मोक्ष क्या है ? मोक्ष कैसे प्राप्त करें ? मोक्ष का वास्तविक अर्थ क्या है? जीव जन्म मरण के चक्र में क्यों पड़ता है? और उससे मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य क्या है?

इस लेख में आज हम मोक्ष के विषय में चर्चा करने वाले हैं। मोक्ष का वास्तविक अर्थ क्या है? जीव जन्म मरण के चक्र में क्यों पड़ता है? और उससे मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य क्या है?
सबसे पहले हम इसे प्रचलित भारतीय दर्शन शास्त्रों की दृष्टि से समझने का प्रयास करेंगे और जानेंगे कि आखिर उन्होंने मोक्ष को किस प्रकार परिभाषित किया है और उनमें मोक्ष प्राप्ति के क्या मार्ग बताए गए हैं। उसके बाद हम व्यावहारिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी इस विषय को समझने का प्रयास करेंगे। तो चलिए शुरू करते हैं मोक्ष की यात्रा। इस गूढ़ विषय को गहराई से जानने के लिए हमारे साथ अंत तक बने रहिए और ये आर्टिकल अंत तक जरूर पढ़ें और अपने विचार अवश्य साझा करें। आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण है। आर्टिकल कैसा लगा और आगे आप किस विषय को जानने के लिए उत्सुक हैं हमें अवश्य बताएं। चलिए अब बिना देरी किए इस यात्रा पर आगे बढ़ते हैं। भारतीय दर्शन और सनातन परंपरा में जन्म मरण के चक्र संसार चक्र से मुक्ति को मोक्ष या मुक्ति कहा गया है।
शास्त्रों विशेषकर श्रीमद्भगवत गीता और उपनिषदों में इस चक्र से छूटने के मुख्य रूप से चार मार्ग बताए गए हैं।
1.ज्ञान योग – आत्म साक्षात्कार । जन्म मरण का मूल कारण अज्ञान अविद्या है जिसके कारण जीव स्वयं को शरीर मन और अहंकार मान बैठता है। विवेक यह समझना कि शरीर नश्वर है और आत्मा अविनाशी अजन्मा और नित्य है। ना जायते मयतेवा कदाचिन गीता 2.2 आत्मबोध मैं यह शरीर या विचार नहीं बल्कि विशुद्ध चेतना आत्मा हूं। इस सत्य का निरंतर चिंतन और अनुभव करना।
2. कर्म योग – निस्वार्थ कर्म। जीव अपने कर्मों के फल की वासना और आसक्ति के कारण बार-बार नए जन्म लेता है। निष्काम कर्म कर्म को अपना कर्तव्य समझकर करें। लेकिन उसके फल की चिंता या अहंकार त्याग दें।
कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन गीता 2.47 आसक्ति का त्याग। जब कर्म फल की चाह के बिना ईश्वर या लोक कल्याण के लिए समर्पित किए जाते हैं तो कर्म के बंधन, संचित कर्म समाप्त होने लगते हैं।
3. भक्ति योग – शरणागति । ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का मार्ग सबसे सुलभ माना गया है। शरणागति अपने अहंकार और कर्तापन को परमात्मा के चरणों में समर्पित करना।
सर्वधर्मान परित्यज मामेकम शरणम वज गीता 18.66 सत्संग और नाम स्मरण मन को सांसारिक विकारों से हटाकर परमात्मा के नाम रूप और गुणों में लगाना जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है और वासनाओं का क्षय होता है।
4. ध्यान या राजयोग – चित्तवृत्ति निरोध । महर्षि पतंजलि के अनुसार मन की वृत्तियों को शांत करके स्वयं के मूल स्वरूप में स्थित होना अष्टांग योग , यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि का अभ्यास, इंद्रिय निग्रह, इंद्रियों को सांसारिक विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना जिससे चित्त की चंचलता समाप्त हो और निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति हो व्यावहारिक जीवन में क्या अपनाएं वासनाओं और तृष्णाओं का क्षय। जन्म का कारण अतृप्त इच्छाएं और वासनाएं हैं। इच्छाओं को सीमित कर संतोष अपनाएं।
