यदि भगवान सबके हृदय में हैं, तो दुख क्यों है?

यदि भगवान सबके हृदय में हैं तो दुख क्यों है?

जीवन को आसान बनाना है ? गीता सुनो – The Spiritual Talks

यदि भगवान सबके हृदय में हैं, तो दुख क्यों है?

अर्जुन का एक और प्रश्न: यदि भगवान सबके हृदय में हैं, तो दुख क्यों है?

अर्जुन:हे कृष्ण!

यदि आप सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं…

यदि आप सबके कल्याण के आधार हैं…

तो फिर संसार में इतना दुख क्यों है?

 

 

कोई भूखा है।

कोई अपनों को खो रहा है।

कोई अन्याय सह रहा है।

कोई अपने जीवन की कठिनाइयों से संघर्ष कर रहा है।

 

क्या परमात्मा इन सबको नहीं देखते?

 

जीवन को आसान बनाना है ? गीता सुनो – The Spiritual Talks

 

श्रीकृष्ण: पार्थ!

यह संसार अनेक कारणों, परिस्थितियों और कर्मों के माध्यम से संचालित होता है।

प्रत्येक घटना को केवल एक कारण से समझना संभव नहीं है।

मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता और विवेक प्राप्त है।

लेकिन उसके कर्मों के परिणाम केवल उसी तक सीमित नहीं रहते।

संसार में अनेक जीवों के कर्म और परिस्थितियाँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।

इसलिए जीवन में सुख और दुख दोनों दिखाई देते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी दुखी व्यक्ति की पीड़ा को अनदेखा कर दिया जाए।

यदि तुम्हारे सामने कोई भूखा है, तो उसकी सहायता करना तुम्हारा मानवीय कर्तव्य है।

यदि किसी के साथ अन्याय हो रहा है, तो विवेक और साहस के साथ उसका विरोध करना आवश्यक हो सकता है।

यदि कोई दुखी है, तो उसके प्रति करुणा रखो।

केवल यह कह देना कि सब कुछ भाग्य है, तुम्हें अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं करता।

अर्जुन:हे कृष्ण!

तो क्या दूसरों की सहायता करना भी आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा है?

श्रीकृष्ण:निश्चित रूप से पार्थ।

जब तुम किसी की सहायता करते हो, तब तुम्हारे भीतर करुणा और सेवा का भाव विकसित होता है।

लेकिन सहायता करते समय अहंकार से बचना चाहिए।

किसी की सहायता करके उसे छोटा महसूस कराना उचित नहीं।

सेवा का वास्तविक भाव विनम्रता और संवेदनशीलता से जुड़ा है।

दूसरों के दुख को समझने का प्रयास करो।

और जहाँ संभव हो, अपने कर्मों से उनके जीवन में कुछ राहत पहुँचाओ।

आज हम इसी प्रश्न पर विचार करेंगे, जो शायद कभी न कभी आपके मन में भी आया होगा। 

अगर भगवान हर जीव के हृदय में विराजमान हैं, अगर वे सब कुछ जानते हैं, अगर वे सर्वशक्तिमान हैं और अगर वे हमसे प्रेम करते हैं, तो फिर इस संसार में इतना दुख क्यों है?

कोई इंसान दिन-रात मेहनत करता है, फिर भी उसे दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

कोई अपने परिवार के लिए पूरी जिंदगी लगा देता है, लेकिन बुढ़ापे में वही परिवार उसे अकेला छोड़ देता है।

कोई किसी का बुरा नहीं करता, फिर भी उसके जीवन में इतनी कठिनाइयाँ आती हैं कि वह टूटने लगता है।

और दूसरी ओर, कभी-कभी ऐसा दिखाई देता है कि दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाले लोग सुख-सुविधाओं से भरा जीवन जी रहे हैं।

तब मन में एक प्रश्न उठता है—अगर भगवान सबके भीतर हैं, तो क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं देता?

