्ण ने कहाः हे पृथा पुत्र! आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करने वाले योगी का न तो इस लोक में और न ही परलोक में विनाश होता है। मेरे प्रिय मित्र! आत्मोद्धार अर्थात भगवद्प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाला और भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता अर्थात उसका कभी पतन नहीं होता और उसको कोई बुराई पराजित नहीं कर सकती  ৷৷6.40৷৷

 

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ৷৷6.41৷৷

 

प्राप्य–प्राप्त करके; पुण्य-कृताम्-पुण्य कर्मों के लोकान्–लोकों में; उषित्वा-निवास के पश्चात; शाश्वती:-अनेक; समा:-वर्ष; शुचीनाम्-पुण्य आत्माओं के; श्री-मताम्-समृद्ध लोगों के; गेहे-घर में; योग-भ्रष्ट:-असफल योगी; अभिजायते जन्म लेता है;

 

योगभ्रष्ट अर्थात योग में असफल योगी पुण्यवानों ( पवित्रात्माओं ) के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक ( दीर्घकाल तक ) निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले , सदाचारी धनवानों और श्रीमान पुरुषों के कुल में या घर में जन्म लेता है ৷৷6.41৷৷

 

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌ ৷৷6.42৷৷

 

अथवा–या; योगिनाम्-दिव्य ज्ञान से सम्पन्न; एव-निश्चय ही; कुले-परिवार में; भवति-जन्म लेता है।धी-मातम्-बुद्धिमानों के; एतत्-यह; हि-निश्चय ही; दुर्लभ-तरम्-अति दुर्लभ, लोके इस संसार में; जन्म-जन्म; यत्-जो; ईदृशम्-इस प्रकार का।

 

अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, वह इस  संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है॥6.42॥

 

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌ ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ৷৷6.43৷৷

 

तत्र-वहाँ; तम्-उस; बुद्धि-संयोगम्-विवेक जागृत होना; लभते–प्राप्त होता है; पौर्व-देहिकम्-पूर्व जन्मों के; यतते-प्रयास करता है; च-भी; ततः-तत्पश्चात; भूयः-पुनः; संसिद्धौ–सिद्धि के लिए; कुरुनन्दन-कुरुपुत्र, अर्जुन।

 

हे कुरुवंशी! ऐसा जन्म लेकर वे अपने पूर्व जन्म के ज्ञान और दैवी चेतना को पुनः जागृत करते हैं और योग में पूर्णता और सफलता के लिए और अधिक कड़ा परिश्रम कर के उन्नति करने का प्रयास करते हैं । ऐसे योगी पूर्व जन्म के शरीर के द्वारा संग्रह किए हुए दिव्य ज्ञान और चेतना को तथा यौगिक संस्कारों को जाग्रत कर के अर्थात वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो कर उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करते हैं  ৷৷6.43৷৷

 

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ৷৷6.44৷৷

 

पूर्व-पिछला; अभ्यासेन–अभ्यास से; तेन-उसके द्वारा; एव–निश्चय ही; हियते-आकर्षित होता है; हि-निश्चय ही; अवश:-असहाय; अपि-यद्यपि; स:-वह व्यक्ति; जिज्ञासुः-उत्सुक;अपि-भी; योगस्य–योग के संबंध में; शब्दब्रह्म-वेदों के सकाम कर्मकाण्ड से संबंधित भाग; अतिवर्तते-ऊपर उठ जाते हैं।

 

वह श्रीमानों अर्थात धनवानों और कुलीन व्यक्तियों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ योगी भी उस पूर्व जन्म के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है । वास्तव में वे अपने पूर्व जन्मों के आत्मसंयम के बल पर अपनी इच्छा के विरूद्ध स्वतः भगवान की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे जिज्ञासु साधक स्वाभाविक रूप से शास्त्रों के कर्मकाण्डों से ऊपर उठ जाते हैं ৷৷ 6.44৷৷

 

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌ ৷৷6.45৷৷

 

प्रयत्नात्-कठिन प्रयास के साथ; यतमानः-प्रयत्न करते हुए; तु-और; योगी-ऐसा योगी; संशुद्ध-शुद्ध होकर; किल्बिष:-सांसारिक कामना से; अनेक-अनेकानेक; जन्म-जन्मों के बाद; संसिद्धः-पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर; ततः-तब; याति प्राप्त करता है; पराम्-सर्वोच्च; गतिम्-लक्ष्य।

 

पिछले कई जन्मों में संचित पुण्यकर्मों और संस्कार बल के साथ जब ये योगी आध्यात्मिक मार्ग में आगे उन्नति करने हेतु निष्ठापूर्वक प्रयत्न में लीन रहते हैं तब वे सांसारिक कामनाओं से शुद्ध हो जाते हैं और इसी जीवन में पूर्णता और पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं अर्थात प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है ৷৷6.45৷৷

 

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ৷৷6.46৷৷

 

तपस्विभ्यः-तपस्वियों की अपेक्षा; अधिक:-श्रेष्ठ; योगी-योगी; ज्ञानिभ्यः-ज्ञानियों से; अपि-भी; मत:-माना जाता है; अधिक-श्रेष्ठ; कर्मिभ्यः-कर्मकाण्डों से श्रेष्ठ; च-भी; अधिक:-श्रेष्ठ, योगी-योगी; तस्मात्-अतः; योगी-योगी; भव-हो जाना; अर्जुन-अर्जुन।

 

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो॥46॥

 

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ৷৷6.47৷৷

 

योगिनाम्-सभी योगियों में से; अपि-फिर भी; सर्वेषाम् समस्त प्रकार के; मत्-गतेन–मुझ में तल्लीन; अन्त:-आंतरिक; आत्मना-मन के साथ; श्रद्धावान्–पूर्ण विश्वास के साथ; भजतेभक्ति में लीन; य:-जो; माम् मेरे प्रति; स:-वह; मे-मेरे द्वारा; युक्त-तमः-परम योगी; मतः-माना जाता है।

 

सभी योगियों में से जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, जिनका मन सदैव मुझ में तल्लीन रहता है और जो अगाध श्रद्धा से मेरी भक्ति में लीन रहते हैं उन्हें मैं सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ ৷৷6.46৷৷

 

 

 

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥6॥

 

 

 

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