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Soordas Bhramar Geet – Part 1

Soordas Bhramar Geet – Part 1 | सूरदास भ्रमर गीत | सूरदास द्वारा रचित भ्रमर गीत | भ्रमर गीत | Bhramar Geet | गोपियों द्वारा उद्धव को उपदेश | गोपियों और उद्धव के मध्य संवाद | Surdas Bhramargeet | सूरदास का भ्रमरगीत | Bhramar geet in Sanskrit and Hindi | Bhramar Geet Lyrics with Hindi Meaning | Bhramar Geet Saar – Surdas | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या | Surdas Bhramar Geet | Bhramar Geet by Soordas | Bhramar Geet Composed by Soordas | Bhramar Gita | उद्धव द्वारा गोपियों को ज्ञान का उपदेश 

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Soordas Bhramar Geet

 

 

 

भ्रमर गीत वस्तुतः भागवत पुराण में वर्णित है जिसमे गोपियों ने उद्धव को भ्रमर की संज्ञा दी है और उन्हें ज्ञान का उपदेश सुनाने पर उलाहना भी दी है । गोपियों ने ज्ञान मार्गी उद्धव को प्रेम मार्ग का उपासक बना दिया । उसी परिप्रेक्ष्य में अपनी ही काव्यात्मक शैली में सूरदास जी ने गोपियों और उद्धव के मध्य एक मीठी नोक झोंक और उलाहना  भरे भ्रमर गीत नामक काव्य की रचना की है जो यहाँ प्रस्तुत है । प्रत्येक पद एक विशेष राग पर आधारित है । 

 

 

अब कै राखि लेहु भगवान।

हौं अनाथ बैठ्यो द्रुम डरिया, पारधी साधे बान।

ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान।

दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह, कौन उबारै प्रान?

सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान।

सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय-जय कृपानिधान।।

 

यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिए गए हैं, इसमें सूरदास जी ने भगवान से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की है और खुद को संकटग्रस्त और असहाय बताकर भगवान की कृपा प्राप्त करने की आकांक्षा व्यक्त की है। 

 

सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! इस बार मेरी रक्षा कर लीजिए। मैं घोर संकट में फंसा हूँ। मेरी स्थिति तो उस पक्षी की तरह है, जो किसी व्यक्ति की डाली पर बैठा हो और नीचे शिकारी उस पर तीर चलाना चाहता हो और ऊपर बाज उस पर झपट्टा मारने के लिए तैयार बैठा हो। वृक्ष पर बैठे किसी भी पक्षी के लिए यह दोनों तरह की स्थितियां बेहद कष्टकारी हो सकती हैं। उसकी स्थिति आगे कुआं-पीछे खाई जैसी है। यदि वह उड़कर जाने की कोशिश करेगा तो बाज उस पर झपट्टा मार लेगा और यदि वह पेड़ पर ही बैठा रहेगा तो शिकारी अपने तीर से उसका शिकार कर लेगा। ऐसी स्थिति में उसे अपने प्राण बचाने वाला कोई नहीं दिखाई देता है तो वह स्वयं को अनाथ महसूस करता है और अपनी रक्षा के लिए प्रभु का स्मरण करता है। उसकी पुकार सुनकर प्रभु अपनी माया रचते हैं, जिसके कारण शिकारी जब बाण चला रहा होता है तो अचानक उसे कहीं से आकर एक सांप डस लेता है, जिससे शिकारी का निशाना चूक जाता है और तीर पक्षी को न लगकर ऊपर बाज को लग जाता है। इससे पक्षी का संकट दोनों तरफ से टल जाता है। अर्थात भक्त (पक्षी के रूप में) भगवान् से प्रार्थना करता है कि हे भगवान्! इस बार मेरी रक्षा कीजिए । मैं अनाथ (संसाररूपी) वृक्ष की डाल पर बैठा हूँ । नीचे से (मायारूपी) शिकारी ने मेरे ऊपर बाण साध रखा है । उसके डर से मैं भागना चाहता हूँ तो ऊपर मुझ पर झपट पड़ने के लिए (विषय-वासनारूपी) बाज मँडरा रहा है । अब दोनों ओर से मेरे ऊपर यह संकट उपस्थित हुआ है ।। ऐसे समय में मेरे प्राणों की रक्षा कौन कर सकता है? तब (पक्षीरूपी) भक्त ने भगवान् का स्मरण किया । तत्काल उन्होंने (ज्ञानरूपी) सर्प को भेज दिया। जिसने आकर शिकारी को डस लिया, जिससे उसके हाथ से धनुष की डोरी पर चढ़ा बाण छूट गया, जो जाकर बाज को लगा । इस प्रकार शिकारी और बाज दोनों मर गए (अर्थात् ज्ञान के द्वारा माया-मोह और समस्त विषय-विकार नष्ट हो गए), जिससे भक्त दोनों ओर से संकट से बच गया । हे दया के भण्डार भगवान्! आपकी जय हो । सूरदास जी कहते हैं कि हे कृपा निधान! जिस तरह आपने उस पक्षी की रक्षा की, उसी तरह आप मेरे ऊपर भी कृपा करो और मुझे संकट की इस घड़ी से निकाल लो। हे प्रभु! हे कृपा निधान! हे दयानिधान! बार मेरी रक्षा करो, आप की सदा ही जय हो। यहां पर सूरदास जी स्वयं को संकट में होने का कारण जन्म मरण के चक्कर में फंसे रहने को मानते हैं और वह जन्म मरण रूपी संकट में फंसे हैं जहाँ उन्हें मोह माया रुपी बाज और शिकारी चारों तरफ से घेरे हुए हैं, ऐसे में मैं प्रभु से रक्षा की गुहार करते हैं ताकि उन्हें प्रभु जन्म मरण के इस संकट से मुक्ति दिलायें। इस पद में सूरदास जी ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण को अत्यधिक कृपालु बताया है । उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण अपने भक्त को विकट परिस्थिति में भी मृत्यु से मुक्ति दिलाने में समर्थ हैं । इसीलिए वे उनसे मुक्ति की प्रार्थना करते हैं ।

 

 राग सारंग

पहिले करि परनाम नंद सों समाचार सब दीजो।
और वहाँ वृषभानु गोप सों जाय सकल सुधि लीजो॥
श्रीदामा आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो।
सुख-संदेस सुनाय हमारो गोपिन को दुख मेटियो॥
मंत्री इक बन बसत हमारो ताहि मिले सचु पाइयो।
सावधान ह्वै मेरे हूतो ताही माथ नवाइयो॥
सुन्दर परम किसोर बयक्रम चंचल नयन बिसाल।
कर मुरली सिर मोरपंख पीताम्बर उर बनमाल॥
जनि डरियो तुम सघन बनन में ब्रजदेवी रखवार।
बृन्दावन सो बसत निरंतर कबहुँ न होत नियार॥
उद्धव प्रति सब कही स्यामजू अपने मन की प्रीति।
सूरदास किरपा करि पठए यहै सकल ब्रज रीति॥१॥

 

सूरदास जी के द्वारा रचित यह भ्रमर गीत सार का पहला पद है, इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने बताया है की श्री कृष्ण को अपने माता-पिता और गोपिकाओं की याद आ गई है और इसी कारण वह अपने ज्ञानी सखा उद्धव को दूत बनाकर ब्रजवासियों और प्रियजनों की कुशल क्षेम ज्ञात करने के लिए भेज रहे हैं और उद्धव वहाँ पहली बार जा रहें हैं तो वहाँ की रीति-नीति से उन्हें अवगत करा रहे हैं। श्री कृष्ण बृजवासियों को छोड़कर मथुरा के राज – वैभव और तड़क – भड़क में थोड़े समय के लिए फंसे अवश्य लेकिन ब्रजवासियों की मधुर स्मृतियाँ रह – रह कर उन्हें कोंचती रहीं । इधर उनके परम मित्र उद्धव अपने ज्ञान गर्व में चूर हैं और प्रेम और भक्ति की महत्ता को नगण्य समझते हैं । श्री कृष्ण ब्रजवासियों का समाचार ज्ञात करने के बहाने उद्धव के ह्रदय में गोपियों की प्रेम भक्ति को उत्पन्न करना चाहते हैं । अतः उद्धव के ज्ञान – स्फीत व्यक्तित्व को विगलित करने के उद्देश्य से उन्हें ब्रज भेज रहे हैं ।

 

सूरदास जी ने लिखा है श्री कृष्ण उद्धव को समझाते हैं कि ब्रज पहुँचने पर तुम सबसे पहले नंद बाबा को प्रणाम करके सब समाचार कह देना। नंद यहां एक तो श्री कृष्ण के पिता हैं और इसलिए पूज्य हैं और दूसरे वहां के राजा हैं और सबसे अधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। उन्हें प्रणाम करना स्वभाविकता और औपचारिक्ता दोनों की दृष्टि से ही उपर्युक्त है और उसके बाद सारे समाचार दे देना। पहले तो यह बताना कि आप कौन हैं फिर श्री कृष्ण की व्यस्तता का कारण बताना अर्थात राज कार्य की जटिलता के कारण गोकुल आने की असमर्थता बताना। ये सब बात होने के बाद राधा के पिता वृषभानु गोप के पास जाकर उनके सम्पूर्ण कुशल क्षेम पता करना। मेरी ओर से श्री दामा (सुदामा) आदि से मिलकर स्नेह से प्रणाम करना और साथ ही गोपियों को हमारा सुख संदेश अर्थात कुशल समाचार सुनाकर उनके विरह जन्य दुःख संताप को दूर करना। वहां वन में हमारा एक मंत्री रहता है यहां मंत्री का अभिप्राय राधा से है। श्री कृष्ण कहते हैं कि उनसे मिलकर सुख प्राप्त करना जब तुम उसके सम्मुख जाओ तो हमारी ओर से मस्तक नवाकर प्रणाम करना। श्री कृष्ण का उद्धव को सावधान करने का कारण यही है कि वह कहीं राधा से मिलकर भ्रम में न पड़ जाय क्योंकि वह उनका ही वेश धारण करके वहां विचरती रहती हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि हमारा वह मंत्री अत्यंत सुंदर एवं किशोरावस्था का है । उसके नेत्र चंचल और बड़े बड़े हैं। वह हाथ में मुरली सिर पर मोर पंख शरीर पर पीतांबर और हृदय में अर्थात गले में वनमाला धारण करता है। श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि हमारा  मंत्री अत्यंत सघन वन में निवास करता है। तुम जाकर उससे मिलना और वन में जाने से मत डरना क्योकि वहां ब्रजदेवी सबकी रक्षा करती हैं। इसलिए चिंता का कोई कारण नहीं है। वह ब्रजदेवी सदा वृन्दावन में निवास करती हैं और वहां से कभी पृथक नहीं होती इस प्रकार श्री कृष्ण ने उद्धव से अपने मन की समस्त प्रेममयी स्थिती का स्पष्टीकरण किया। सूरदास जी कहते हैं कि इस प्रकार श्री कृष्ण ने कृपा करके उद्धव को सारी ब्रजरीति समझाकर ब्रज भेजा और उनसे कहा कि वह इसी प्रकार का व्यवहार करे। ब्रह्म के दो रूप हैं एक रस रूप एवं दूसरा ऐश्वर्य रूप । उद्धव ने श्री कृष्ण का ऐश्वर्य रूप देखा था । श्री कृष्ण चाहते थे कि वह उनके दस रूपों को भी देखे । तभी उन्होंने उद्धव को ब्रज भेजा क्योंकि वह वहां सदा रस रूप मे निवास करते हैं। कृष्ण भक्तों ने राधा को कृष्ण का अविभक्त अंग स्वीकार किया गया है। कृष्ण एवं राधा एक ही आदि शक्ति के दो रूप हैं इसलिए परस्पर अभिन्न हैं।भक्ति की चर्मावस्था में भक्त और भगवान में कोई अंतर् नहीं आता। भक्त भगवान का स्वरूप धारण कर लेता है। राधा भी श्री कृष्ण का स्वरूप धारण कर लेती है। ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गई है। “राधा माधव, माधव राधा राधा भेल मधाई” और उद्धव भी ब्रज में राधा के इसी रुप के दर्शन किये तभी तो वह मथुरा लौटकर श्री कृष्ण से कहते हैं कि ” ब्रजभानु में एक अच्म्भ्यो देख्यो मोर मुकुट पीताम्बर धोर तुम गाइन सम पेख्यो। “

 

राग सोरठ

कहियो नंद कठोर भए।
हम दोउ बीरै डारि पर घरै मानो थाती सौंपि गए।।

तनक-तनक तैं पालि बड़े किए बहुतै सुख दिखराए।
गोचारन को चलत हमारे पीछै कोसक धाए।।

ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाए।
बहुरि बिधाता जसुमतिजू के हमहिं न गोद खिलाए।।

कौन काज यह राज, नगर को सब सुख सों सुख पाए ।
सूरदास ब्रज समाधान करूं आंजू काल्हि हम आए।। 2

 

इस पद में कृष्ण उद्धव को ब्रज जाने से पहले नंद बाबा के लिए जो कह रहे हैं उसका वर्णन इस पद में किया गया है।

 