साक्षी भाव – जीवन के सुख-दुख , लाभहानि और मान – अपमान को केवल एक दृष्टा साक्षी की तरह देखें। उनमें लिप्त ना हो। सत्य और सदाचार, अहिंसा, दया, सत्य और निस्वार्थ सेवा से मन का मैल धुलता है। जब अंतःकरण से अहंकार और मैं मेरा का भाव पूरी तरह मिट जाता है, तब संचित कर्म समाप्त हो जाते हैं और जीव जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।
क्या वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के चार अलग-अलग रास्ते हैं? ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग और ध्यान योग को चार प्रमुख साधना मार्गों के रूप में समझना उचित है। लेकिन यह कहना कि सभी उपनिषदों और सभी भारतीय दर्शनों में मोक्ष के यही चार निश्चित मार्ग बताए गए हैं। पूरी तरह सही नहीं होगा।
भगवत गीता में ज्ञान, कर्म, भक्ति और ध्यान की विस्तृत व्याख्या मिलती है।
पतंजलि योग सूत्र में चित्तवृत्ति निरोध और कैवल्य का मार्ग बताया गया है।
उपनिषदों में आत्मज्ञान और ब्रह्म ज्ञान को विशेष महत्व दिया गया है।
विभिन्न वेदांत परंपराओं में ज्ञान, भक्ति और ईश्वर की कृपा की भूमिका को अलग-अलग ढंग से समझाया गया है।
इसलिए हम इन्हें भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के चार प्रमुख साधना मार्ग कह सकते हैं।
मोक्ष का वास्तविक अर्थ क्या है? यह प्रश्न हमारे पूरे लेख का केंद्र होना चाहिए। मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद स्वर्ग जाना नहीं है। ना ही इसका अर्थ किसी विशेष लोक में पहुंच जाना मात्र है। भारतीय दर्शन में मोक्ष का मूल भाव है।
अविद्या से मुक्ति, अहंकार और देहाभिमान से मुक्ति।
राग, द्वेष, लोभ, मोह और तृष्णा के बंधन से मुक्ति।
कर्म बंधन और पुनर्जन्म के कारणों से मुक्ति।
अपने वास्तविक स्वरूप का बोध।
यहां एक बात समझना आवश्यक है कि अलग-अलग दर्शन मोक्ष की अंतिम अवस्था को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते हैं। उदाहरण के लिए अद्वैत वेदांत में आत्मा और ब्रह्म की एकता का साक्षात्कार मोक्ष है। जबकि द्वैत वेदांत में जीव और ईश्वर का भेद बना रहता है तथा ईश्वर की प्राप्ति और उनकी सेवा को मुक्ति माना जाता है। अर्थात मोक्ष की अवधारणा में कुछ मूल समानताएं हैं। लेकिन उसकी दार्शनिक व्याख्या एक जैसी नहीं है। जन्म मरण का चक्र क्यों चलता रहता है? मुझे लगता है कि इस विषय में यह हिस्सा थोड़ा और विस्तार मांगता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार संसार चक्र को समझने के लिए हमें एक क्रम समझना होगा।
पहला अविद्या या ज्ञान अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप को ना जानना।
दूसरा अहंकार और देह अभिमान अर्थात स्वयं को केवल शरीर और मन समझना।
तीसरा कामना, आसक्ति और तृष्णा अर्थात इच्छाएं, अपेक्षाएं, राग और द्वेष।
चौथा कर्म और कर्म फल का बंधन अर्थात कर्तापन और फल की आसक्ति।
यह चार ही जीव को पुनर्जन्म और संसार चक्र में बार-बार धकेलने में सहायक है।
ज्ञान, विवेक, वैराग्य और साधना द्वारा ही इस बंधन से मुक्ति संभव है। अन्यथा जीव इसी प्रकार बार-बार इस असहनीय पीड़ा से गुजरता रहेगा।