अगर दिखाई देता है, तो वे इसे रोकते क्यों नहीं?

क्या भगवान केवल हमारे सुख के समय हमारे साथ होते हैं, या हमारे दुख में भी?

आइए, इस प्रश्न को केवल आस्था से नहीं, बल्कि तर्क और आत्मचिंतन से समझने का प्रयास करते हैं।

1. क्या भगवान का हृदय में होना, दुख से सुरक्षा की गारंटी है?

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भगवान के हृदय में विराजमान होने की अवधारणा का अर्थ क्या है।

क्या इसका अर्थ यह है कि जिस व्यक्ति के भीतर भगवान हैं, उसके जीवन में कभी कोई कठिनाई नहीं आएगी?

अगर ऐसा है, तो फिर संसार में कोई भी भक्त दुखी क्यों है?

भक्त भी बीमार पड़ते हैं। भक्त भी अपनों को खोते हैं। भक्तों के साथ भी अन्याय होता है। उनके जीवन में भी असफलताएँ आती हैं।

इसलिए केवल दुख का होना इस बात का प्रमाण नहीं हो सकता कि भगवान किसी के भीतर नहीं हैं।

लेकिन यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि भगवान सबके भीतर हैं, तो क्या इसका अर्थ यह है कि वे हमारे जीवन की हर घटना को अपनी इच्छा से घटित कर रहे हैं?

यह आवश्यक नहीं है।

भगवान के भीतर होने की आध्यात्मिक अवधारणा और संसार की हर घटना को भगवान द्वारा सीधे नियंत्रित किए जाने की धारणा—दो अलग-अलग बातें हैं।

यदि हम इन दोनों को एक ही मान लेते हैं, तो फिर हर अन्याय, हर दुर्घटना और हर पीड़ा के लिए भगवान को जिम्मेदार ठहराने का प्रश्न उठता है।

और यहीं से हमारी वास्तविक खोज शुरू होती है।

2. क्या संसार के दुख के लिए केवल भगवान जिम्मेदार हैं?

जरा अपने आसपास देखिए।

एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को धोखा देता है।

कोई लालच में आकर किसी गरीब का अधिकार छीन लेता है।

कोई अपने स्वार्थ के लिए किसी निर्दोष को चोट पहुँचाता है।

अब सोचिए, यदि हर मनुष्य के भीतर ईश्वर का वास है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि किसी को धोखा देने वाला व्यक्ति ऐसा भगवान की इच्छा से ही कर रहा है?

यदि हम ऐसा मान लें, तो फिर मनुष्य के विवेक, उसके चुनाव और उसकी जिम्मेदारी का क्या अर्थ रह जाएगा?

हमारे निर्णयों का भी महत्व है।

हम किसी के प्रति दयालु हो सकते हैं, या क्रूर हो सकते हैं।

हम किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकते हैं, या उसकी मजबूरी का लाभ उठा सकते हैं।

हम किसी के दुख को कम कर सकते हैं, या उसके दुख को और बढ़ा सकते हैं।

इसलिए संसार में होने वाले हर दुख को केवल ईश्वर की इच्छा कहकर समझा देना पर्याप्त नहीं है।

बहुत-सा दुख मनुष्य के व्यवहार, सामाजिक अन्याय, हिंसा, भेदभाव, लालच और दूसरों के प्रति हमारी उदासीनता से पैदा होता है।

कुछ दुख प्राकृतिक परिस्थितियों से आते हैं। कुछ बीमारी, दुर्घटना और हमारे नियंत्रण से बाहर की घटनाओं से।

और कुछ दुख हमारे अपने निर्णयों के परिणाम होते हैं।

हर दुख का कारण एक जैसा नहीं होता।

इसलिए हर दुखी व्यक्ति से यह कहना कि उसके साथ जो हो रहा है, वह उसके कर्मों का फल है—न तो उचित है, न ही हर परिस्थिति में ऐसा दावा करने का हमारे पास पर्याप्त आधार है।

कभी-कभी किसी दुखी इंसान को कर्मों का हिसाब समझाने से ज्यादा जरूरी होता है, उसका हाथ पकड़कर उसे सहारा देना।

3. फिर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो अन्याय रोकते क्यों नहीं?