कृष्ण उद्धव को समझाते हुए कह रहे हैं कि हे उद्धव ! तुम नंद बाबा से कहना कि वो इतने कठोर क्यों हो गए हैं? हम दोनों भाइयों को अर्थात कृष्ण और बलदाऊ को पराये घर अर्थात मथुरा में भेज कर इस प्रकार अलग हो गए जैसे कोई किसी की धरोहर को लौटाकर एकदम से निश्चिंत हो जाता है और पुनः उसकी कोई खोज खबर नही लेता। कहने का तातपर्य यह है कि हम दोनों भाइयों के प्रति उनका अनुराग ही नहीं रह गया है। जब हम दोनों छोटे-छोटे थे तब उन्होंने हमारा पालन पोषण किया था । पाल पोस कर उन्होंने हम दोनों को अनेक सुख प्रदान किये थे। किन्तु आज उन्हें न जाने क्या हो गया है जो हमें इस प्रकार विस्मरण कर बैठे हैं? जब हम गाय चराने के लिए वन को जाते थे तो वह हमें छोड़ने के लिए कोष भर कर हमारे पीछे दौड़े आते थे । तब तो हमारे साथ इतना स्नेह था किन्तु अब न जाने उन्हें क्या हो गया है? यहां वसुदेव और देवकी हमें आत्मज कहते हैं अपना पुत्र कहते हैं । ये लोग हमें ब्रह्म समझ बैठे हैं और कहते हैं कि यशोदा माता ने हमें अपनी गोद में नहीं खिलाया। श्री कृष्ण आगे कहते हैं कि हमने इस नगर के सम्पूर्ण सुखों को भली प्रकार भोग लिया है हमारे लिए यह सुख भोग व्यर्थ है क्योंकि ब्रज के सुखों की तुलना में ये जो सुख है वह महत्वहीन है कोई मूल्य नहीं। सूरदास जी कह रहें हैं कि श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि तुम ब्रजवासियों को हमारा कुशल समाचार कह देना और उनको संतावना देते हुए कहना कि हम आज कल में ही अर्थात शीघ्र ही वृन्दावन आकर उनसे मिलेंगे।

 

 राग बिलावल

तबहिं उपंगसुत आय गए।
सखा सखा कछु अंतर नाही भरि-भरि अंक लए।।
अति सुंदर तन स्याम सरीखो देखत हरि पछताने।
एसे को वैसी बुधि होती ब्रज पठवै तब आने।।
या आगे रस-काव्य प्रकासे जोग-वचन प्रगटावै।
सुर ज्ञान दृढ़ याके हिरदय जुवतिन जोग सिखावै।। 3

 

श्री कृष्ण ब्रज को याद करते हुए मग्न हैं और उसी समय उद्धव का आगमन होता है । इसी बात को इस पद में सूरदास जी ने बताया है।

 

श्री क्रृष्ण ब्रज की सुधि में निमग्न हैं, और किसी को ब्रज भेजना चाहते हैं। कृष्ण ब्रज की स्मृतियों में भाव विभोर हो रहे थे और उसी समय वहाँ उद्धव आ गए। दोनों में शारीरिक रूप से दृष्टिगत अंतर नहीं हो रहा है और दोनों परस्पर स्नेह पूर्वक आलिंगन बद्ध हो गये। एक दूसरे से स्नेहपूर्वक मिले। उद्धव का शरीर अत्यं सुंदर और श्री कृष्ण के समान श्यामदूती वाला था। ये देखकर श्री कृष्ण मन ही मन पछताये कि यदि शारीरिक सौंदर्य के साथ बुद्धि और विवेक भी होता तो कितना अच्छा होता अर्थात इसकी बुद्धि ज्ञान पर आधारित न होकर प्रेम मार्गीय भक्ति भावना पर आधारित होती तो उत्तम था और इसीलिए उन्होंने उद्धव को किसी अन्य कारण हेतु ब्रज भेजने का निश्चय किया क्योंकि वहां जाने पर ही इनकी योगमार्ग बुद्धि का संस्कार होना सम्भव था और तभी यह प्रेमानुराग भक्ति का भली-भाँति परिपालन कर सके। यदि इनके आगे प्रेम से सनी हुयी वाणी सुनाएँ तो ये अयोग्य नीरस चर्चा करने लगेंगे और इस प्रकार पक्का प्रेम पूर्ण श्रोताओं को इनकी योग पूर्ण चर्चा उबा देगी क्योंकि इनके ह्रृदय में ज्ञान अर्थात योगमार्गी आसन इतने दृढ हैं कि यदि इन्हें ब्रज भी भेजा जाये तो ये ब्रजवासियों को भी योग की शिक्षा दीक्षा देना प्रारम्भ कर देंगे। किन्तु सम्भव है वहां गोपियों के अनन्य प्रेमानुराग को देखकर इनका योग खंडित हो जाए और यह प्रेममार्गी महत्ता स्वीकार करके उसे अपना लें।

 

राग विलावल 

हरि गोकुल की प्रीति चलाई।
सुनहु उपंगसुत मोहिं न बिसरत ब्रजवासी सुखदाई।।
यह चित होत जाऊँ मैं, अबही, यहाँ नहीं मन लागत।
गोप सुग्वाल गाय बन चारत अति दुख पायो त्यागत।।
कहँ माखन-चोरी? कह जसुमति ‘पूत जेब’ करि प्रेम।
सूर स्याम के बचन सहित सुनि व्यापत अपन नेम।।4

 

श्री कृष्ण उद्धव से ब्रजवासियों की प्रेम की चर्चा करते हुए चित्रित किये गए हैं। और उद्धव के आ जाने पर उनके सम्मुख ही श्री कृष्ण ने गोकुल का प्रेम प्रसंग छेड़ दिया है।

 

श्री कृष्ण उद्धव के आ जाने के बाद उन्हें गोकुल के प्रेम कथा का वर्णन करते हुए कहते हैं। हे उद्धव ! सुनो ब्रजवासी और उनके प्रति मेरा प्रेम भुलाये नहीं भूलता वे मेरे में सदा के लिए बसे रहते हैं। वे मेरे मन में सदैव बसे रहते हैं क्योंकि उन्होंने मुझे अपने प्रेम से सदा सुख पहुंचाया है और इसी कारण मेरा मन यहाँ नहीं लगता। इच्छा होती है कि मैं झट से वहां चला जाऊँ । वहाँ जाकर गोप ग्वालाओं के साथ वन में गाये चराने जाया करता था। उनसे बिछड़ते समय मुझे अति दुःख हुआ था । हे उद्धव! आज भी मुझे गोकुल की कई बातें स्मरण हो आती हैं। न तो अब वह माखन चोरी है और न ही अब माता यशोदा के समान अत्यंत आग्रह करके यह कहने वाली है कि बेटा यह खा ले।
सूरदास जी कहते है कि श्री कृष्ण से युक्त वस्तुओं को सुनकर भी उद्धव अपने नियम साधना में निमग्न रहे उनका मन अपने योग मार्ग के विधि विधान में डूबा रहा। श्री कृष्ण के प्रेम मार्ग को महत्व न देकर उन्होंने इसे हेय समझा । योग मार्गी उद्धव का प्रेम मार्ग में ध्यान न देना स्वाभाविक ही था क्योंकि उनकी दृष्टि में प्रेम भावना सांसारिक मोह मात्र ही था। जिसका तिरस्कार करना ही उचित है।

 

 

राग रामकली

जदुपति लख्यो तेहि मुसकात।
कहत हम मन रही जोई सोइ भई यह बात।।
बचन परगट करन लागे प्रेम-कथा चलाय।
सुनहु उध्दव मोहिं ब्रज की सुधि नहीं बिसराय।।
रैनि सोवत, चलत, जागत लगत नहिं मन आन।
नंद जसुमति नारि नर ब्रज जहाँ मेरो प्रान।।
कहत हरि सुनि उपंगसुत ! यह कहत हो रसरीति।
सूर चित तें टरति नाही राधिका की प्रीति।।

 

श्री कृष्ण उद्धव से ब्रज के विषय में बात- चीत कर रहे हैं।

 

उद्धव श्री कृष्ण की प्रेम दुर्बलता को देखकर मुस्कुरा पड़ते हैं। यह मुस्कराहट उद्धव के सैद्धांतिक विषय की सफल अभिव्यिक्ति थी। जिसे कृष्ण ने ताड लिया। फलतः श्री कृष्ण ने उन्हें उलझाते हुए अपने प्रेम का मोह और खोलकर रखा जिसे पिछले पद में मंत्री पद से संकेतित किया गया है। उस राधिका का नाम रति निष्ठा के साथ श्री कृष्ण ने लिया है। जिससे उद्धव का गर्व पूरे आयाम के साथ अपने कर्त्तव्य का आरम्भ पाता है। श्री कृष्ण ने उद्धव को प्रेम प्रसंग की चर्चा में उद्धव को मुस्कुराते हुए देख लिया वो अपने मन में सोचने लगे कि हमने उद्धव के विषय में जो धारणा विकसित की थी वह सत्य प्रमाणित हो रही है क्योंकि उद्धव का मुस्कुराना यह स्पष्ट करता है कि वह दृढ योग मार्गी हैं। इतना होने पर भी श्री कृष्ण ने अपने मन के भावों को हृदय में दबाए रखा और पुनः ब्रजवासियों के प्रेम प्रसंग की चर्चा प्रारम्भ कर दी और वे कहने लगे कि , ” हे उद्धव ! वह ब्रज की स्मृति को भुला पाने में सर्वथा असमर्थ हैं । रात्रि में सोते समय , दिन में जागते समय और दर-दर घूमते समय में ब्रज की स्मृति में ही डूबा रहता हूँ । मेरा मन अन्यत्र कहीं नही लगता। जहां ब्रज में नंद बाबा, यशोदा माता तथा अन्य नर नारियाँ अर्थात गोप गोपिकाएं निवास करती हैं वहीं उन्हीं के पास मेरे प्राण रहते हैं। मैं सदैव उनकी स्मृति में खोया रहता हूँ । ऐसा लगता है कि मेरे उनके अतिरिक्त कोई अस्तित्व ही नहीं है। हे उद्धव!  सुनों मैं तुम्हारे सम्मुख प्रेम की रीति का वर्णन करता हूँ । मेरे हृदय से राधा की प्रीति क्षण भर के लिए दूर नहीं हो पाती । प्रेम की रीति ही ऐसी है कि प्रेमी निरन्तर अपने प्रेमी के स्थान में निमग्न रहे । मैं यहां राधा से दूर हूँ किंतु वस्तुतः मैं उसे क्षण भर के लिए विस्तृत नहीं कर पाता है।”

 

उपरोक्त पद में कृष्ण अत्यंत लाघव के साथ राधा को सम्पूर्ण गोपिकाओं में अनन्य स्थान की अधिकारिणी घोषित करते हुए उसके प्रति अपनी अनन्य प्रीति की व्यंजना कर रहे है।

 

राग सारंग

सखा? सुनों मेरी इक बात।
वह लतागन संग गोरिन सुधि करत पछितात।।
कहाँ वह वृषभानु तन या परम् सुंदर गात।
सरति आए रासरस की अधिक जिय अकुलात।।
सदा हित यह रहत नाहीं सकल मिथ्या-जात।
सूर प्रभू यह सुनौ मोसों एक ही सों नात।।6

 

इस पद में गोपियों के द्वारा उद्धव की तुलना श्वान अर्थात कुत्ते से की जा रही है।

 

एक गोपी दूसरी गोपी कहती है कि आज तक कर प्रयत्न क्ररके भी कोई कुत्ते की पूँछ को सीधा नहीं कर पाया और इसका कारण क्या बताया? इसका कारण यह है कि पूँछ का स्वभाव सदा टेढ़ा है और स्वभाव को बदला नहीं जा सकता और इसलिए अब इसे सीधा नहीं किया जा सकता। एक और उदाहरण देते हुए कहती हैं कि कौआ जन्म से ही न खाने योग्य पदार्थ को खाना प्रारम्भ कर देता है। कौआ अभक्षी को भी अर्थात खाने व न खाने योग्य पदार्थ को भी खाना प्रारम्भ कर देता है और पूरे जीवन इस स्वभाव को नहीं छोड़ता । तुम्हीं  बताओ कि धोने से काले कंबल का रंग उतर सकता है क्या? जैसे सांप है वह दूसरों को डसने का काम करता है लेकिन दूसरों को डसने से उसका पेट नहीं भरता क्योंकि उसके पेट में तो कुछ जाता ही नहीं फिर भी उसका स्वभाव पड़ गया है डसना और इसलिए वह इसे छोड़ता नहीं और ऐसे ही यह उद्धव हैं । दूसरों को दुखी करना इनका स्वभाव बन गया है। इन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि इनके व्यवहार का क्या परिणाम होगा? बस ये तो ऐसे ही हैं अर्थात दूसरों को दुखी करना इनका स्वभाव बन गया है । इन्हें इसी बात में आनंद मिलता है।

 

राग टोड़ी

उद्धव ! यह मन निश्चय जानो।
मन क्रम बच मैं तुम्हें पठावत ब्रज को तुरत पलानों।।
पूरन ब्रम्ह, सकल अबिनासी ताके तुम हौ ज्ञाता।
रेख न रूप, जाति, कुल नाहीं जाके नहिं पितु माता।।
यह मत दै गोपिन कहँ आवहु बिनह-नदी में भासति।
सूर तुरत यह जसस्य कहौ तुम ब्रम्ह बिना नहिं आसति।।7

 

उद्धव को श्री कृष्ण शीघ्र ही ब्रज प्रस्थान करने को कह रहे हैं, जो बार-बार ब्रह्म की रट लगाते रहते हैं।

 