यहां हम एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठा सकते हैं। यदि मनुष्य के भीतर इच्छाएं और आसक्तियां बनी हुई हैं तो क्या केवल पूजा पाठ, मंत्र जाप, तीर्थ यात्रा और व्रत करने से उसे मोक्ष मिल सकता है? इसका उत्तर समझना जरूरी है। धार्मिक क्रियाएं किसी व्यक्ति को अनुशासन, एकाग्रता और मानसिक शांति दे सकती हैं। भक्ति भी अंतःकरण को निर्मल करने का माध्यम बन सकती है। लेकिन यदि व्यक्ति के व्यवहार में लोभ, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, छल, कपट और स्वार्थ बने हुए हैं तो केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं को मोक्ष की गारंटी नहीं माना जा सकता।
साधना का वास्तविक मूल्य इस बात से भी समझा जाना चाहिए कि उससे मनुष्य के विचार, व्यवहार और चेतना में कितना परिवर्तन आया। कर्म योग में कहा गया है कि निष्काम कर्म करने से संचित कर्म समाप्त होने लगते हैं। इस बात को थोड़ा सावधानी से समझने की आवश्यकता है।
भगवत गीता 2.47 में श्री कृष्ण कर्म करने का अधिकार बताते हैं। फल पर अधिकार नहीं। लेकिन निष्काम कर्म का अर्थ कर्म छोड़ देना या कर्म फल के अस्तित्व को नकारना नहीं है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करे लेकिन फल के प्रति इतना आसक्त ना हो जाए कि उसका पूरा जीवन ही अपेक्षाओं, निराशाओं और अहंकार से संचालित होने लगे।
गीता 3.19 में भी आसक्ति रहित होकर कर्तव्य कर्म करने की शिक्षा है। एक और महत्वपूर्ण श्लोक है। श्रीमद्भगवत गीता 4.37 में ज्ञान की अग्नि समस्त कर्मों को भस्म करने वाली बताई गई है। हालांकि कर्मों के नाश की व्याख्या अलग-अलग वेदांत परंपराओं में अलग है। उदाहरण के लिए अद्वैत वेदांत में आत्मज्ञान से संचित कर्म और आगामी कर्म के बंधन का नाश माना जाता है। जबकि प्रारब्ध कर्म शरीर के जीवन काल तक फल दे सकता है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि निष्काम कर्म चित्त को शुद्ध करता है। आसक्ति और कर्तापन को कम करता है तथा आत्मज्ञान के योग्य बनाता है।
अगला प्रश्न क्या मोक्ष के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त है या जीवन में उसका आचरण भी आवश्यक है? किसी व्यक्ति को यह जानकारी होना कि आत्मा अविनाशी है। शरीर नश्वर है और संसार परिवर्तनशील है। अपने आप में आत्मज्ञान नहीं है। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि क्रोध करना उचित नहीं। फिर भी क्रोध करते हैं। हम जानते हैं कि लोभ दुख का कारण है। फिर भी अधिक पाने की इच्छा रखते हैं। हम जानते हैं कि सभी मनुष्यों के साथ समानता और करुणा का व्यवहार करना चाहिए। फिर भी भेदभाव करते हैं।
हम जानते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है। फिर भी अहंकार और संग्रह में पूरा जीवन बिता देते हैं। इसलिए बौद्धिक जानकारी और आत्मानुभूति में अंतर समझना आवश्यक है। आत्मज्ञान केवल कुछ सिद्धांतों को याद कर लेने का नाम नहीं बल्कि अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और आसक्ति को पहचानने और उनसे मुक्त होने की साधना है। हम इसे एक सुंदर वाक्य में कह सकते हैं। जिस ज्ञान से जीवन का आचरण ना बदले वह अभी केवल जानकारी है। जब ज्ञान हमारे विचारों, भावनाओं और व्यवहार में उतरने लगे, तब वह वास्तविक साधना का रूप लेने लगता है।
अब हमारे आर्टिकल का यह हिस्सा अत्यंत गूढ़ प्रश्न की ओर बढ़ रहा है। जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति में क्या अंतर है?
