Bhagwad Gita Chapter 12

 

 

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Bhagwad Gita Chapter 12श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥12.2॥

 

 

श्रीभगवान् उवाच-आनन्दमयी श्री भगवान ने कहा; मयि–मुझमें; आवेश्य-स्थिर करके; मन:-मन को; ये-जो; माम्-मुझमें; नित्ययुक्ताः-सदा तल्लीन हुए; उपासते-उपासना करते हैं; श्रद्धया – श्रद्धापूर्वक; परया-उत्तम; उपेता:-युक्त होकर; ते – वे; मे – मेरे द्वारा; युक्ततमा:-योग की उच्चावस्था में स्थित; मता:-मैं मानता हूँ।

 

 

आनंदमयी श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र और मुझमें स्थिर करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ और पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर दृढ़तापूर्वक मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं अर्थात मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं , मैं उन्हें योगियों में अति उत्तम और सर्वश्रेष्ठ योगी मानता हूँ ॥12.2॥

 

[भगवान ने ठीक यही निर्णय अर्जुन के बिना पूछे ही छठे अध्याय के 47वें श्लोक में दे दिया था परन्तु उस विषय में अपना प्रश्न न होने के कारण अर्जुन उस निर्णय को पकड़ नहीं पाये। कारण कि स्वयं का प्रश्न न होने से सुनी हुई बात भी प्रायः लक्ष्य में नहीं आती। इसलिये उन्होंने इस अध्याय के पहले श्लोक में ऐसा प्रश्न किया। इसी प्रकार अपने मन में किसी विषय को जानने की पूर्ण अभिलाषा और उत्कण्ठा के अभाव में तथा अपना प्रश्न न होने के कारण सत्सङ्ग में सुनी हुई और -शास्त्रों में पढ़ी हुई साधन-सम्बन्धी मार्मिक और महत्त्वपूर्ण बातें प्रायः साधकों के लक्ष्य में नहीं आतीं। अगर वही बात उनके प्रश्न करने पर समझायी जाती है तो वे उसको अपने लिये विशेषरूप से कही गयी मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर लेते हैं। प्रायः वे सुनी और पढ़ी हुई बातों को अपने लिये न समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं जबकि उनमें उस बात के संस्कार सामान्य रूप से रहते ही हैं जो विशेष उत्कण्ठा होने से जाग्रत् भी हो सकते हैं। अतः साधकों को चाहिये कि वे जो पढ़ें और सुनें , उसको अपने लिये ही मानकर जीवन में उतारने की चेष्टा करें।] ‘मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ताः उपासते ‘ – मन वहीं लगता है जहाँ प्रेम होता है। जिसमें प्रेम होता है उसका चिन्तन स्वतः होता है। ‘नित्ययुक्ताः ‘ का तात्पर्य है कि साधक स्वंय भगवान में लग जाय। भगवान ही मेरे हैं और मैं भगवान का ही हूँ – यही स्वयं का भगवान में लगना है। स्वयं का दृढ़ उद्देश्य भगवत्प्राप्ति होने पर भी मनबुद्धि स्वतः भगवान में लगते हैं। इसके विपरीत स्वयं का उद्देश्य भगवत्प्राप्ति न हो तो मन-बुद्धि को भगवान में लगाने का यत्न करने पर भी वे पूरी तरह भगवान में नहीं लगते परन्तु जब स्वयं ही अपने आपको भगवान का मान ले तब तो मनबुद्धि भगवान में तल्लीन हो ही जाते हैं। स्वयं कर्ता है और मनबुद्धि करण हैं। करण कर्ता के ही आश्रित रहते हैं। जब कर्ता भगवान का हो जाय तब मनबुद्धिरूप करण स्वतः भगवान में लगते हैं। साधक से भूल यह होती है कि वह स्वयं भगवान में न लगकर अपने मन-बुद्धि को भगवान में लगाने का अभ्यास करता है। स्वयं भगवान में लगे बिना मन-बुद्धि को भगवान में लगाना कठिन है। इसीलिये साधकों की यह व्यापक शिकायत रहती है कि मन-बुद्धि भगवान में नहीं लगते। मन-बुद्धि एकाग्र होने से सिद्धि (समाधि आदि) तो हो सकती है पर कल्याण स्वयं के भगवान में लगने से ही होगा। उपासना का तात्पर्य है – स्वयं (अपने आप ) को भगवान के अर्पित करना कि मैं भगवान का ही हूँ और भगवान ही मेरे हैं। स्वयं को भगवान के अर्पित करने से नाम-जप , चिन्तन , ध्यान , सेवा , पूजा आदि तथा शास्त्रविहित क्रियामात्र स्वतः भगवान के लिये ही होती है। शरीर प्रकृति का और जीव परमात्मा का अंश है। प्रकृति के