श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव ! तुम अपने मन में यह निश्चय जान लो कि मैं सम्पूर्ण सद्भावना एवं मन वचन कर्म के साथ ब्रज भेज रहा हूँ। इसलिए तुम तुरंत वहां के लिए प्रस्थान करो। कवि का यह भाव है कि कृष्ण सच्चे हृदय से उद्धव को ब्रज जाने को कह रहे हैं। इससे उन्हें दो कार्यों की सिद्धि अभीष्ट है। एक तो उन्हें वहां का कुशल समाचार प्राप्त हो जाएगा और दूसरा गोपियों के अनन्य प्रेम को परखकर ज्ञान गर्वित उद्धव प्रेम के सरल व सीधे मार्ग को पहचान सकेंगे और प्रेम का महत्व जान सकेंगे। कृष्ण उद्धव से कहते हैं कि तुम्हारा ब्रह्म पूर्ण, अनीश्वर और अखंड रूप है और तुम्हें ऐसे अविनाशी ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान प्राप्त है। तुम्हारे ब्रह्म की न तो कोई रूप रेखा है न ही कोई कुलवंश है और न ही उसके कोई माता पिता हैं। तुम्हारा ब्रह्म अखंड अनादि, अजर, अमर और पूर्ण है । वह सब प्रकार के सांसारिक संबंधों से अछूता और स्वतंत्र है । इसलिए कृपा करके तुम अपना यह ब्रह्म ज्ञान ब्रज पल्ल्वियों को सुनाकर आओ। तुम वहां सीधा जाकर उन गोपियों को समझा बुझा कर आना क्योंकि वे मेरे विरह में निमग्न होकर विरह की नदी में डूब रहीं हैं। तुम तुरंत उनसे  जाकर कहो कि ब्रह्म के बिना जीवन में मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। वह ब्रह्म ही जीवन का सार तत्व है। तुम जाकर यह समझाओ कि प्रेम भाव त्यागकर अविनाशी ब्रह्म का ध्यान करें और उसी में अपनी समस्त शक्ति लगा दे तभी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सकेगी अन्यथा नहीं।

 

राग नट

उद्धव ! बेगि ही ब्रज जाहु।
सुरति सँदेस सुनाय मेटो बल्लभिन को दाहु।।
काम पावक तूलमय तन बिरह-स्वास समीर।
भसम नाहिं न होन पावत लोचनन के नीर।।
अजौ लौ यहि भाँति ह्वै है कछुक सजग सरीर।
इते पर बिनु समाधाने क्यों धरैं तिय धीर।।
कहौं कहा बनाय तुमसों सखा साधु प्रबीन?
सुर सुमति बिचारिए क्यों जियै जब बिनु मीन।।8

 

श्री कृष्ण उद्धव को शीघ्र ही ब्रज जाने को कह रहे हैं या निर्देश दे रहे हैं और उन्हें कह रहे हैं की वह विरह में संतप्त गोपियों को तसल्ली दें।

 

श्री कृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव! तुम शीघ्र ही ब्रज चले जाओ और वहां जाकर ब्रज की नारियों को या संतप्त गोपियों को सांत्वना दो । जिससे उनके चित्त में स्थित विरह जन्य पीड़ा समाप्त हो सके। रुई के समान कोमल शरीर कामाग्नि में प्रज्वलित हो रहे हैं। विरह आदि के कारण उनकी तीव्र साँसे वायु के समान उनकी कामाग्नि को और भी भड़का रही हैं। परन्तु उनके नेत्रों से होने वाली आंसुओं की वर्षा के कारण उनके शरीर कामाग्नि में जलने से बच गए हैं अर्थात गोपियाँ रो-रो कर अपने हृदय में स्थित विरह के ताप को हल्का कर लेती हैं और इस प्रकार उनका जीवन नष्ट होने से बच जाता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव ! इसी कारण उनके शरीर में अब भी सजगता सी है किन्तु इस सजगता का सदा बना रहना कठिन है इसलिए यदि शीघ्र उन्हें ढाँढस न बंधाया गया तो उनके लिए धैर्य धारण करना कठिन हो जायेगा। हे सखा! अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ और किस प्रकार बताकर कहूँ । तुम स्वयं ही साधू स्वभाव के और विवेकशील हो इसलिए मेरे मन के भावों को समझ लेना तुम्हारे लिए कोई कठिन कार्य नहीं। तुम अपने विवेकशक्ति के बल पर स्वयं ही विचार करो कि बिना जल के मछलियाँ किस प्रकार जीवित रह सकती हैं? अर्थात जैसे जल से विलग होकर मछली का जीवन नहीं चल सकता उसी प्रकार मेरे बिना गोपिकाओं का जीवन भी चलना कठिन है। मैं ही उनका सर्वस्व हूँ अतः तुम शीघ्र ही जाकर उन्हें मेरा संदेश सुनाकर सांत्वना दो।

 

 राग सारंग

पथिक ! संदेसों कहियो जाय।
आवैंगे हम दोनों भैया, मैया जनि अकुलाय।।
याको बिलग बहुत हम मान्यो जो कहि पठयो धाय।
कहँ लौं कीर्ति मानिए तुम्हारी बड़ो कियो पय प्याय।।
कहियो जाय नंदबाबा सों, अरु गहि जकरयो पाय।
दोऊ दुखी होन नहिं पावहि धूमरि धौरी गाय।।
यद्धपि मथुरा बिभव बहुत है तुम बिनु कछु न सुहाय।
सूरदास ब्रजवासी लोगनि भेंटत हृदय जुड़ाय।। 9

 

उद्धव ब्रज के लिये प्रस्थान करने वाले हैं। उसी समय श्री कृष्ण उद्धव से कह रहे हैं।

 

श्री कृष्ण उध्दव से कहते हैं कि हे पथिक ! हे उद्धव ! तुम ब्रज जाकर कहना कि हम दोनों भाई ब्रज में सबसे मिलने शीघ्र ही आएंगे, उनसे कहना वो ज्यादा व्याकुल न हों। उनको जाकर के कहना कि उन्होंने जो माता देवकी को धाय कहके संदेस भेजा है उसका हमने बहुत बुरा माना है और उनसे ये भी कहना कि हे माता ! तुम्हारी कीर्ति का कहाँ तक वर्णन करूँ । वह तुम ही हो जिसने अपना दूध पिलाकर इतना बड़ा किया है। हे उद्धव ! तुम नंद बाबा से उनके चरण पकड़कर कहना कि वह गायों का ध्यान रखें। मेरी काली और सफेद गायें मेरे बिना दुःखी न होने पाएं। श्री कृष्ण के कहने का भाव यह है कि नंद बाबा हमारे आदरणीय हैं। यद्यपि उनके चरण पकड़कर उन्हें यथोचित आदर और सम्मान देना अनिवार्य है। यद्यपि मथुरा नगरी में अपार गौरव और सुख प्राप्त है लेकिन आपके बिना हमें यहां कुछ भी नहीं सुहाता । एक तरफ तो यह वैभव है और दूसरी तरफ आपका स्नेह। सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के हृदय को तभी सांत्वना  और संतोष प्राप्त होता है जब वो ब्रजवासियों के मध्य में होते हैं अर्थात हमें ब्रजवासियों से मिलकर ही वास्तविकता की या ज्ञान की अनुभूति होती है।

 

राग सारंग 

नीके रहियो जसुमति मैया।
आवैंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दोउ भैया।।
जा दिन तें हम तुमतें बिछुरे काहु न कहयों ‘कन्हैया’।
कबहुँ प्रात न कियो कलेवा, साँझ न पीन्ही धैया।।
बंसी बेनु संभारि राखियो और अबेर सबेरो।
मति लै जाय चुराय राधिका कछुक खिलौनों मेरो।
कहियो जाय नंदबाबा सों निष्ट बिठुर जिय कीन्हों।
सूर स्याम पहुँचाय मधुपुरी बहुरि सँदेस न लीन्हों।।10

 

श्री कृष्ण उद्धव के ब्रज प्रस्थान के समय माता यशोदा के लिए संदेश कह रहें और नंद बाबा को निष्ठुर कह रहे हैं।

 

श्री कृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव ! तुम माता यशोदा से कहना कि वे भली- भांति और हँसी-खुशी से रहें। हमारे लिए चिंतित या व्याकुल न हों।  हम दोनों भाई अर्थात मैं और बलराम चार पांच दिन में अर्थात शीघ्र ही वहां ब्रज में आकर सबसे मिलेंगे। नंद बाबा से कहना कि जिस दिन से हम उनसे विलग् हुए हैं , हमें प्यार से किसी ने कन्हैया भी नहीं कहा और हमने वहाँ से आने के बाद न कभी प्रातः कालीन नाश्ता किया है न ही गाय के थन से निकला हुआ ताजा ताजा दूध ही पिया है। हे उद्धव ! माता से यह भी कहना कि वह बंशी आदि मेरे सभी खिलौने संभाल कर रखें ताकि राधिका अवसर पाकर उनके सारे खिलौने चुराकर न ले जाए। हे उद्धव ! तुम हमारे नंद बाबा से कहना कि उन्होंने तो हमारी ओर से अपना हृदय बिलकुल ही निष्ठुर और कठोर कर लिया है। वह जब से हमें मथुरा छोड़कर गए हैं, न तो हमारी खोज खबर ली और न तो किसी के हाथ से कोई संदेश ही भिजवाया है।

 

राग कल्याण

उद्धव मन अभिलाष बढ़ायो।
जदुपति जोग जानि जिय साँचो नयन अकास चढ़ायो॥
नारिन पै मोको पठवत हौ कहत लिखावन जोग।
मनहीं मन अब करत प्रसंसा है मिथ्या सुख-भोग॥
आयसु मानि लियो सिर ऊपर प्रभु-आज्ञा परमान।
सूरदास प्रभु पठवत गोकुल मैं क्यों कहौं कि आन॥११॥

 

श्री कृष्ण की बातें सुन कर उद्धव ज्ञान – गर्व में फूल उठे । और ब्रज जाने के लिए उद्धत हुए ।

 

श्री कृष्ण के प्रेम भाव को जान कर उद्धव जी अपने मन में अनेक आनंद की अभिलाषाएं बढ़ाने लगे । तात्पर्य यह है कि परोक्ष रूप में अपने ज्ञान की महिमा को जान कर वे बहुत ही प्रसन्न हुए । अब श्री कृष्ण के द्वारा प्रतिपादित योग मार्ग को ही मन में सच्चा समझ कर उद्धव जी गर्वित होकर आकाश की ओर देखने लगे । उद्धव जी को यह आभास हो गया कि हमारा यह ज्ञान मार्ग ही सच्चा है । इसी से श्री कृष्ण हमें गोपियों को योग की बातें सिखाने के लिए ब्रजमंडल भेज रहे हैं और वे इस बात की मन ही मन प्रशंसा करने लगे कि श्री कृष्ण ने भी स्वतः संसार के सुख भोग को मिथ्या मान लिया। उद्धव जी ने यह सोच कर श्री कृष्ण की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया । चूंकि श्री कृष्ण उनके सखा और स्वामी दोनों थे अतः स्वामी की आज्ञा को प्रमाण मान लिया । सूरदास के शब्दों में उद्धव का कथन है कि स्वामी श्री कृष्ण यदि मुझे जान बूझ कर ब्रज भेजना चाहते हैं तो मैं उनकी बातों का खंडन कर के दूसरी बातें क्यों करूँ। आशय यह है कि उद्धव ने यही समझा कि श्री कृष्ण ज्ञान मार्ग के पोषक हैं और उन्हें ज्ञान का अधिकारी समझ कर ही गोपियों के पास भेजना चाहते हैं ।

 

राग सारंग

सुनियो एक सँदेसो ऊधो तुम गोकुल को जात।
ता पाछे तुम कहियो उनसों एक हमारी बात॥
मात-पिता को हेत जानि कै कान्ह मधुपुरी आए।
नाहिंन स्याम तिहारे प्रीतम, ना जसुदा के जाए॥
समुझौ बूझौ अपने मन में तुम जो कहा भलो कीन्हो।
कह बालक, तुम मत्त ग्वालिनी सबै आप-बस कीन्हो॥
और जसोदा माखन-काजै बहुतक त्रास दिखाई।
तुमहिं सबै मिलि दाँवरि दीन्ही रंच[१] दया नहिं आई॥
अरु वृषभानसुता जो कीन्ही सो तुम सब जिय जानो।
याही लाज तजी ब्रज मोहन अब काहे दुख मानो?
सूरदास यह सुनि सुनि बातैं स्याम रहे सिर नाई।
इत कुब्जा उत प्रेम ग्वालिनी कहत न कछु बनि आई॥१२॥

 