यह इस विषय का सबसे कठिन प्रश्न है।

यदि भगवान सब कुछ कर सकते हैं, तो वे किसी निर्दोष को पीड़ा से बचा क्यों नहीं लेते?

किसी बच्चे को बीमारी से, किसी परिवार को भूख से, किसी महिला को हिंसा से, किसी निर्दोष व्यक्ति को अन्याय से क्यों नहीं बचाते?

इस प्रश्न का ऐसा उत्तर देना आसान नहीं है, जो हर परिस्थिति में तर्क की कसौटी पर खरा उतर सके।

धार्मिक परंपराएँ इसका उत्तर अलग-अलग तरीकों से देती हैं।

कुछ परंपराएँ कर्म और उसके फल की बात करती हैं। कुछ स्वतंत्र इच्छा को महत्व देती हैं। कुछ संसार को आत्मा के विकास या परीक्षा से जोड़कर देखती हैं। और कुछ विचारक मानते हैं कि दुख की उपस्थिति ईश्वर की शक्ति और करुणा के बारे में गंभीर दार्शनिक प्रश्न खड़े करती है।

लेकिन हमें एक बात का ध्यान रखना चाहिए।

किसी व्यक्ति के जीवन में भयानक दुख देखकर यह घोषित कर देना कि भगवान उसकी परीक्षा ले रहे हैं, हमेशा उचित नहीं होता।

क्योंकि हम निश्चित रूप से नहीं जानते कि उस दुख के पीछे कोई दैवी उद्देश्य है भी या नहीं।

और अगर कोई बच्चा भूखा है, तो उसके भूखे रहने को उसकी आत्मा की परीक्षा कहने से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम उसे भोजन दे सकते हैं।

किसी के साथ अन्याय हो रहा है, तो उसे भाग्य मानकर सहने की सलाह देने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि क्या हम अन्याय रोकने में उसकी सहायता कर सकते हैं।

किसी के दुख को आध्यात्मिक शब्दों में समझाना और उसके दुख को वास्तव में कम करना—दो अलग-अलग बातें हैं।

और मानवता की कसौटी शायद यही है कि हम इनमें से किसे अधिक महत्व देते हैं।

4. श्रीमद्भगवद्गीता इस प्रश्न को कैसे देखने में सहायता करती है?

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

अर्थात, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।

यह श्लोक भगवद्गीता के अध्याय 18, श्लोक 61 में आता है।

लेकिन इसी गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने, अपने कर्तव्य को समझने और कठिन परिस्थितियों से पलायन न करने की शिक्षा भी देते हैं।

जरा इस बात पर विचार कीजिए।

यदि ईश्वर हृदय में हैं, तो क्या अर्जुन को युद्धभूमि में अपने कर्तव्य से विमुख हो जाना चाहिए था?

नहीं।

श्रीकृष्ण उसे केवल यह नहीं कहते कि सब कुछ भगवान पर छोड़ दो और शांत बैठ जाओ।

वे उसे समझाते हैं, उसके भ्रम दूर करते हैं और उसे विवेक के साथ निर्णय लेने की दिशा दिखाते हैं।

इससे हमें एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण मिलता है।

आध्यात्मिकता का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्तव्य छोड़ दे और हर परिस्थिति को भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर ले।

बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान हमें यह समझने में सहायता कर सकता है कि किन परिस्थितियों को स्वीकार करना है, किन्हें बदलने का प्रयास करना है और अपने व्यवहार को किस प्रकार बेहतर बनाना है।

अगर किसी के भीतर ईश्वर को देखने की भावना वास्तव में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाए, तो क्या हम दूसरे व्यक्ति के दुख के प्रति और अधिक संवेदनशील नहीं होंगे?