कार्य शरीर , इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि और अहम से तादात्म्य , ममता और कामना न करके केवल भगवान को ही अपना मानने वाला यह कह सकता है कि मैं भगवान का हूँ , भगवान मेरे हैं। ऐसा कहने या मानने वाला भगवान से कोई नया सम्बन्ध नहीं जो़ड़ता। चेतन और नित्य होने के कारण जीव का भगवान से सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है किन्तु उस नित्यसिद्ध वास्तविक सम्बन्ध को भूलकर जीव ने अपना सम्बन्ध प्रकृति एवं उसके कार्य शरीर से मान लिया जो अवास्तविक है। अतः जब तक प्रकृति से माना हुआ सम्बन्ध है तभी तक भगवान से अपना सम्बन्ध मानने की आवश्यकता है। प्रकृति से माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही भगवान से अपना वास्तविक और नित्यसिद्ध सम्बन्ध प्रकट हो जाता है उसकी स्मृति प्राप्त हो जाती है – ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा’ (गीता 18। 73)। जडता (प्रकृति ) के सम्मुख होने के कारण अर्थात् उससे सुखभोग करते रहने के कारण जीव शरीर से मैंपन का सम्बन्ध जो़ड़ लेता है अर्थात् मैं शरीर हूँ – ऐसा मान लेता है। इस प्रकार शरीर से माने हुए सम्बन्ध के कारण वह वर्ण , आश्रम , जाति , नाम ,व्यवसाय तथा बालकपन , जवानी आदि अवस्थाओं को बिना याद किये भी (स्वाभाविक रूप से) अपनी ही मानता रहता है अर्थात् अपने को उनसे अलग नहीं मानता। जीव की विजातीय शरीर और संसार के साथ (भूल से की हुई) सम्बन्ध की मान्यता भी इतनी दृढ़ रहती है कि बिना याद किये सदा याद रहती है। अगर वह अपने सजातीय (चेतन और नित्य) परमात्मा के साथ अपने वास्तविक सम्बन्ध को पहचान ले तो किसी भी अवस्था में परमात्मा को नहीं भूल सकता। फिर उठते-बैठते , खाते-पीते , सोते-जागते हर समय प्रत्येक अवस्था में भगवान का स्मरण-चिन्तन स्वतः होने लगता है। जिस साधक का उद्देश्य सांसारिक भोगों का संग्रह और उनसे सुख लेना नहीं है बल्कि एकमात्र परमात्मा को प्राप्त करना ही है उसके द्वारा भगवान से अपने सम्बन्ध की पहचान आरम्भ हो गयी – ऐसा मान लेना चाहिये। इस सम्बन्ध की पूर्ण पहचान के बाद साधक में मन , बुद्धि , इन्द्रियाँ , शरीर आदि के द्वारा सांसारिक भोग और उनका संग्रह करने की इच्छा बिलकुल नहीं रहती। वास्तव में एकमात्र भगवान का होते हुए जीव जितने अंश में प्रकृति से सुखभोग प्राप्त करना चाहता है उतने ही अंश में उसने इस भगवत्सम्बन्ध को दृढ़तापूर्वक नहीं पकड़ा है। उतने अंश में उसका प्रकृति के साथ ही सम्बन्ध है। इसलिये साधक को चाहिये कि वह प्रकृति से विमुख होकर अपने आपको केवल भगवान का ही माने , उन्हीं के सम्मुख हो जाय। ‘श्रद्धया परयोपेतास्ते ये युक्ततमा मताः’ – साधक की श्रद्धा वहीं होगी जिसे वह सर्वश्रेष्ठ समझेगा। श्रद्धा होने पर अर्थात् बुद्धि लगने पर वह अपने द्वारा निश्चित किये हुए सिद्धान्त के अनुसार स्वाभाविक जीवन बनायेगा और अपने सिद्धान्त से कभी विचलित नहीं होगा। जहाँ प्रेम होता है वहाँ मन लगता है और जहाँ श्रद्धा होती है वहाँ बुद्धि लगती है। प्रेम में प्रेमास्पद के सङ्ग की तथा श्रद्धा में आज्ञापालन की मुख्यता रहती है। एकमात्र भगवान में प्रेम होने से भक्त को भगवान के साथ नित्य-निरन्तर सम्बन्ध का अनुभव होता है , कभी वियोग का अनुभव होता ही नहीं। इसीलिये भगवान के मत में ऐसे भक्त ही वास्तव में उत्तम योगवेत्ता हैं। यहाँ ‘ते मे युक्ततमा मताः ‘ बहुवचनान्त पद से जो बात कही गयी है यही बात छठे अध्याय के 47वें श्लोक में ‘स मे युक्ततमो मतः’ एकवचनान्त पद से कही जा चुकी है (टिप्पणी प0 625)। पूर्वश्लोक में भगवान ने सगुण उपासकों को सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। इस पर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या निर्गुण उपासक सर्वश्रेष्ठ योगी नहीं हैं इसके उत्तर में भगवान कहते हैं – स्वामी रामसुखदास जी 

 

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