जब कुब्जा ने यह सुना कि उद्धव श्री कृष्ण के कहने पर गोपियों को सन्देश ले कर ब्रज जा रहे हैं तो उसने उद्धव को अपने महल बुला लिया और कहा कि कृष्ण के सन्देश के बाद मेरा भी एक सन्देश दे देना । हे उद्धव ! तुम तो गोकुल जा रहे हो अतः एक सन्देश मेरा भी लेते जाओ । जब तुम कृष्ण का सन्देश गोपियों को दे देना तब उनसे एक हमारी बात भी कह देना । उनसे यह कहना कि माता – पिता ( देवकी और वासुदेव ) के प्रेम को जान कर ही श्री कृष्ण मथुरा आये थे । तुम्हें जानना चाहिए कि न तो श्री कृष्ण तुम्हारे प्रियतम हैं और न वो यशोदा के पुत्र ही हैं । यदि तुम ऐसा समझती हो तो यह तुम्हारा भ्रम है । जरा तुम अपने मन में यह सोचो और विचार करो कि तुमने श्री कृष्ण के साथ क्या भला किया ? कौन सा अच्छा व्यव्हार किया । कहाँ तुम मस्त अहीरनी और कहाँ वे श्री कृष्ण । अबोध बालक ! फिर भी तुमने उन्हें वश में कर लिया था । यही नहीं माता यशोदा ने तुच्छ मक्खन के लिए श्री कृष्ण को बहुत कष्ट दिया और तुम सब गोपियों ने मिलकर उन्हें बाँधने के लिए रस्सी लाकर दी उन्हें कष्ट देने में भी तुम्हारा भी बहुत बड़ा हाथ था । जरा विचार करो तुमेह ऐसा करने में थोड़ी भी दया नहीं आयी । छोटे बच्चे के लिए दया प्रदर्शित करने के बजाय तुमने उन्हें रस्सी से बंधवाया । इसके साथ ही राधा ने जो उनके साथ व्यव्हार किया उसे तुम अच्छी तरह जानती हो । तात्पर्य यह है कि राधा ने भी मानिनी के रूप में श्री कृष्ण को बहुत परेशान किया । मान करने पर भी जल्दी नहीं मानती थी । ये ही सब कारण थे जिस से लज्जित हो कर श्री कृष्ण ने ब्रज मंडल को त्याग दिया । अब ब्रज त्याग देने पर तुम सब दुखी क्यों होती हो ? तात्पर्य यह है कि यदि तुमने उनके साथ इस प्रकार व्यवहार ना किया होता तो श्री कृष्ण ब्रज मंडल छोड़ कर यहाँ क्यों आते ? कुब्जा की इस प्रकार की उलाहना पूर्ण बातें सुन कर श्री कृष्ण ने अपना मस्तक झुका लिया और दुविधा में पड़ गए । श्री कृष्ण की मानसिक स्थिति ऐसी विचित्र हो गयी कि उनसे कुछ कहते न बना क्योंकि इधर कुब्जा का प्रेम था उधर गोपियों का प्रेमाकर्षण । वास्तव में यह उनकी असमंजस की स्थिति थी ।

 

उद्धव का ब्रज में आना

राग मलार

कोऊ आवत है तन स्याम।
वैसेइ पट, वैसिय रथ-वैठनि, वैसिय है उर दाम॥
जैसी हुतिं उठि तैसिय दौरीं छाँड़ि सकल गृह-काम।
रोम पुलक, गदगद भई तिहि छन सोचि अंग अभिराम॥
इतनी कहत आय गए ऊधो, रहीं ठगी तिहि ठाम।
सूरदास प्रभु ह्याँ क्यों आवै बंधे कुब्जा-रस स्याम॥१३॥

 

उद्धव को दूर से आते देख कर गोपियों को ऐसा लगा मानो श्री कृष्ण ही यहाँ पधार रहे हों । लेकिन जब समीप से देखा तो प्रतीत हुआ कि ये कृष्ण नहीं उद्धव हैं । उद्धव को देखने पर उन्हें बड़ी निराशा हुयी।

 

कोई गोपी किसी गोपी से कह रही है – हे सखी ! श्याम वर्ण का कोई इधर आ रहा है । ( ऐसा लगता है कि श्री कृष्ण यहाँ पधार रहे हैं ) क्योंकि उसी तरह का इसका पीताम्बर है और रथ पर बैठने का ढंग भी वैसा ही है । तात्पर्य यह है कि जैसे श्री कृष्ण अक्रूर के साथ रथ पर बैठ कर मथुरा गए थे तो इसी मुद्रा में रथ में बैठे हुए थे और उनके वक्ष स्थल पर वैजयंती की माला भी उसी प्रकार की है अर्थात श्री कृष्ण की भांति ये भी माला धारण किये हैं । गोपियाँ उस व्यक्ति को देखकर जिस अवस्था में थीं उसी अवस्था में अपने घर के सब काम – काज छोड़ कर दौड़ पड़ीं और उस व्यक्ति के सुन्दर अंग को श्री कृष्ण जैसा विचार कर रोमांचित और गदगद हो गयीं तथा हर्षातिरेक में डूब गयीं । उद्धव को जब वे सब दूर से देख कर यही कह रही थीं कि श्री कृष्ण पधार रहे हैं तो उसी बीच इतना कहते ही उद्धव जी आ गए । श्री कृष्ण के स्थान पर उद्धव जी को देख कर गोपियों को इतनी अधिक निराशा हुयी और उनका विषाद इतना बढ़ गया कि वे जड़वत जहाँ थीं उसी स्थान पर ठगी जैसी रह गयीं और यही सोचने लगीं कि भला कुब्जा के प्रेम पाश में बंधे हुए श्री कृष्ण यहाँ क्यों आने लगे ? निराशा की झलक सूर के कई पदों में दृष्टिगत होती है ।

 

उद्धव का ब्रज में दिखाई पड़ना

राग मलार

है कोई वैसीई अनुहारि।
मधुबन ते इत आवत, सखि री! चितौ तु नयन निहारि॥
माथे मुकुट, मनोहर कुंडल, पीत बसन रुचिकारि।
रथ पर बैठि कहत सारथि सों ब्रज-तन[१] बाँह पसारि॥
जानति नाहिंन पहिचानति हौं मनु बीते जुग चारि।
सूरदास स्वामी के बिछुरे जैसे मीन बिनु वारि॥१४॥

 

रथारूढ़ मथुरा से आते हुए उद्धव को दूर से देख कर गोपियाँ अनुमान करती हैं कि मानो श्री कृष्ण ही चले आ रहे हैं ।

 

हे सखी ! कोई श्री कृष्ण की सी आकृति का प्रतीत हो रहा है अर्थात जैसी श्री कृष्ण की आकृति है वैसी ही उसकी भी आकृति है । यह मथुरा से इधर ही आ रहा है । उसे भर नेत्रों से ध्यानपूर्वक देखो । उसके मस्तक पर मुकुट , कानों में सुन्दर कुण्डल हैं और वह अपने शरीर पर सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं । वह रथ पर बैठ कर ब्रज की ओर अपने हाथ फैलाकर अपने सारथि से कुछ कह रहा है । व्यंजना यह है कि वह हम लोगों की ही चर्चा कर रहा है । हे सखी ! यद्यपि मैं उसे जानती नहीं परन्तु वह कुछ परिचित सा लगता है और ऐसा लगता है कि इसे देखे चार युग बीत गए । केवल आकृति को देख कर ही परिचित लग रहा है परन्तु यह कौन है ? इसको विस्तृत रूप से नहीं जानते । सूरदास के शब्दों में होने स्वामी कृष्ण से बिछड़ जाने पर गोपियाँ उसी प्रकार व्याकुलमना हैं जैसे जल बिन मछली ।

 

राग सोरठ

 

देखो नंदद्वार रथ ठाढ़ो।
बहुरि सखी सुफलकसुतआयो पज्यो सँदेह उर गाढ़ो॥
प्रान हमारे तबहिं गयो लै अब केहि कारन आयो।
जानति हौं अनुमान सखी री! कृपा करन उठि धायो।

इतने अंतर आय उपंगसुत तेहि छन दरसन दीन्हो।
तब पहिंचानि सखा हरिजू को परम सुचित तन कीन्हो॥
तब परनाम कियो अति रुचि सों और सबहि कर जोरे।
सुनियत रहे तैसेई देखे परम चतुर मति-भोरे।
तुम्हरो दरसन पाय आपनो जन्म सफल करि जान्यो।
सूर ऊधो सों मिलत भयो सुख ज्यों झख पायो पान्यो॥१५॥

 

उद्धव जी का रथ नन्द के द्वार पर पहुंचा तो गोपियों को यह संदेह हुआ कि कहीं पुनः अक्रूर जी न आ गए हों क्योंकि एक बार वे कंस के कहने पर ब्रजमंडल आये थे और अपने साथ कृष्ण और बलराम को अपने रथ पर बैठा कर मथुरा ले गए थे ।

 

हे सखी ! देखो तो नन्द के दरवाज़े पर एक रथ खड़ा है , लगता है , पुनः अक्रूर जी आ गए हैं क्योंकि वे पहले भी एक बार आये थे और कृष्ण और बलराम को अपने रथ पर बैठा कर ले गए थे । आज मेरे मन में इस प्रकार का बहुत बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया है । उस समय तो वे हमारे प्राण ले गए थे ( प्राण स्वरूप कृष्ण और बलराम को हमसे छीन कर हमें निष्प्राण बना गए ) अब किस लिए आये हैं ? अब हमारे पास क्या बचा है जो उसे लेने पुनः पधारे हैं ? हे सखी ! मैं अनुभव कर रही हूँ कि शायद वे मेरे ऊपर कृपा करने को दौड़ पड़े हैं ( व्यंग पूर्ण तात्पर्य यह है कि वे अब पुनः हमे चोट पहुंचने के लिए यहाँ तक आये हैं ) इतना परस्पर गोपियाँ सोच रही थीं कि उसी बीच तत्क्षण उद्धव ने आ कर गोपियों को दर्शन दिया और गोपियाँ श्री कृष्ण के मित्र उद्धव को पहचान कर मन और शरीर दोनों से प्रसन्न हुईं । भारतीय मर्यादा और शिष्टाचार के अनुरूप गोपियों ने उन्हें प्रणाम किया और प्रेमपूर्वक सबों ने अपने हाथ जोड़े ( हाथ जोड़कर उनका सत्कार किया ) और कहने लगीं कि जैसा हम लोग आपके सम्बन्ध में सुनते रहे वैसा ही आपको बुद्धि में कुशल और ह्रदय से भोले – भाले रूप में रखा । तुम्हारे दर्शन पाकर हम लोग धन्य हो गए और अपने जन्म को सार्थक और सफल समझा । सफल इसलिए समझती हैं कि आप हमारे प्रियतम कृष्ण के मित्र हैं ; सम्बन्ध भावना के कारण जो सुख उन्हें देखने पर मिलता था वही सुख आपको देखकर मिला । सूरदास के शब्दों में उद्धव से मिलकर गोपियों को उसी प्रकार का सुख आपको देख कर मिला जैसे पानी के बिना संतप्त मछलियां पानी पीकर सुखी हो जाती हैं । कृष्ण के वियोग ज्वाला में संतप्त गोपियों को उद्धव को देखने पर अपार सुख मिला ( श्री कृष्ण से मिलने की एक बलवती आशा मानस में उत्पन्न हुयी )

 

राग सोरठ 

कहौ कहाँ तें आए हौ।
जानति हौं अनुमान मनो तुम जादवनाथ पठाए हौ॥
वैसोइ बरन, बसन पुनि वैसेइ, तन भूषन सजि ल्याए हौ।
सरबसु लै तब संग सिधारे अब कापर पहिराए हौ॥
सुनहु, मधुप! एकै मन सबको सो तो वहाँ लै छाए हौ।
मधुबन की मानिनी मनोहर तहँहिं जाहु जहँ भाए हौ॥
अब यह कौन सयानप? ब्रज पर का कारन उठि धाए हौ।
सूर जहाँ लौं ल्यामगात हैं जानि भले करि पाए हौ॥१६॥

 

इसमें गोपियों ने व्यंग पूर्ण वाणी द्वारा यह व्यक्त किया है कि उद्धव जी कहाँ से आये हैं और यहाँ आने का उनका प्रयोजन क्या है ?

 

हे उद्धव ! यह तो बताइये कि आप कहाँ से पधारे हैं ? हमें तो ऐसा लगता है कि तुम्हें यादवनाथ ने मानो यहाँ भेजा है । तुम्हारा वर्ण और वस्त्र ( पीताम्बर ) भी वैसा ही है जैसा कि कृष्ण का है और तुम अपने शरीर पर आभूषण भी उन्हीं की भांति सज्जित किये हुए हो । आशय यह है कि इसी रूप रंग वाले श्री कृष्ण ने एक बार हम लोगों को धोखा दिया था । शायद उसी वेश में हमें दुबारा ठगने के लिए उन्होंने तुम्हें भेजा है । श्री कृष्ण तो इसके पूर्व हमारा सब कुछ ले कर चले गए अब किसे ले जाने के लिए तुम भेजे गए हो ? तात्पर्य यह है कि श्री कृष्ण हम सब के मन को तो पहले ही ले बैठे थे अब बचा ही क्या है जो दुबारा लेने तुम्हें भेजा है ? हे भ्रमर ! सच बात तो यह है कि हमारे पास तो एक ही मन था उसे लेकर वे मथुरा चले गए वहीँ विराजमान हो गए । अब दूसरा मन हमारे पास कहाँ है ? अब ऐसी स्थिति में यहाँ तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध न होगा अतः उत्तम यही होगा कि तुम मथुरा कि उन मानिनी मनोहर सुंदरियों के पास जाओ तुम प्रिय हो ( यहाँ मानिनी मनोहर कुब्जा के प्रति स्पष्ट व्यंग है ) अब तुम्हारी यह कौन सी चतुराई है कौन सी बुद्धिमानी है कि तुम ब्रज में दौड़े चले आये ? भला , ब्रज में आने का तुम्हारा क्या कारण है ? सूर के शब्दों में गोपियों का कथन है कि हे उद्धव ! हम तो जितने भी श्याम शरीर वाले हैं सब को भली भांति जानती है अर्थात तुम धोखे में न रहो कि हम तुम्हारे स्वभाव से अनभिज्ञ हैं , सत्य तो यह है कि श्याम शरीर वाले अक्रूर , कृष्ण और तुम सभी धोखेबाज और प्रवंचक हैं । तुम जैसे लोग विश्वसनीय नहीं हैं ।

 

