BhaktiYog ~ Bhagwat Geeta Chapter 12 | भक्तियोग ~ अध्याय बारह
अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग
01 – 12 साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥12.3॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥12.4॥
ये-जो; तु–लेकिन; अक्षरम्-अविनाशी; अनिर्देश्यम्-अनिचित; अव्यक्तम्-अप्रकट; पर्युपासते-आराधना करना; सर्वत्रगम्-सर्वव्यापी; अचिन्त्यम्-अकल्पनीय; च-और; कूटस्थम्-अपरिवर्तित; अचलम्-अचल; ध्रुवम्-शाश्वत; सकियम्य-वश में करके; इन्द्रियग्रामम्-समस्त इन्द्रियों को; सर्वत्र – सभी स्थानों में; समबुद्धयः-समदर्शी; ते-वे; प्राप्नुवन्ति-प्राप्त करते हैं; माम्-मुझको; एव-निश्चय ही; सर्वभूतहिते-समस्त जीवों के कल्याण के लिए; रताः-तल्लीन।
परन्तु जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को निग्रह करके, उनको भली प्रकार वश में कर के सर्वत्र समभाव से मन-बुद्धि से परे मेरे परम सत्य, निराकार, अविनाशी, अनिर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापक, अकल्पनीय, अपरिवर्तनीय, अकथनीय , शाश्वत, नित्य , अचिन्त्य , अनिर्देश्य , अक्षर , सदा एकरस रहने वाले , सच्चिदानंदघन ब्रह्म और अचल रूप की पूजा करते हैं, वे सभी जीवों ( भूतों ) और प्राणिमात्र के कल्याण में रत ( संलग्न ) , सबमें समान भाव वाले और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं॥12.3-12.4॥
‘तु ‘ यहाँ ‘तु’ पद साकार उपासकों से निराकार उपासकों की भिन्नता दिखाने के लिये आया है। ‘संनियम्येन्द्रियग्रामम् ‘ – ‘सम् ‘ और ‘नि ‘ – दो उपसर्गों से युक्त ‘संनियम्य’ पद देकर भगवान ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियों को सम्यक् प्रकार से एवं पूर्णतः वश में करे जिससे वे किसी अन्य विषय में न जाएं । इन्द्रियाँ अच्छी प्रकार से पूर्णतः वश में न होने पर निर्गुण तत्त्व की उपासना में कठिनता होती है। सगुण उपासना में तो ध्यान का विषय सगुण भगवान होने से इन्द्रियाँ भगवान में लग सकती हैं क्योंकि भगवान के सगुण स्वरूप में इन्द्रियों को अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण उपासना में इन्द्रियसंयम की आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है जितनी निर्गुण उपासना में है। निर्गुण उपासना में चिन्तन का कोई आधार न रहने से इन्द्रियों का सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहने पर) विषयों में मन जा सकता है और विषयों का चिन्तन होने से पतन होने की अधिक सम्भावना रहती है (गीता 2। 62 — 63)। अतः निर्गुणोपासक के लिये सभी इन्द्रियों को विषयों से हटाते हुए सम्यक् प्रकार से पूर्णतः वश में करना आवश्यक है। इन्द्रियों को केवल बाहर से ही वश में नहीं करना है बल्कि विषयों के प्रति साधक के अन्तःकरण में भी राग नहीं रहना चाहिये क्योंकि जब तक विषयों में राग है तब तक ब्रह्म की प्राप्ति कठिन है (गीता 15। 11)। गीता में इन्द्रियों को वश में करने की बात विशेषरूप से जितनी निर्गुणोपासना तथा कर्मयोग में आयी है उतनी सगुणोपासना में नहीं। ‘अचिन्त्यम् ‘ – मन-बुद्धि का विषय न होने के कारण ‘अचिन्त्यम्’ पद निर्गुण-निराकार ब्रह्म का वाचक है क्योंकि मन-बुद्धि प्रकृति का कार्य होने से सम्पूर्ण प्रकृति को भी अपना विषय नहीं बना सकते फिर प्रकृति से अतीत परमात्मा इनका विषय बन ही कैसे सकता है ? प्राकृतिक पदार्थमात्र चिन्त्य है और परमात्मा प्रकृति से अतीत होने के कारण सम्पूर्ण पदार्थों से भी अतीत और विलक्षण हैं। प्रकृति की सहायता के बिना उनका चिन्तन और वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः परमात्मा को स्वयं (करण निरपेक्ष ज्ञान) से ही जाना जा सकता है , प्रकृति के कार्य मनबुद्धि आदि (करण सापेक्ष ज्ञान ) से नहीं। ‘सर्वत्रगम्’ – सब देश , काल , वस्तु और व्यक्तियों में परिपूर्ण होने से ब्रह्म ‘सर्वत्रगम्’ है। सर्वव्यापी होने के कारण वह सीमित मन-बुद्धि-इन्द्रियों से ग्रहण नहीं किया जा सकता। ‘अनिर्देश्यम् ‘ – जिसे ‘इदंता’ से नहीं बताया जा सकता अर्थात् जो भाषा , वाणी आदि का विषय नहीं है वह ‘अनिर्देश्यम्’ है। निर्देश (संकेत) उसी का किया जा सकता है? जो जाति , गुण , क्रिया एवं सम्बन्ध से युक्त हो और देश , काल , वस्तु एवं व्यक्ति