क्या हम किसी भूखे व्यक्ति को भोजन देना, किसी कमजोर की सहायता करना और किसी पीड़ित के साथ खड़े होना अपना कर्तव्य नहीं समझेंगे?

यदि हम हर प्राणी में ईश्वर को मानते हैं, लेकिन किसी प्राणी के दुख से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, तो हमें अपने विश्वास के अर्थ पर विचार अवश्य करना चाहिए।

5. क्या भगवान दुख दूर करते हैं, या दुख सहने की शक्ति देते हैं?

अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान ने उन्हें कठिन समय में संभाला।

किसी को प्रार्थना से आशा मिली।

किसी को गीता पढ़कर अपने मन को समझने की शक्ति मिली।

किसी को यह विश्वास मिला कि वर्तमान परिस्थिति हमेशा ऐसी नहीं रहेगी।

और किसी को अपने कठिन समय में किसी दूसरे इंसान के प्रेम और सहयोग में ईश्वर की अनुभूति हुई।

इन अनुभवों को नकारने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आस्था मनुष्य को मानसिक सहारा दे सकती है। वह उसे निराशा में आशा, भ्रम में दिशा और कठिन समय में धैर्य दे सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रार्थना करने वाले हर व्यक्ति का दुख तुरंत समाप्त हो जाएगा।

न ही यह कि जिसका दुख समाप्त नहीं हुआ, उसकी आस्था में कोई कमी थी।

बीमारी होने पर चिकित्सा की आवश्यकता हो सकती है।

आर्थिक संकट में रोजगार, संसाधन और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता हो सकती है।

मानसिक पीड़ा में किसी विश्वसनीय व्यक्ति या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता उपयोगी हो सकती है।

और अन्याय की स्थिति में न्याय और सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।

आस्था इन प्रयासों का सहारा बन सकती है, उनका विकल्प नहीं।

हो सकता है कि भगवान पर विश्वास करने वाला व्यक्ति यह माने कि उसे भीतर से शक्ति मिली है।

और कोई दूसरा व्यक्ति उसी शक्ति को अपने विवेक, प्रेम, आशा या मानवीय संबंधों के रूप में समझे।

हम अनुभवों की व्याख्या अलग-अलग कर सकते हैं, लेकिन दुखी व्यक्ति को सहारा देने का महत्व दोनों ही दृष्टिकोणों में बना रहता है।

6. यदि भगवान सबके भीतर हैं, तो हमें क्या बदलना चाहिए?

शायद इस प्रश्न का एक और पहलू है, जिस पर हम कम ध्यान देते हैं।

हम अक्सर पूछते हैं—भगवान दूसरों का दुख क्यों नहीं दूर करते?

लेकिन क्या हमने कभी पूछा कि हम दूसरों का दुख दूर करने के लिए क्या कर रहे हैं?

अगर किसी भूखे व्यक्ति को देखकर हम आगे बढ़ जाते हैं, किसी गरीब का मजाक उड़ाते हैं, किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाते हैं, किसी दुखी इंसान को ही उसके दुख के लिए दोषी ठहराते हैं, तो हमारे विश्वास का दूसरों के जीवन में क्या अर्थ रह जाता है?

ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न अपनी जगह है।

लेकिन ईश्वर में विश्वास करने के बाद हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि हम मानते हैं कि प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का वास है, तो इस विश्वास से हमारे भीतर करुणा, न्याय, ईमानदारी और जिम्मेदारी बढ़नी चाहिए।

किसी के दुख के सामने हमारी पहली प्रतिक्रिया यह नहीं होनी चाहिए कि उसने कौन-सा पाप किया होगा।

हमारी पहली प्रतिक्रिया यह हो सकती है—मैं इसकी सहायता कैसे कर सकता हूँ?