राग नट

ऊधो को उपदेस सुनौ किन कान दै?
सुंदर स्याम सुजान पठायो मान दै॥ध्रुव॥
कोउ आयो उत तायँ जितै नँदसुवन सिधारे।
वहै बेनु-धुनि होय मनो आए नँदप्यारे॥
धाई सब गलगाजि कै ऊधो देखे जाय।
लै आईं ब्रजराज पै हो, आनँद उर न समाय॥
अरघ आरती, तिलक, दूब दधि माथे दीन्ही।

कंचन-कलस भराय आनि परिकरमा कीन्हीं॥
गोप-भीर आँगन भई मिलि बैठे यादवजात।
जलझारी आगे धरी, हो, बूझति हरि-कुसलात॥
कुसल-छेम बसुदेव, कुसल देवी कुवजाऊ।
कुसल-छेम अक्रूर, कुसल नीके बलदाऊ॥
पूछि कुसल गोपाल की रहीं सकल गहि पाय।
प्रेम-मगन ऊधो भए, हो. देखत व्रज को भाय॥
मन मन ऊधो कहै यह न बूझिय गोपालहि।
ब्रज को हेतु बिसारि जोग सिखवत ब्रजबालहि॥
पाती बाँचि न आवई रहे नयन जल पूरि।
देखि प्रेम गोपीन को, हो ज्ञान-गरब गयो दूरि॥
तब इत उत बहराय नीर नयनन में सोख्यो।
ठानी कथा प्रबोध बोलि सब गुरू समोख्यो॥
जो ब्रत मुनिवर ध्यावही पर पावहिं नहिं पार।
सो ब्रत सीखो गोपिका, हो, छाँड़ि विषय-विस्तार॥
सुनि ऊधो के बचन रहीं नीचे करि तारे।
मनो सुधा सों सींचि आनि विषज्वाला जारे॥
हम अबला कह जानहीं जोग-जुगुति की रीति।
नँदनंदन ब्रत छाँड़ि कै, हो, को लिखि पूजै भीति?
अबिगत, अगह, अपार, आदि अवगत है सोई।
आदि निरंजन नाम ताहि रंजै सब कोई॥

नासिका-अग्र है तहाँ ब्रह्म को बास।
अबिनासी बिनसै नहीं, हो, सहज ज्योति-परकास॥
घर लागै’औघूरि कहे मन कहा बँधावै।
अपनो घर परिहरे कहो को घरहि बतावै?
मूरख जादवजात हैं हमहिं सिखावत जोग।
हमको भूली कहत हैं हो, हम भूली किधौं लोग?
गोपिहु ते भयो अंध ताहि दुहुं लोचन ऐसे!
ज्ञाननैन जो अंध ताहि सूझै धौं कैसे?
बूझै निगम बोलाइ कै, कहै वेद समुझाय।
आदि अंत जाके नहीं, हो, कौन पिता को माय?
चरन नहीं भुज नहीं, कहौ, ऊखल किन बाँधो?
नैन नासिका मुख नहीं चोरि दधि कौन खाँधो[९]?
कौन खिलायो गोद में, किन कहे तोतरे बैन?
ऊधो ताको न्याव है, हो, जाहि न सूझै नैन॥
हम बूझति सतभाव न्याव तुम्हरे मुख साँचो।
प्रेम-नेम रसकथा कहौ कंचन की काँचो॥
जो कोउ पावै सीस दै[११] ताको कीजै नेम।
मधुप हमारी सौं कहो, हो, जोग भलो किधौं प्रेम॥
प्रेम प्रेम सों होय प्रेम सों पारहि जैए।
प्रेस बँध्यो संसार, प्रेम परमारथ पैए॥

एकै निहचै प्रेम को जीवन-मुक्ति रसाल।
साँचो निहचै प्रेम को, हो, जो मिलिहैं नँदलाल।
सुनि गोपिन को प्रेम नेम ऊधो को भूल्यो।
गावत गुन-गोपाल फिरत कुंजन में फूल्यो॥
छन गोपिन के पग धरै, धन्य तिहारो नेम।
धाय धाय द्रुम भेंटहीं, हो, ऊधो छाके प्रेम॥
धनि गोपी, धनि गोप, धन्य सुरभी बनचारी।
धन्य, धन्य! सो भूमि जहाँ बिहरे बनवारी॥
उपदेसन आयो हुतो मोहिं भयो उपदेस।
ऊधो जदुपति पै गए, हो, किए गोप को बेस॥
भूल्यो जदुपति नाम, कहते गोपाल गोसाँई।
एक बार ब्रज जाहु देहु गोपिन दिखराई॥
गोकुल को सुख छाँड़ि कै कहाँ बसे हौ आय।
कृपावंत हरि जानि कै, हो, ऊधो पकरे पाय॥
देखत ब्रज को प्रेम नेम कछु नाहिंन भावै।
उमड़्यो नयननि नीर बात कछु कहत न आवै॥
सूर स्याम भूतल गिरे, रहे नयन जल छाय।
पोंछि पीतपट सों कह्यो, ‘आए जोग सिखाय’?॥१७॥

 

उद्धव के आगमन पर सभी गोपियाँ शोर मचाती हुई उनके पास पहुँच गयीं और ऐसे शोर गुल में उद्धव जी अपना जो ज्ञान अलापते थे वह सुनाई नहीं पड़ता था । इस पर किसी गोपी ने कहा कि हे सखियों ! उद्धव जी जो कुछ कह रहे हैं उसे ध्यानपूर्वक क्यों नहीं सुनती ? क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि इन्हें श्यामसुंदर ने बहुत सम्मानपूर्वक यहाँ भेजा है । अरे ! ये तो वहां से यहाँ आये हैं जिधर हमारे श्री कृष्ण गए थे । बंशी की ध्वनि भी उसी तरह हो रही है जैसे श्री कृष्ण किया करते थे । ऐसा लगता है मानो प्रियतम श्री कृष्ण आ गए हों । उसकी बातों को सुन कर सभी गोपियाँ आनन्दोन्मत्त होकर उधर की ओर दौड़ पड़ीं और जाकर देखा कि उद्धव जी आ गए हैं । वे सब उद्धव जी को नन्द जी के पास ले आयीं और उन्हें देख कर वे सब फूली नहीं समातीं । उन सबों ने उद्धव को अर्घ्य दिया , उनकी आरती उतारी और मस्तक पर दूब और दही का टीका लगाया । यही नहीं , स्वर्ण – घट को जल से भर कर के उनकी परिक्रमा की । उद्धव के आगमन का समाचार मिलते ही नन्द के आँगन में गोपों की बहुत बड़ी भीड़ हो गयी । गोपों के आने पर उद्धव जी ने सबसे भेंट की और बैठ गए । गोपियों ने उद्धव के समक्ष जल पात्र रख दिया और कृष्ण का समाचार ( कुशल – क्षेम ) पूछने लगीं। वे सब वासुदेव, कुब्जादेवी , अक्रूर , बलराम और श्री कृष्ण का सम्यक रूपेण कुशल क्षेम पूछकर उद्धव जी के चरणों को पकड़ कर बैठ गयीं । गोपियों की ऐसी प्रेम – विह्वलता और ब्रजवासियों के ऐसे भाव को देखकर उद्धव जी प्रेम मग्न हो गए क्योंकि उन्हें यह आशा नहीं थी कि ब्रज वासियों का प्रेम इस कोटि का होगा। वे मन ही मन कहने लगे कि श्री कृष्ण की यह बात समझ में नहीं आती कि वे ब्रज प्रेम को भुला कर ब्रज बालाओं को योग की शिक्षा देना चाहते हैं । उद्धव से पट्टी पढ़ाते नहीं बन रहा क्योंकि उनके नेत्र आंसुओं से भर गए हैं । गोपियों की प्रेम दशा देख कर और  उनकी अटल भक्ति और प्रेम के समक्ष उनके ज्ञान का गर्व नष्ट हो गया । उन्होंने किसी तरह इधर – उधर की बातें बातों द्वारा अपने को बहलाया और अपने नेत्रों के आंसुओं को सुखाया । इसके पश्चात सब को बुलाकर गुरु की भांति सहेज रखे ज्ञान के उपदेश को बताना आरम्भ किया । उद्धव ने कहा , हे गोपियों ! तुम सब विषय वासना के प्रपंच को त्याग कर उस व्रत का अर्थात परब्रह्म के चिंतन का पालन करो । उस व्रत को सीखो जिसे श्रेष्ठ मुनिगण सदैव मनन किया करते हैं और जिस ब्रह्म का वे पार नहीं पाते । उद्धव की ऐसी बातें सुन कर गोपियों की पुतलियां नीचे हो गयीं अर्थात सबने अपनी आँखों को झुका लिया । उनकी मनोदशा ऐसी लता के समान हो गयी जिसे पहले अमृत से सींच कर पुनः विष की ज्वाला से दग्ध कर दिया गया हो। उद्धव ने पहले तो मीठी – मीठी बातें की और ऐसी अमृत मयी वाणी द्वारा उन्हें शीतल किया । अब ऐसी कटुताभरी वाणी अर्थात ज्ञानोपदेश की ऐसी बातों से उनके मानस को संतप्त कर दिया । गोपियों ने उद्धव का उत्तर देते हुए कहा कि हम सब अबला और सामान्य स्त्रियां हैं और योग की युक्तियों को क्या जाने अर्थात योग की गंभीर बातों को क्या समझें ? भला श्री कृष्ण के व्रत और उनके प्रेम को छोड़ कर कौन दीवार पर चित्र बना कर उसकी पूजा करे । हम सब तो कृष्ण के रूप की उपासिका हैं । आपके निर्गुण ब्रह्म की कौन उपासना करे ? हे उद्धव ! तुम्हार ब्रह्म तो अज्ञेय , अग्राह्य , अपार आदि रूपों में सर्वप्रथम जाना गया है और जिसका नाम तो आदि निरंजन अर्थात मायारहित है , पर उसे प्रसन्न रखने की सब चेष्टा करते हैं । दूसरे शब्दों में सुख और दुःख के विकारों से रहित है उसे कैसे प्रसन्न किया जाये ? इस ब्रह्म का स्थान तो नेत्र और नाक के अग्रभाग में है अर्थात त्रिकुटी में रहता है । यह तो अविनाशी है और इसका कभी नाश नहीं होता । यह सहज ज्योति या ब्रह्म प्रकाश रूप है । भला हम लोगों का मन वहां कैसे टिक सकता है ? वह तो घूम फिर कर अपने ठिकाने लगता है अर्थात बलात यदि इसे ब्रह्मोपासना की ओर लगाते हैं तो यह घूम फिर कर श्री कृष्ण के प्रेम में ही तन्मय हो जाता है । इस भटकाव की स्थिति में इस मन का अन्यत्र जाना संभव नहीं है । भला कोई अपना घर छोड़कर दूसरों को अपना घर कहाँ बतावैं ? भाव यह है कि श्री कृष्णोपासना को त्याग कर अपना सच्चा उपास्य किसे कहें ? अतः उसकी दशा तो उस ग्रह – विहीन की भांति हो जाएगी जो इधर – उधर भटकेगा । उद्धव जी तो मूर्ख हैं जो हमें योग की शिक्षा देते हैं । वे हमें भ्रमित बताते हैं अर्थात अज्ञानी समझते हैं , परन्तु हमें तो ऐसा लगता है कि लोग ही भूले हैं – हम भ्रमित नहीं हैं । हमें तो ऐसा प्रतीत होता है कि उद्धव के इस प्रकार दोनों ही नेत्र गोपियों से भी अधिक अंधे हो गए हैं । उन्हें इन दोनों नेत्रों से सुझाई नहीं पड़ता  ठीक ही है , जो ज्ञान नेत्र से अंधे हैं , जिनकी वाह्य आँखों के साथ ही ह्रदय की भी आँखें फूट चुकी हैं , उन्हें कैसे दिखाई पड़ेगा ? जिनके चारों नेत्र फूट गए हैं , उन्हें क्या ज्ञात होगा ? ये तो शास्त्रोक्त बातों को समझाते हैं । शास्त्रों का प्रमाण देते हैं और समझा कर वेदों की बातें हमसे कहते हैं । वेदों का साक्ष्य मानते हैं लेकिन हम इनसे पूछती हैं कि जिस ब्रह्म के आदि और अंत का पता नहीं है उसके माता – पिता कौन हैं ? भला यह तो बताओ कि जिसके चरण और मुख नहीं हैं उसे ओखली में किसने बाँधा ?  बिना चरण के वह कैसे बांधा गया और नेत्र , नासिका और मुखविहीन उसने दही कैसे चुरा कर खाया ? अर्थात हमारे कृष्ण ने साकार रूप में ही सभी लीलाएं कीं , वह निराकार नहीं है । यही नहीं , उन्हें किसने गोद में खिलाया और किसने तोतली वाणी का प्रयोग किया ? दूसरे शब्दों में यदि वह निराकार है तो उन्हें यशोदा ने अपनी गोद में कैसे खिलाया और उन्होंने अपनी तोतली वाणी में कैसे नन्द – यशोदा आदि को रिझाया ? हे उद्धव ! ये बातें तो उसके लिए उचित प्रतीत होंगीं जिसे नेत्रों से दिखाई नहीं पड़ता अर्थात जो अज्ञानी एवं जड़ हैं । लेकिन हम तो सहज भाव से पूछती हैं और इसका सच्चा न्याय तो तुम्हारे मुख से है । इसकी सच्चाई का निरूपण तो तुम्हारे ऊपर छोड़ा गया है अर्थात तुम इसका क्या न्याय करते हो ? हमारा कथन यह है कि हमने प्रेम ( प्रेम कथा ) और तुम्हारे नियम ( योग ) में कौन स्वर्ण ( अधिक कीमती ) है और कौन कांच ( नगण्य ) है ? अरे , योग तथा नियम कि साधना तो उसके किये करनी चाहिए जिसे सर देकर भी प्राप्त किया जा सके अर्थात कठिन साधना से जो मिल सके , लेकिन तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म कि बात ही भिन्न है , उसे सर देकर भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । पुनः गोपियाँ उद्धव से पूछती हैं , तुम्हें सौगंध है , यह बताएं कि योग और प्रेम में कौन उत्तम है ? किसकी साधना सहज साध्य है? वास्तव में प्रेम तो प्रेम से होता है अर्थात प्रेम मार्ग के अवलंब से प्रेम की प्राप्ति होती है और प्रेम मार्ग से ही भवसागर से पार लगा जा सकता है । देखा जाये तो सारा जगत प्रेम के बंधन में बँधा है । यहाँ सब प्रेम का नाता है और प्रेम से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है । निश्चय ही एकमात्र प्रेम से ही रसमय जीवन का मोक्ष प्राप्त होता है । मोक्ष सदृश आनंदमय जीवन की प्राप्ति होती है । सच्चे और अटल प्रेम से ही नन्दलाल की प्राप्ति भी होगी । गोपियों की ऐसी अटल भक्ति और प्रेम को जानकार उद्धव को अपना नियम और योग मार्ग भूल गया और वे श्री कृष्ण के गुणों को गाते हुए कुंजों में आनंद मग्न घूमने लगे । वे क्षण में गोपियों के चरण पकड़ते और कहते कि हे गोपियों ! तुम्हारा यह प्रेम धन्य है , तुम महान हो , और कभी प्रेमोन्मत्त होकर दौड़ – दौड़ कर ब्रजमंडल के वृक्षों को भेंटने लगते। यहाँ कृष्ण के सम्बन्ध भाव से वे वृक्षों को आलिंगित करते थे और कहते गोपियाँ धन्य हैं, गोप धन्य हैं और वन में चरने वाली ये गायें धन्य हैं और वह ब्रजभूमि भी धन्य और महान  है जहाँ श्री कृष्ण विचरण करते रहे । मैं तो यहाँ गोपियों को ज्ञान का उपदेश देने आया था , किन्तु इसके विपरीत आज गोपियों के प्रेम का उपदेश मुझे मिला । अर्थात मैं ज्ञानोन्माद में भ्रमित था , लेकिन गोपियों के सच्चे मार्ग से मुझे शांति मिली । इस प्रकार उद्धव जी गोप वेश में श्री कृष्ण के पास मथुरा गए और वहां वे श्री कृष्ण के यदुपति नाम को भूल गए तथा उन्हें ‘ गोपाल गोसाईं ‘ कहने लगे । वे श्री कृष्ण से कहने लगे कि आप एक बार पुनः ब्रज जाकर गोपियों को दर्शन दें । तुम भला गोकुल के ऐसे सुख को छोड़ कर यहाँ कहाँ आ कर बस गए ? इतना कह कर श्री कृष्ण को भक्त वत्सल जान कर उनके चरणों को उद्धव जी ने पकड़ लिया । वे मन ही मन अपने ज्ञान गर्व से अत्यंत लज्जित हुए । उद्धव को अब ब्रज प्रेम को देखते हुए अपनी योग साधना अच्छी नहीं लगती । वे प्रेम में इतने गदगद हो गए कि उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु भर गया और उनसे कुछ कहते न बना । उनकी वाणी रुक गयी । वे प्रेम विह्वल अवस्था में श्री कृष्ण के समक्ष पृथ्वी पर गिर पड़े । श्री कृष्ण ने अपने पीताम्बर से उनके प्रेमाश्रुओं को पोछा और व्यंग्य गर्भित वाणी में कहा । गोपियों को योग सीखा आये ?