भारतीय दर्शन में मुक्ति की चर्चा केवल मृत्यु के बाद मिलने वाली अवस्था के रूप में नहीं होती।
जीवन मुक्ति क्या है? जब व्यक्ति जीवित रहते हुए ही आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है और अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार तथा आसक्ति के बंधनों से मुक्त हो जाता है तो अद्वैत वेदांत में उसे जीवन मुक्त कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसका शरीर भूख, प्यास, बीमारी, सुख, दुख या संसार की परिस्थितियों से परे हो जाता है, बल्कि वह इनके बीच रहते हुए भी अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहता है।
विदेह मुक्ति क्या होता है? अद्वैत वेदांत की व्याख्या में जीवन मुक्त ज्ञानी के शरीर का प्रारब्ध समाप्त होने पर देह का अंत होता है। इसे विदेह मुक्ति कहा जाता है।
मोक्ष के लिए कुछ और आवश्यक साधनाएं क्या है?
पहली है विवेक अर्थात नित्य और अनित्य सत्य और असत्य तथा स्थाई और अस्थाई के बीच अंतर समझने की क्षमता।
दूसरी है वैराग्य अर्थात संसार की वस्तुओं से घृणा नहीं बल्कि उनके प्रति अनावश्यक मोह और निर्भरता से मुक्ति।
तीसरी साधना है षट संपत्ति अर्थात शम, दम, उपरती, ततीक्षा, श्रद्धा और समाधान। यह अद्वैत वेदांत में साधन चतुष्टय का महत्वपूर्ण भाग है।
चौथी साधना है आत्म निरीक्षण। अर्थात अपने विचारों, इच्छाओं, प्रतिक्रियाओं और अहंकार का निरंतर विश्लेषण।
पांचवी साधना है समत्व अर्थात अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखना और
छठी साधना है करुणा और निष्काम सेवा अर्थात अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करना।
यहां एक सुंदर संदर्भ गीता 2.48 का है। योगस्थ कुरुकर्माण संगम तक्त धनंजय अर्थात आसक्ति का त्याग करके समत्व भाव में स्थित होकर कर्म करो। अब आगे बढ़ते हैं।
हमारा अगला प्रश्न है क्या मोक्ष कोई ऐसी वस्तु है जिसे प्राप्त करना है या वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की अवस्था है? अद्वैत वेदांत के अनुसार आत्मा मूलतः मुक्त है। बंधन का कारण अज्ञान है। इसलिए मुक्ति का अर्थ किसी नई वस्तु या स्थान को प्राप्त करना नहीं। बल्कि उस अज्ञान का दूर होना है जिसके कारण मनुष्य स्वयं को बंधा हुआ समझता है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण दे सकते हैं। अंधेरे कमरे में रखी रस्सी को कोई व्यक्ति सांप समझ लेता है। वह डरता है, परेशान होता है और उससे बचने का प्रयास करता है। लेकिन जैसे ही प्रकाश होता है और उसे रस्सी का वास्तविक ज्ञान होता है। उसका भय समाप्त हो जाता है। रस्सी को सांप से मुक्त नहीं करना पड़ा। केवल भ्रम दूर करना पड़ा। इसी प्रकार अद्वैत वेदांत में मोक्ष को अज्ञान से उत्पन्न भ्रम के निवारण के रूप में समझाया जाता है। यह उदाहरण अद्वैत की व्याख्या है। सभी दर्शनों की नहीं।
अब हमारा लेख अंत की तरफ बढ़ रहा है और अंत में यह आर्टिकल यही संदेश देना चाहता है कि मोक्ष कोई चमत्कार नहीं ना ही केवल किसी विशेष धार्मिक क्रिया का परिणाम है। यह भारतीय दर्शन की एक अत्यंत गहरी आध्यात्मिक अवधारणा है जिसका केंद्र है मनुष्य का अपने वास्तविक स्वरूप को जानना और उन कारणों से मुक्त होना जो उसे संसार के बंधनों में बांधे रखते हैं।
ज्ञान हमें सत्य का बोध कराता है।
कर्म योग हमें आसक्ति के बिना कर्तव्य करना सिखाता है।
भक्ति योग हमें अहंकार छोड़कर समर्पण करना सिखाता है।
ध्यान योग हमें अपने चंचल मन को समझने और नियंत्रित करने की दिशा देता है।
इन मार्गों का उद्देश्य मनुष्य को भीतर से बदलना है। हमें यह समझना होगा कि मोक्ष की खोज संसार से भागने की खोज नहीं बल्कि संसार के प्रति अपने अज्ञान, मोह और आसक्ति को समझने की खोज है। इन मार्गों का उद्देश्य मनुष्य को भीतर से बदलना है। हमें यह समझना होगा कि मोक्ष की खोज संसार से भागने की खोज नहीं बल्कि संसार के प्रति अपने अज्ञान, मोह और आसक्ति को समझने की खोज है।
प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितनी बार मंदिर में दर्शन किए? कितने मंत्रों का जाप किया या कितने तीर्थ किए?