क्योंकि दुख का कारण जानना हमेशा हमारे वश में नहीं होता, लेकिन कई बार दुख कम करने का अवसर हमारे सामने होता है।

और उस अवसर का उपयोग करना हमारे हाथ में है।

7. तो फिर अंतिम सत्य क्या है?

इस प्रश्न का ऐसा अंतिम उत्तर, जिसे हर व्यक्ति निर्विवाद सत्य मान ले, हमारे पास नहीं है।

आस्तिक व्यक्ति यह मान सकता है कि ईश्वर हर प्राणी के भीतर हैं, लेकिन संसार की समस्त घटनाओं के पीछे ईश्वरीय योजना को समझ पाना मनुष्य की सीमित बुद्धि के परे है।

कोई दार्शनिक यह प्रश्न उठा सकता है कि यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और पूर्णतः करुणामय हैं, तो निर्दोषों का दुख क्यों बना रहता है।

और कोई व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व के बारे में निश्चित हुए बिना भी यह मान सकता है कि दुख कम करना, दूसरों की सहायता करना और अन्याय का विरोध करना मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी है।

इन दृष्टिकोणों में मतभेद हो सकते हैं।

लेकिन एक बात पर हम विचार कर सकते हैं।

किसी के दुख को देखकर उसके विश्वास, उसके कर्मों या उसकी योग्यता पर फैसला सुनाने के बजाय, हमें उसके दुख को समझने और संभव हो तो उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए।

क्योंकि चाहे हम ईश्वर को सर्वव्यापी चेतना मानें, परम सत्ता मानें या इस प्रश्न पर अभी विचार ही कर रहे हों—करुणा, विवेक और जिम्मेदारी का महत्व समाप्त नहीं हो जाता।

और शायद यही वह जगह है, जहाँ ईश्वर की खोज केवल शब्दों और मान्यताओं तक सीमित न रहकर हमारे आचरण में दिखाई देने लगती है।

अंत में, एक प्रश्न आपसे भी है।

यदि भगवान वास्तव में सबके हृदय में हैं, तो क्या उन्हें केवल मंदिरों में खोजा जाना चाहिए, या उस इंसान में भी, जो भूखा है, दुखी है, अकेला है और जिसे हमारी सहायता की आवश्यकता है?

और यदि भगवान सबके भीतर हैं, तो क्या किसी दूसरे के दुख को अनदेखा करना केवल उसकी समस्या है, या हमारे अपने विश्वास के सामने खड़ा एक प्रश्न भी?

सोचिएगा जरूर।

क्योंकि प्रश्न पूछना आस्था का अपमान नहीं है। कभी-कभी यही प्रश्न हमें अपने विश्वास को अधिक गहराई से समझने का अवसर देते हैं।

राधे राधे। 🙏


जीवन को आसान बनाना है ? गीता सुनो

 

Be a part of this Spiritual family by visiting more spiritual articles on:

The Spiritual Talks

For more divine and soulful mantras, bhajan and hymns:

Subscribe on Youtube: The Spiritual Talks

For Spiritual quotes , Divine images and wallpapers  & Pinterest Stories:

Follow on Pinterest: The Spiritual Talks

For any query contact on:

E-mail id: thespiritualtalks01@gmail.com

follow for more updates https://the-spiritualtalks.com

https://www.instagram.com/the_spiritu…

  / 19i4pqmvre  

https://pin.it/3OOKyi8Za

https://www.threads.com/@the_spiritua…

  / 19ygocgtkk  

 

 