 

 

राग धनाश्री

हमसों कहत कौन की बातें?
सुनि ऊधो! हम समुझत नाहीं फिरि पूँछति हैं तातें॥
को नृप भयो कंस किन मार्‌यो को वसुद्यौ-सुत आहि?
यहाँ हमारे परम मनोहर जीजतु हैं मुख चाहि॥
दिनप्रति जात सहज गोचारन गोप सखा लै संग।
बासरगत रजनीमुख[२] आवत करत नयन-गति पंग॥
को ब्यापक पूरन अबिनासी, को बिधि-बेद-अपार?
सूर बृथा बकवाद करत हौ या ब्रज नंदकुमार॥१८॥

 

इस पद में गोपियाँ उद्धव को बेवकूफ बना रही हैं । वे जानबूझ कर उनसे पूछती हैं और कहती हैं कि जिनकी चर्चा तुम यहाँ कर रहे हो , वे कौन हैं ?

 

हे उद्धव ! तुम हमसे किनकी बात कर रहे हो ? हम तो जानती नहीं कि तुम क्या कह रहे हो ? हमारी समझ में तुम्हारी बातें नहीं आ रही हैं , इसलिए हम तुमसे पुनः पूछ रही हैं कि मथुरा में कौन राजा हुआ और किसने कंस को मारा अर्थात तुम जो यह बता रहे हो कि श्री कृष्ण मथुरा के राजा हैं और उन्होंने कंस का वध किया यह हमारे लिए भ्रमात्मक है । यह भी नहीं जानती कि वासुदेव का पुत्र कौन है ? क्योंकि हमारे यहाँ तो श्री कृष्ण विराजमान हैं और हम ऐसे मनोहर श्री कृष्ण के मुख को नित्य प्रति देख कर जीती हैं उनका यह रूप हमें प्राणों से भी अधिक प्रिय है । वे आज भी नित्य अपने गोपमित्रों के साथ सहज भाव से वन में गाय चराने जाया करते हैं और दिन के समाप्त होने पर वे संध्या के समय वन से लौटते हैं और हमारे नेत्रों को स्तब्ध कर देते हैं । श्री कृष्ण की ऐसी मुद्रा को देखकर स्तब्ध हो जाते हैं । उन्हें हम सब अपलक देखते रह जाते हैं । हमारी समझ में नहीं आता कि कौन व्यापक , पूर्ण और अविनाशी ब्रह्म है और कौन ब्रह्मा और वेद के लिए अपार है । कौन है जिसका पार ब्रह्मा और वेद नहीं पा पाते ?  सूर के शब्दों में गोपियों का कथन है कि तुम व्यर्थ ही बकवास व्यर्थ की बातें कर रहे हो । अरे इस ब्रज में तो नित्य नंदकुमार का दर्शन होता है अर्थात तुम जिस कृष्ण की चर्चा कर रहे हो , वे कोई और हैं क्योंकि हमारे श्री कृष्ण तो यहाँ सदैव विराजमान हैं ।

 

राग सारंग

तू अलि! कासों कहत बनाय?
बिन समुझे हम फिरि बूझति हैं एक बार कहौ गाय॥
किन वै गवन कीन्हों सकटनि चढ़ि सुफलकसत के संग।
किन वै रजक लुटाइ बिबिध पट पहिरे अपने अंग?
किन हति चाप निदरि गज मार्‌यो किन वै मल्ल मथि जाने?
उग्रसेन बसुदेव देवकी किन वै निगड़ हठि भाने?
तू काकी है करत प्रसंसा, कौने घोष[३] पठायो?
किन मातुल बधि लयो जगत जस कौन मधुपुरी छायो?
माथे मोरमुकुट बनगुंजा, मुख मुरली-धुनि बाजै।
सूरदास जसोदानंदन गोकुल कह न बिराजै ॥१९॥

 

प्रस्तुत पद में गोपियों ने व्यंग्य गर्भित वाणी में उद्धव का उपहास किया है । उद्धव जी निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दे रहे हैं । गोपियों की उपासना की यह पद्दति सर्वथा अमान्य है । वे श्री कृष्ण के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानतीं ।

 

हे भ्रमर ! ( उद्धव से अभिप्राय है ) तुम किस से बना – बना कर कह रहे हो – हम तो इसे समझ नहीं पा रहे हैं अतः हम पुनः तुमसे पूछ रहे हैं कि आप अपने ब्रह्म की महिमा एक बार गाकर और उसका गुणानुवाद कर के हमें बताओ । यहाँ गाने की व्यंजना भ्रमर की गुनगुनाहट से है । हमें तुम यह तो बताओ कि अक्रूर के साथ रथ पर बैठ कर मथुरा की ओर किसने प्रस्थान किया और वे कौन थे जिन्होंने मथुरा में धोबी के वस्त्रों को लुटा कर अपने शरीर पर राजसी वस्त्रों को धारण किया ? किसने कंस के सुरक्षित धनुष को तोड़ा और कंस के कुवलयापीड़ नामक हाथी का निरादर कर के मारा ? ऐसे बलशाली हाथी के दांतों को तोड़कर उसका वध किया। यही नहीं , किसने मुष्टिक और चाणूर नाम के पहलवानों को मारा ? भला यह तो बताओ किसने उग्रसेन कंस के पिता , वसुदेव और देवकी की बेड़ियाँ हठ पूर्वक तोड़ीं ? तुम किसकी प्रशंसा कर रहे हो ? और अहीरों की इस बस्ती में तुम्हें किसने भेजा है ? किसने अपने मामा कंस का वध कर के संसार में यश प्राप्त किया और किसकी प्रभुता और धाक समस्त मथुरा में छायी हुयी है ? कौन मथुरा में बहुचर्चित है ? यहाँ गोकुल में तो  मस्तक पर मयूर मुकुट और गले में वन की गुंजा की माला धारण किये हुए मुख से मुरली की ध्वनि निकालते हुए बताओ तो जरा क्या यशोदानन्दन श्री कृष्ण चंद्र विराजमान नहीं हैं? तात्पर्य यह है कि ब्रज में तो सर्वत्र जन – जन में श्री कृष्ण का रूप छाया हुआ है , फिर आप इस निर्गुण का सन्देश किसके लिए लाये हैं और इसे कौन ग्रहण करेगा ?

 

राग सारंग

हम तो नंदघोष की वासी।
नाम गोपाल, जाति कुल गोपहि, गोप गोपाल-उपासी॥
गिरिवरधारी, गोधनचारी, बृन्दावन – अभिलासी।
राजा नंद, जसोदा रानी, जलधि नदी जमुना सी॥
प्रान हमारे परम मनोहर कमलनयन सुखरासी।
सूरदास प्रभु कहौं कहाँ लौं अष्ट महासिधि दासी॥२०॥

 

गोपियाँ नन्द गाँव की निवासिनी होने में गर्व का अनुभव करती हैं । चूंकि श्री कृष्ण ने इसी गाँव में गोपियों के साथ नाना प्रकार की लीलाएं रचीं । इसी से यहाँ गोपियाँ अष्ट सिद्धियों से बढ़ कर आनद का अनुभव करती हैं ।

 

गोपियों का कथन है कि हम सब का यह परम सौभाग्य हैं कि हम नंदगाव अर्थात गोकुल की निवासिनी हैं । हमारा नाम गोपाल ( गायों को पालने वाली ) हमारी जाति और कुल भी गोप ( अहीर ) हैं । गोप होने के कारण गोपाल ( श्री कृष्ण ) की उपासिका हैं । हमारे कृष्ण तो गोवर्धन को उठाने वाले , गायों को चराने वाले और वृन्दावन के प्रेमी हैं । हमारे संकट में ये गोवर्धन पर्वत उठा कर हमारी रक्षा करते हैं और गायों को चरा कर हम लोगों में पशु प्रेम उत्पन्न करते हैं । यही नहीं , वे वृन्दावन की प्राकृतिक सुषमा के प्रेमी हैं । उनमें मात्रा – भूमि के प्रति अनन्य अनुराग भी है । हमारे राजा तो नन्द और रानी यशोदा जी हैं । यहाँ प्रवाहित होने वाली यमुना तो हमारे लिए समुद्र के समान है । हमारे प्राण तो अत्यंत सौंदर्यशाली कमल नेत्र , आनंद राशि श्री कृष्ण हैं । कहाँ तक कहें उनके सुख के समक्ष आठों सिद्धियां भी दासी हैं । आठों सिद्धियों का सुख भी कृष्ण के सुख के समक्ष नगण्य है ।

 

राग केदार

गोकुल सबै गोपाल-उपासी।
जोग-अंग साधत जे उधो ते सब बसत ईसपुर कासी।।
यध्दपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रसरासो।
अपनी सीतलताहि न छाँड़त यध्दपि है ससि राहु-गरासी।।
का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भजन तजि करत उदासी।
सूरदास ऐसी को बिरहनि माँ गति मुक्ति तजे गुनरासी ?21

 

उद्धव के ज्ञानोपदेश योग साधना की ज्ञान की बातें सुनकर गोपियाँ उद्धव के ज्ञान के विरोध में श्री क्रृष्ण के प्रति प्रेम साधना की प्रतिष्ठा कर रही हैं।

 