प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर का अहंकार कम हुआ?
क्या हमने अपने क्रोध, लोभ और मोह पर नियंत्रण पाया?
क्या हमारा विवेक जागृत हुआ?
क्या हम सत्य, करुणा, प्रेम और निष्काम भाव से जीवन जीना सीख पाए।
क्योंकि आध्यात्मिक साधना का मूल्य केवल हमारी धार्मिक गतिविधियों से नहीं बल्कि हमारे भीतर होने वाले परिवर्तन से भी समझा जाना चाहिए और शायद मोक्ष की खोज की शुरुआत भी इसी दिन होती है। जिस दिन मनुष्य को दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को जानने का प्रयास शुरू करता है।
हमारा उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि मोक्ष क्या है ना कि उन्हें यह विश्वास दिलाना कि किसी एक विशेष पूजा मंत्र गुरु या कर्मकांड के बिना मुक्ति संभव ही नहीं। इस वीडियो में किसी एक संप्रदाय का पक्ष लेने के बजाय गीता, उपनिषद, वेदांत और योग दर्शन की शिक्षाओं को निष्पक्ष रूप से सामने रखा गया है। आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म और मोक्ष भारतीय दर्शन की आध्यात्मिक मान्यताएं हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य की तरह प्रस्तुत ना करके जहां शास्त्रीय मान्यता है, वहां उसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस विषय को एक धार्मिक पक्ष के साथ-साथ गंभीर दार्शनिक और आत्मचिंतन पूर्ण दृष्टिकोण के रूप में रखने का प्रयास किया गया है। इसलिए दर्शक इसे सुनने के बाद केवल मोक्ष के बारे में जानकारी लेकर ना जाएं बल्कि स्वयं से एक प्रश्न भी पूछें। मैं वास्तव में कौन हूं और जिन बंधनों से मुक्ति खोज रहा हूं। क्या उनके कारणों को मैंने कभी समझने का प्रयास किया है? तो इस लेख का प्रयास सफल हो जाएगा।
हम ना किसी की आस्था का अपमान करना चाहते हैं ना किसी विचार को आंख बंद करके स्वीकार करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लोग प्रश्न करें, पढ़ें, समझें, तर्क करें और स्वयं के भीतर झांके। अंधानुकरण नहीं, विवेक, दिखावा नहीं, आत्मचिंतन, केवल कर्मकांड नहीं, सदाचार। केवल मुक्ति की कामना नहीं, स्वयं को जानने की जिज्ञासा। और हमारी एक बात पक्की रहेगी। जहां प्रश्न करना अपराध समझा जाए वहां प्रश्न करना और भी आवश्यक हो जाता है। उम्मीद है कि यह आर्टिकल आपको पसंद आया होगा। अगर आया है तो शेयर, कमेंट कर दीजिएगा और अगले आर्टिकल का इंतजार कीजिएगा और अगर आप किसी विशेष टॉपिक पे आर्टिकल चाहते हैं तो वो भी कमेंट में जरूर बताइएगा। जय श्री कृष्णा
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