श्रीमद्भगवद्गीता ,भगवद गीता , भगवद्गीता के प्रेरणादायक वचन , गीता के अनमोल वचन , श्री कृष्ण के उपदेश , कृष्ण के ज्ञान की बातें , भगवान श्री कृष्ण की वाणी , गीता ज्ञान , गीता का ज्ञान , श्रीमद भगवद गीता हिंदी , भगवद्गीता हिंदी , गीता के उपदेश , कृष्ण उपदेश ,  कृष्ण वाणी,जीवन की समस्याओं का समाधान, जीवन की परेशानियों का समाधान,  मन की शांति के लिए गीता,  तनाव और चिंता का समाधान,जीवन बदलने वाली बातें,  प्रेरणादायक विचार, आध्यात्मिक ज्ञान, हिंदू धर्म का ज्ञान, सनातन धर्म, गीता सार, Bhagavad Gita, Bhagavad Gita in Hindi, Bhagavad Gita quotes,  Krishna teachings, Krishna quotes in Hindi,  Lord Krishna teachings, Gita Gyan, Krishna vani, 99+ Best Bhagavad Gita Quotes in Hindi » प्रेरणादायक उपदेश , अनमोल वचन | श्रीमद्भागवत एवं भगवद्गीता के प्रेरणादायक विचार, Krishna updesh , Krishna motivational speech , Shree krishna motivational speech , krishna motivation , krishna seekh , कृष्ण सीख , krishna wisdom , कृष्ण ज्ञान , गीता ज्ञान , geeta saar , Gita saar , Gita updesh , Geeta updesh , गीता उपदेश , भगवद गीता सार , bhagwat geeta in pitra paksh , shraddh me gita sune , jeevan to asaan banana hai gita sune , want to make life easy, want to live life easy, jeevan me mushkil hai gita sune , bhagwat geeta updesh in hindi , bhagwat geeta saar hindi , srimad bhagavad gita teachings , life lessons , Motivational Quotes By Krishna , Bhagwat Geeta positive thoughts , bhagwat geeta sar in hindi , geeta bhagwat in hindi , Geeta bhagwat, geeta hindi  , geeta saar in hindi , bhagwad geeta lessons , Bhagwat Geeta Saar , bhagwat Geeta Ka Gyan , geeta saar in hindi , Bhagwat Geeta, life lessons from bhagavad gita , bhagavad gita life lessons in hindi , bhagavad gita motivational in hindi , bhagwat geeta motivational quotes , bhagwat geeta in hindi , Krishna best lines in Mahabharat , Gita Updesh by Krishna , Bhagwat Geeta slogan , Bhagavad Gita essence in points , Bhagwat Geeta motivation for success , Geeta Gyan for success , Krishna on success , Thoughts of Bhagavad Gita , geeta ke prernadayak vichar , Bhagwat Geeta motivation for success , Krishna Bhagwat Geeta Gyan , Krishna bhagavad geeta quotes , Positive Krishna quotes on life , bhagavad gita important lessons , motivational quotes from bhagavad gita , motivational mantras for success, Krishna quotes on success ,Krishna speech , Bhagavad Gita most important lesson , purpose of life bhagavad gita , bhagavad gita life changing quotes , Bhagavad Gita on success and failure , bhagavad gita karma yoga , nishkama karma in bhagavad gita , Kriya yoga in bhagavad gita bhagavad gita bhakti yoga bhagavad gita quote bhagwat gita important lines in hindi motivational quotes from bhagavad gita bhagavad gita , life changing quotes , motivational mantra for success , ashtanga yoga bhagavad gita ,gyan yoga in bhagavad gita in hindi, best quotes from bhagavad gita , bhagavad gita motivational in hindi , suvichar , bhagwat geeta 30 updesh , 50 bhagwat geeta updesh in hindi , bhagwat geeta ki batein , bhagwat geeta motivation ,  Geeta gyan in Hindi , bhagwat geeta saar in hindi , Shrimad Bhagwat Geeta , Shrimad bhagwat gita 100 updesh,  18 sayings of Bhagavad Gita , Bhagwat Gita essence , Srimad Bhagavad Gita Essence Chapters 1-18 , 111 thoughts from Srimad Bhagavad Gita ,Entire Gita saar in 30 minutes , Words of wisdom of Shri krishna,  Sayings of Shri Krishna ,

 

 

By spiritual talks

Welcome to the spiritual platform to find your true self, to recognize your soul purpose, to discover your life path, to acquire your inner wisdom, to obtain your mental tranquility.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!