हे उद्धव ! गोकुल में सभी नर नारी उस गोपाल के उपासक हैं, श्री कृष्ण के उपासक हैं। हे उद्धव ! जो लोग तुम्हारे इस अष्टांग योग की साधना करने वाले हैं, वे यहां नहीं रहते वे सब शिव नगरी में निवास करते हैं अर्थात काशी में निवास करते हैं। यद्यपि श्री कृष्ण ने हमें त्याग दिया है और अनाथ कर दिया है फिर भी हम उनके चरणों के रूप राशि में ही रत हैं । उनमें हमारा अनुराग और प्रेम है । जिस प्रकार चन्द्रमा राहु के द्वारा ग्रसित हो जाने पर भी अपना जो स्वभाविक गुण है सीतलता प्रदान करने वाला उसे नहीं छोड़ता है। उसी प्रकार श्री कृष्ण भले ही हमें त्याग दें किन्तु हम अपना स्वभाविक धर्म नहीं छोड़ेंगे। ये जो मन है उनके चरणों में ही ध्यानस्थ रहेगा । हम समझ नही पातीं कि हमारे किस अपराध के दंड के रुप में कृष्ण ने हमारे लिए योग का संदेश लिख भेजा है। वे हमें इस प्रकार हरि भजन को छोड़ कर संसार से विरक्त हो जाने को कहना चाहते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि यहां ब्रज में ऐसी कौन विरहणी है जो गुणों की खान को छोड़कर अर्थात श्री कृष्ण के प्रति प्रेम के सम्मुख गोपियों के लिए निर्गुण की उपासना से प्राप्त मुक्ति का कोई महत्व नहीं है हम सबके लिए तो कृष्ण प्रेम प्राण के समान हैं।

 

 

राग धनाश्री

जीवन मुँहचाही को नीको।
दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को।।
नयनन मूंदी-मूंदी किन देखौ बंध्यो ज्ञान पोथी को।
आछे सुंदर स्याम मनोहर और जगत सब फीको।।
सुनौ जोग को कालै कीजै जहाँ ज्यान है जी को ?
खाटी मही नहीं रूचि मानै सूर खबैया घी को।।22

 

उद्धव के द्वारा गोपियों को निर्गुण का उपदेश सुनाये जाने के बाद गोपियाँ चुप नहीं रहतीं वरन अनेक प्रकार से अपने प्रेम मार्ग की श्रेष्ठता को प्रतिपादित करती हुई उद्धव से कह रही हैं।

 

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! अपने प्रीतम को अच्छा लगने वाली जो प्रेमिका है उसका जीवन ही अच्छा है। अर्थात सफल है। प्रीतम के मन में समाने के कारण वह जीवन संसार के फल को भोग लेता है इसलिए उसी का जीवन अच्छा है। उसी का जीवन सफल है। कुब्जा से ईर्ष्या का भाव प्रकट करती हुई गोपियाँ कहती हैं, जीवन तो उस कुब्जा का सफल है क्योंकि वह कृष्ण की अति प्रिय प्रेमिका है वह अपने प्रीतम कन्हैया का प्रतिदिन दर्शन करती हैं, उनको स्पर्श करती है और स्पर्श से उसे आनंद भी प्राप्त होता है। हे उद्धव ! ऐसा कौन है जिसने आँखें मूँद-मूँद करके पुस्तक के ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो अर्थात आँखें खोलकर अध्ययन से ही ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। उसी प्रकार प्रियतम के पास रहने से दर्शन और स्पर्श से ही जीवन सफल नहीं होता । यह तो तभी सम्भव है जब प्रेम की रीति से परिचित हो और प्रियतम को रिझाने में समर्थ हो । इसलिये कुब्जा को श्री कृष्ण के पास रहकर भी , उनका प्रतिदिन दर्शन करके भी, उनका स्पर्श प्राप्त करके भी इतना सुख और आनंद प्राप्त नहीं होता क्योंकि वह प्रेम करने की उचित रीति से परिचित नहीं है क्योंकि जीवन तो सफल तभी होगा जब प्रेम की रीति से सुपरिचित हो और प्रियतम को रिझाने में समर्थ। हे उद्धव ! हम तुम्हारे योग को लेकर क्या करें? यह हमारे किसी काम का नहीं क्योंकि इससे तो हमें प्राणहीन का भय है। योग साधना पर अमल करने से हमें अपने प्राण प्रिय से कृष्ण से बिछुड़ना पड़ेगा और यदि हम उनसे बिछड़ गए तो उनके बिना हमारा जीवित रहना सम्भव नहीं है और इसीलिए तुम्हारे इस योग को अपना लेने में प्राणों की हानि का भय है। सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति जो शुद्ध घी का प्रयोग करता है वह व्यक्ति खट्टी छाछ से प्रसन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार श्री कृष्ण के प्रेमामृत का पान करने वाला यह जो हमारा हृदय है आपके योग की नीरस बातें सुनकर आनंदित नही होगा।

 

राग काफी

आयो घोष बड़ो व्योपारी।
लादी खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी।।
फाटक दैकर हाटक माँगत भौरे निपट सुधारि।
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारि।।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी।।
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।23

 

निर्गुण ब्रह्म की उपासना की शिक्षा देने आये उद्धव को गोपियाँ खरी खोटी सुनाती हुई आपस में चर्चा करते हुए कह रही हैं।

 

गोपियाँ आपस में बात करती हुई कहती हैं कि आज अहीरों की बस्ती में एक बड़ा व्यापारी आया हुआ है। उसने ज्ञान और योग के गुणों से युक्त अपनी जो गठरी है वो लाकर ब्रज में उतार दी है। उसने हमें तो बिलकुल भोला और अज्ञानी समझ लिया है। वह फटकन के समान जो तत्व हीन पदार्थ है , जो भूसा है , जो बेकार का कूड़ा कचरा है वह देकर के उसके बदले में सोना चाहता है अर्थात सोने के समान बहुमूल्य श्री कृष्ण को मांग लिया है। ऐसा लगता है इसने आरम्भ से ही लोगों को ठगा है तभी तो इस भारी बोझ को सिर पर लिए घूम रहा है। इस व्यपारी का जो सामान है वह बिलकुल व्यर्थ है और इसी कारण यह बिक नहीं रहा है और इसे हानि उठानी पड़ रही है। इसका सामान कोई भी नहीं खरीद रहा और इसलिए इसे अपने इस भारी बोझ को लादकर इधर उधर भटकना पड़ रहा है। यहां हम में से ऐसी कौन नासमझ है और अज्ञानी है जो इसका माल खरीद कर धोखा खा जाएगी। आज तक ऐसा मूर्ख हमने कहीं नहीं देखा है जो अपना दूध छोड़कर और खारे जल के जो कुँए का पानी है उसे वह पिये और गोपियाँ अंत में कहती हैं, हे उद्धव ! तुम शीघ्र ही यहां से चले जाओ ! बिना देर किये तुम शीघ्र मथुरा चले जाओ और जो तुम्हारा महाजन है , तुम्हारा जो बड़ा सेठ है , यदि तुम हमसे लाकर मिला दोगे, हमारा दर्शन करा दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा पुरस्कार प्राप्त होगा अर्थात जो भी तुम मांगोगे वह हम तुम्हें दे देंगे।

 

राग काफी

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
यह व्योपार तिहारो ऊधो ! ऐसोई फिरि जैहै।।
जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै।
दाख छाँड़ि कै कटुक निम्बौरी को अपने मुख खैहै ?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै ?।।24

 

गोपियाँ उद्धव के ज्ञान योग को निःसार बताकर उन पर गंभीर व्यंग्य करती हैं और कह रही हैं।

 

हे उद्धव ! तुम्हारा ये ज्ञान योग रूपी ठगी और धूर्तता का मार्ग है वह ब्रज में नहीं बिक पायेगा। यह सौदा यहां से इसी प्रकार लौटा दिया जाता है , यहां इसे कोई नहीं खरीदेगा। हे मधुकर ! तुम यह सामान जिसके लिए इतने दूर तक आये हो , यहाँ पर यह किसी को पसंद नहीं आएगा और किसी के हृदय में नहीं समा पयेगा। ऐसा कौन मुर्ख होगा जो अपने अंगूर के दानों को छोड़कर नीम के कड़वे फल निबोरी को खायेगा और मूली के पत्तों के बदले में तुम्हें मोतियों के दाने कौन देगा? गोपियाँ यह कहना चाहती हैं कि तुम्हारा ये जो ब्रह्म है वो निर्गुण ब्रह्म है । वह नीम के फल के समान कड़वा और मूली के पत्ते के समान फीका है अर्थात तुच्छ है त्याज्य है और हमारे श्री कृष्ण जो हैं वो अंगूर के समान मधुर और मोतियों के समान बहुमूल्य हैं । इसीलिए हम ऐसे मूर्ख नही हैं जो कृष्ण को छोड़कर के तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की साधना करें अर्थात ऐसा कौन मूर्ख है जो सम्पूर्ण गुणों के भंडार सगुण रूपी कृष्ण को छोड़कर तुम्हारे गुणहीन निर्गुण ब्रह्म के साथ निर्वाह करे या उसकी साधना करे।

 

राग नट

आये जोग सिखावन पाँड़े।
परमारथि पुराननि लादे ज्यों बनजारे टांडे।।
हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखै ते राँडें।
कहौ, मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँडे।।
कहु षटपद, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।।
सूरदास तीनों नहिं उपजत धनिया, धान कुम्हाड़े।।25

 

इस पद्य में उद्धव के ज्ञान योग की शिक्षा से गोपियाँ नाराज और उदास हैं। उन्होंने उद्धव के ज्ञान की खिल्ली उड़ाई है । गोपियों के अनुसार उद्धव मात्र ज्ञान के भार को ढोते फिर रहे हैं उन्हें व्यावहारिक जीवन का अनुभव नहीं हैं ।

 

हे उद्धव ! तुम पंडित के समान उसी प्रकार हमें जोग सिखाने के लिए आ गए जिस प्रकार बंजारे लोग अपने सिर पर माल लादे-लादे बेचने के लिए घूमते फिरते हैं । तुम भी उन्हीं के समान परमार्थ की शिक्षा देने वाले , पुराणों के ज्ञान के बोझ को अपने सिर पर लादे-लादे फिर रहे हो । तुम योग को सिखाने वाले पंडे के समान अपने परमार्थ रूपी पुरानी बासी वस्तु को लिए फिरते हो और हमारे ऊपर मढ़ना चाहते हो। हमारी गति तो अपने पति के साथ है और हमारे पति है कमल नयन श्री कृष्ण जो हमें शरण और प्रतिष्ठा देने वाले हैं । यह योग हमारे लिए नहीं है । यह योग तो उनके लिए है जो विधवा और अनाथ हैं । हमारे पति अभी जीवित हैं । अतः हमारे लिए योग विकार की और बेकार की वस्तु है। हे उद्धव ! तुम्हीं बताओ कि एक ही म्यान में दो तलवारें कैसे समा सकती हैं? जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवार नहीं समा सकती हैं उसी प्रकार हमारे लिए योग सीखना भी बेकार है क्योंकि योग की साधना हमारे लिए असम्भव है । हमारे हृदय में तो श्री कृष्ण समाये हुए हैं। इसमें योग नहीं समा सकता। इसमें तो तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की समाई नहीं हो सकती। हे भ्रमर ! हे उद्धव ! हमें बताओ कि हाथी के साथ गन्ने को किस प्रकार खाया जा सकता है क्योंकि हाथी तो एक ही बार में अनेक गन्ने खा जाता है । जिस प्रकार हाथी के साथ गन्ना खाने में मनुष्य कोई होड़ या स्पर्धा नहीं कर सकता उसी प्रकार हम अबला नारियों के लिए योग मार्ग की कठिन और दुरूह साधना करना कठिन है। हे उद्धव ! बिना दूध, रोटी और घी खाये केवल हवा के भक्षण से अर्थात तुम्हारा ये प्राणायाम और योग  करने से किसकी भूख मिट सकती है अर्थात कोई जीवित नही रह सकता अर्थात जिस प्रकार यह असम्भव है कि केवल प्राणायाम से भूख मिट जाय उसी प्रकार हमारे लिए भी योग की साधना करना असम्भव है। गोपियाँ कह रही हैं कि तुम किस वजह से यह बातें बना बना के व्यर्थ की बकवास कर रहे हो आखिर हमने ऐसी कौन सी चोरी की है जिसका तुम हमें दण्ड देने आये । वास्तव में तुम स्वयं चोर हो क्योंकि जो हमारे सर्वस्व हैं वे है कृष्ण और वे हमारे हृदय में विराजमान हैं। तुम उन्हें हमसे छीनकर ले जाने के लिए आये हो । तुम अच्छी प्रकार जानते हो कि धनिया , धान और काशीफल इन तीनों की खेती एक स्थान पर होना सम्भव नहीं है अर्थात असंभव है। इसीलिए हमारे लिए श्री कृष्ण को छोड़कर तुम्हारे परब्रह्म को स्वीकार करना असम्भव है।

 

राग बिलावल

ए अलि ! कहा जोग में नीको ?
तजि रसरीति नंदनंदन की सिखवन निर्गुन फीको।।
देखत सुनत नाहि कछु स्रवननि, ज्योति-ज्योति करि ध्यावत।
सुंदर स्याम दयालु कृपानिधि कैसे हौ बिसरावत ?
सुनि रसाल मुरली-सुर की धुनि सोइ कौतुक रस भूलै।
अपनी भुजा ग्रीव पर मैले गोपिन के सुख फूलै।।
लोककानि कुल को भ्र्म प्रभु मिलि-मिलि कै घर बन खेली।
अब तुम सुर खवावन आए जोग जहर की बेली।।

ए अलि ! कहा जोग में नीको ?
तजि रसरीति नंदनंदन की सिखवन निर्गुन फीको।।
देखत सुनत नाहि कछु स्रवननि, ज्योति-ज्योति करि ध्यावत।
सुंदर स्याम दयालु कृपानिधि कैसे हौ बिसरावत ?
सुनि रसाल मुरली-सुर की धुनि सोइ कौतुक रस भूलै।
अपनी भुजा ग्रीव पर मैले गोपिन के सुख फूलै।।
लोककानि कुल को भ्र्म प्रभु मिलि-मिलि कै घर बन खेली।
अब तुम सुर खवावन आए जोग जहर की बेली।।26

 

इस पद में गोपियाँ उद्धव के योग के उपदेश से खिन्न हो गई हैं और खिन्न होकर प्रतिक्रिया दे रही हैं।

 

गोपियाँ खिन्न होकर उद्धव को भौंरे की आड़ लेकर अर्थात भौंरे के माध्यम से उद्धव को खरी-खोटी सुना रही हैं। वे उद्धव कहती हैं कि हे भ्रमर ! तुम्हारे निर्गुण में कौन सी खासियत है? कौन सी विशेष बढ़िया बात है ? जो तुम नंद लाल की रस पद्धति को छुड़ाकर हमें नीरस निर्गुण फीका दिखाई दे रहे हो। ऐ भौंरे ! जोग में तुम उन नजरों को न तो देख पाते हो , न बात कर पाते हो , बस ज्योति-ज्योति कहकर दौड़ पड़ते हो। हमारे श्याम सुंदर तो अत्यंत दयालु हैं , दया के सागर हैं । हम उन्हें कैसे भुला सकती हैं ? हमारे कन्हैया की मधुर मुरली की धुन सुनकर तो देवता और मुनि लोग भी उसे सुनने के लिए कौतुकवश अपना तन-मन भुला बैठे थे। जब कन्हैया अपनी भुजा हमारे कंधों पर रख देते थे तो हमारा मन खिल उठता था और हम लोग लोक लाज और कुल की मर्यादा छोड़कर प्रभु के साथ घर में वन में खेलती रहती थीं और अब तुम हमको योग रूपी विष की लता खिलाने आ गए हो अर्थात यह तुम्हारा योग का उपदेश हमारे लिए विष के समान प्राण घातक है और कृष्ण का प्रेम हमारे लिए मधुर और जीवन दायक हैं।

 

राग मलार

हमरे कौन जोग व्रत साधै ?
मृगत्वच, भस्म अधारी, जटा को को इतनौ अवराधै ?
जाकी कहूँ थाह नहिं पैए , अगम , अपार , अगाधै।
गिरिधर लाल छबीले मुख पर इते बाँध को बाँधै ?
आसन पवन बिभूति मृगछाला ध्याननि को अवराधै ?
सूरदास मानिक परिहरि कै राख गाँठि को बाँधै ?।।

 

यहाँ गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि सुंदर कृष्ण को छोड़कर निर्गुण ब्रह्म की साधना करना असम्भव है।

 

योग साधना की कठिनाइयों, बाहरी बंधनों और प्रयत्न की आलोचना करते हुए गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! हमारे यहां तुम्हारे योग व्रत की साधना कौन करे? मृगछाला , भस्म, उधारी आदि वस्तुओं को इकट्ठा करता कौन फिरे और फिर अपने सिर पर जटा कौन बांधे? तुम्हारा ब्रह्म तो ऐसा है जिसकी कहीं भी थाह नहीं पाई जा सकती । जो अगम है , अपार है , अथाह है। फिर इतनी मुसीबतें मोल लेकर कौन तुम्हारे ब्रह्म की साधना करता फिरे ? फिर ऐसे ब्रह्म को कैसे प्राप्त किया जा सकता है?इसलिए ये सब प्रयत्न करना व्यर्थ है। हमारे सुंदर सलोने कृष्ण के छबीले मुख का दर्शन करने के लिए आसन, प्राणायाम, भस्म, मृगछाला आदि को एकत्र करना और फिर उसका ध्यान करना इन सब बातों की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती। वे कहना चाहते हैं कि जब तुम्हारे ब्रह्म का ध्यान करने के लिए इन सारी वस्तुओं को जुटाना आवश्यक है तो ऐसा कौन होगा जो इन प्रपंचों में पड़कर के उनकी साधना करता फिरे उसकी आराधना करता फिरे? ऐसा कौन मूर्ख है जो अपने माणिक्य को त्यागकर राख को उसकी गांठ में बांधे ? हमारे कृष्ण तो मणि के समान अमूल्य है और तुम्हारा ब्रह्म राख के समान तुच्छ है।

 

राग धनाश्री

हम तो दुहूँ भॉँति फल पायो।
को ब्रजनाथ मिलै तो नीको , नातरु जग जस गायो।।
कहँ बै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघुजाती।
कहँ बै कमला के स्वामी संग मिल बैठीं इक पाँती।।
निगमध्यान मुनिञान अगोचर , ते भए घोषनिवासी।
ता ऊपर अब साँच कहो धौ मुक्ति कौन की दासी ?
जोग-कथा, पा लोगों ऊधो , ना कहु बारंबार।
सूर स्याम तजि और भजै जो ताकी जननी छार।।28

 

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! कृष्ण प्रेम का फल तो हमें दोनों ही प्रकार से प्राप्त हो जाएगा।

 

यदि हमारे इस विरह के अंत में ब्रजनाथ श्री कृष्ण मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है और यदि नहीं भी मिल पाते है तो मरने के बाद सारा संसार हमारा यश गान करेगा। गोपियों ने श्री कृष्ण के प्रेम में एकनिष्ठ भाव को अपनाया है। हमारे और श्री कृष्ण की समानता ही नहीं है।कहाँ तो हम गोकुल की गोपियाँ जो वर्णहीन लघु जाति की हैं अर्थात नीच कुल और नीच जाति में जन्म लेने वाली हैं और कहाँ वे लक्ष्मीपति ब्रह्म स्वरूप श्री कृष्ण हैं। ये तो हमारा परम् सौभाग्य है कि हमने उनसे प्रेम किया । हमें यह अवसर मिला और उन्होंने भी हमें प्रेम के योग्य समझा और हम उनके साथ एक पंक्ति में बैठ सकी अर्थात उन्होंने हमें समानता का दर्जा दिया। जिन भगवान का ध्यान वेद भी करते हैं जिन्हें ज्ञानी मुनि भी प्रयत्न करने पर प्राप्त नहीं कर पाते। जो मुनियों के लिए भी अगोचर हैं वे भगवान हम अहीरों की बस्ती में आकर रहे। अब आप हमें ये बताओ कि मुक्ति किसकी दासी है ? यदि मुक्ति ब्रह्म की दासी है तो वह ब्रह्म कृष्ण हैं। हे उद्धव ! हम आपके पाँव पड़ते हैं, अपने इस योग की कथा को बार-बार हमें न सुनाओ। सूरदास जी के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! जो कृष्ण को त्यागकर किसी और की उपासना करता है,  उसकी जन्म देने वाली माता भी धिक्कार के योग्य है।

 

राग कान्हरो

पूरनता इन नयनन पूरी।
तुम जो कहत स्रवननि सुनि समुझत, ये यही दुख मरति बिसूरी।।
हरि अन्तर्यामी सब जानत बुद्धि विचारत बचन समूरी।
वै रस रूप रतन सागर निधि क्यों मनि पाय खवावत धूरी।।
रहु रे कुटिल , चपल , मधु , लम्पट , कितब सँदेस कहत कटु कूरी।
कहँ मुनिध्यान कहाँ ब्रजयुवती ! कैसे जाट कुलिस करि चूरी।।
देखु प्रगट सरिता, सागर, सर, सीतल सुभग स्वाद रूचि रूरी।
सूर स्वातिजल बसै जिय चातक चित्त लागत सब झूरी।।29

 

इस पद में गपियाँ उद्धव के ज्ञानोपदेश को सुनकर नाराज और खीझी हुई हैं।

 

हे उद्धव ! तुमने जो पूर्ण ब्रह्म का वर्णन किया है उसकी पूर्णता हमारी नेत्रों में पूरी तरह नहीं समा पाती अर्थात वह हमें जँचती नहीं है । तुमने ब्रह्म की पूर्णता के बारे में हमें जो-जो बातें कही हैं वह हम इन कानों से सुनकर समझने की कोशिश कर रही हैं। प्रयास कर रहीं हैं परन्तु हमारी आखें दुखने लगती हैं और बिलख- बिलख कर व्याकुल हुयी जा रही है । इस बिलखने के दो कारण हो सकते हैं । एक यह कि इन्हें तुम्हारे द्वारा वर्णित ब्रह्म की पूर्णता कहीं भी नजर नहीं आती अथवा दूसरा यह भ्रम है कि कहीं हम तुम्हारी बातों में आकर श्री कृष्ण को न छोड़ दें और तुम्हारे ब्रह्म को न स्वीकार कर लें। गोपियाँ कहती हैं कि सभी को यह पता है कि भगवान अन्तर्यामी हैं । बुद्धि द्वारा इस बात पर विचार करने पर हमें भी तुम्हारा यह कथन सत्य प्रतीत होता है। इस बात पर विशवास होने लगता है किन्तु हमारे कृष्ण तो प्रेम रूप और रत्नों के सागर हैं। रत्न तो मूल्यवान हैं । ऐसे माणिक को प्राप्त कर लेने पर तुम हमें धूल के समान तुच्छ अपने निर्गुण ब्रह्म को अपना लेने का उपदेश क्यों दे रहे हो? तुम्हारा यह उपदेश व्यर्थ ही जाएगा क्योंकि हम अपना धर्म बदलने वाले नहीं हैं। भ्रमर को सम्बोधित करती हुई उद्धव को खरी-खोटी सुनाते हुए कहती हैं कि अरे छली चंचल, रस के लोभी धूर्त भौंरे ठहर, तू हमें ऐसा योग का कटु सन्देश क्यों सुना रहा है? हमें यह तो बता कि कहाँ मुनियों की ब्रह्म विषयक कठोर साधना और कहाँ हम कोमलांगी ब्रज की युवतियां। क्या तुझे कहीं भी समानता दिखाई देती है? क्या कठोर वज्र को तोड़कर चकनाचूर करना सम्भव है ? नहीं न ! उसी प्रकार हमारे लिए भी इस योग को करना असम्भव है। संसार में सरिता, सागर, तालाब का जल मीठा निर्मल और शीतल होता है । यह देखकर भी स्वाति जल के प्रेमी चातक के हृदय में तो स्वाति नक्षत्र के समय जो जल उपलब्ध होता है उसी के प्रति प्रेम होता है। वह उसी का पान करके जी को शांत करता है । अन्य जो जल के स्त्रोत हैं उनसे प्राप्त जल भले ही शीतल और मधुर हो परन्तु उस चातक के लिए वह नीरस और व्यर्थ हैं । ठीक इसी प्रकार तुम्हारा ब्रह्म अवश्य ही मुक्ति देने वाला हो सकता है किंतु हमें तो केवल श्री क्रृष्ण/विष्णु प्रिय लगते हैं । हमें तो मुक्ति नहीं चाहिए । हमें तो कृष्ण चाहिए । अतः तुम्हारे ब्रह्म को स्वीकार नहीं कर सकते हैं।

 

राग धनाश्री

कहतें हरि कबहूँ न उदास।
राति खवाय पिवाय अधरस क्यों बिसरत सो ब्रज को बास।।
तुमसों प्रेम कथा को कहिबो मनहुं काटिबो घास।
बहिरो तान-स्वाद कहँ जानै, गूंगो-बात-मिठास।
सुनु री सखी, बहुरि फिरि ऐहैं वे सुख बिबिध बिलास।
सूरदास ऊधो अब हमको भयो तेरहों मास।।30

 

इस पद में गूंगे बहरों का उदाहरण देते हुए गोपियाँ उद्धव को विरह की व्यथा गान सुना रही हैं।

 

हमारे प्रभु श्री कृष्ण हमसे कभी भी उदास अथवा उदासीन नहीं हो सकते हैं क्योंकि उन्हें ब्रज भूमि में बिताया हुआ समय अभी भी भूल नहीं पाया है क्योंकि वे जब हमारे पास थे तो हमने उन्हें प्रेमपूर्वक माखन खिलाया था और प्रेम की अवस्था में हमने अपने अधरों से अमृत रस का पान कराया था । इसीलिए वे इस ब्रज भूमि में अपना निवास कभी भी भुला नही पाएंगे लेकिन तुम्हारे सामने तो इस प्रेम कथा का  वर्णन करना घास काटने के समान है अर्थात तुमसे इस का बखान करने का मतलब तुमसे माथा पच्ची करना है क्योंकि तुम इसके महत्व को कभी भी नहीं जान सकते हो । तुम्हारी स्थिति तो उस भौंरे के समान है जो संगीत के उतार- चढ़ाव से विस्मृत मधुर तानों का स्वाद नहीं जानता और गूंगा व्यक्ति प्रेमालाप से उपलब्ध रस को ग्रहण नहीं कर सकता। या तो तुम बहरे हो या गूंगे हो अर्थात या तो तुम्हारी गति उस बहरे मनुष्य के समान है अथवा गूंगे व्यक्ति के समान। भला बहरा संगीत के आनंद को क्या जानेगा और गूंगा वाणी के माधुर्य को क्या समझेगा । एक गोपी अपनी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी ! सुनो क्या हमारे जीवन में वही सुख क्या फिर कभी आएगा ? क्या कभी हमारे श्री कृष्ण पुनः ब्रज आएंगे और हमारे साथ वही प्रेम क्रीड़ाएं करेंगे? अब तो उनके आने का समय भी आ गया है। सूरदास जी कहते हैं कि गोपी अपनी सखी से कह रही हैं कि अब तो उनके आने का समय भी आ गया है क्योंकि जितनी अवधि के लिये वह मथुरा गए थे वह अवधि समाप्त हो रही है और इसलिए हमें आशा है कि वे शीघ्र ही लौटकर वह आएंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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