से परिच्छिन्न हो परन्तु जो चिन्मय तत्त्व सर्वत्र परिपूर्ण हो उसका संकेत जड भाषा , वाणी से कैसे किया जा सकता है ? ‘कूटस्थम् ‘ – यह पद निर्विकार सदा एकरस रहने वाले सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का वाचक है। सभी देश , काल , वस्तु , व्यक्ति आदि में रहते हुए भी वह तत्त्व सदा निर्विकार और निर्लिप्त रहता है। उसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये वह कूटस्थ है। कूट (अहरन) में तरह-तरह के गहने , अस्त्र , औजार आदि पदार्थ गढ़े जाते हैं पर वह ज्यों का त्यों रहता है। इसी प्रकार संसार के भिन्न-भिन्न प्राणी पदार्थों की उत्पत्ति , स्थिति और विनाश होने पर भी परमात्मा सदा ज्यों के त्यों रहते हैं। ‘अचलम् ‘ – यह पद आने-जाने की क्रिया से सर्वथा रहित ब्रह्म का वाचक है। प्रकृति चल है और ब्रह्म अचल है। ‘ध्रुवम् ‘ – जिसकी सत्ता निश्चित (सत्य) और नित्य है उसको ध्रुव कहते हैं। सच्चिदानन्दघन ब्रह्म सत्तारूप से सर्वत्र विद्यमान रहने से ध्रुवम् है। निर्गुण ब्रह्म के आठों विशेषणों में सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषण ‘ध्रुवम्’ है। ब्रह्म के लिये अनिर्देश्य , अचिन्त्य आदि निषेधात्मक विशेषण देने से कोई ऐसा न समझ ले कि वह है ही नहीं इसलिये यहाँ ‘ध्रुवम्’ विशेषण देकर उस तत्त्व की निश्चित सत्ता बतायी गयी है। उस तत्त्व का कभी कहीं किञ्चिन्मात्र भी अभाव नहीं होता। उसकी सत्ता से ही असत् (संसार ) को सत्ता मिल रही है – ‘जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।’ (मानस 1। 117। 4)। ‘अक्षरम्’ – जिसका कभी क्षरण अर्थात् विनाश नहीं होता तथा जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ‘अक्षरम्’ है। ‘अव्यक्तम्’ – जो व्यक्त न हो अर्थात् मन-बुद्धि-इन्द्रियों का विषय न हो और जिसका कोई रूप या आकार न हो उसको ‘अव्यक्तम्’ कहा गया है। ‘पर्युपासते ‘ – यह पद यहाँ निर्गुण उपासकों की सम्यक् उपासना का बोधक है। शरीरसहित सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में वासना तथा अहंभाव का अभाव तथा भावरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मा में अभिन्न भाव से नित्यनिरन्तर दृढ़ स्थित रहना ही उपासना करना है। इन श्लोकों में आठ विशेषणों से जिस विशेष वस्तु तत्त्व का लक्ष्य कराया गया है और उससे जो विशेष वस्तु समझ में आती है वह बुद्धि-विशिष्ट ब्रह्म का ही स्वरूप है जो कि पूर्ण नहीं है क्योंकि (लक्षण और विशेषणों से रहित ) निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्म का स्वरूप (जो बुद्धि से अतीत है) किसी भी प्रकार से पूर्णतया बुद्धि आदि का विषय नहीं हो सकता। हाँ , इन विशेषणों का लक्ष्य रखकर जो उपासना की जाती है वह निर्गुण ब्रह्म की ही उपासना है और इसके परिणाम में प्राप्ति भी निर्गुण ब्रह्म की ही होती है। विशेष बात-परमात्मा को तत्त्व से समझाने के लिये दो प्रकार के विशेषण दिये जाते हैं – निषेधात्मक और विध्यात्मक। परमात्मा के अक्षर , अनिर्देश्य , अव्यक्त , अचिन्त्य , अचल , अव्यय , असीम , अपार , अविनाशी आदि विशेषण निषेधात्मक हैं और सर्वव्यापी , कूटस्थ , ध्रुव , सत् , चित्त , आनन्द आदि विशेषण विध्यात्मक हैं। परमात्मा के निषेधात्मक विशेषणों का तात्पर्य प्रकृति से परमात्मा की असङ्गता बताना है और विध्यात्मक विशेषणों का तात्पर्य परमात्मा की स्वतन्त्र सत्ता बताना है। परमात्मतत्त्व सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति – दोनों से परे (सहज निवृत्त) और दोनों को समानरूप से प्रकाशित करने वाला है। ऐसे निरपेक्ष परमात्मतत्त्व का लक्ष्य कराने के लिये और बुद्धि को परमात्मा के नजदीक पहुँचाने के लिये ही भिन्न-भिन्न विशेषणों से परमात्मा का वर्णन (लक्ष्य ) किया जाता है। गीता में परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का वर्णन प्रायः समान ही मिलता है। परमात्मा के लिये यहाँ जो विशेषण दिये गये हैं वही विशेषण गीता में जीवात्मा के लिये भी दिये गये हैं जैसे – दूसरे अध्याय के 24वें , 25वें श्लोकों में सर्वगतः , अचलः , अव्यक्तः , अचिन्त्यः आदि और 15वें अध्याय के 16वें श्लोक में ‘कूटस्थः’ एवं ‘अक्षरः’ विशेषण जीवात्मा के लिये आये हैं। इसी प्रकार 7वें अध्याय के 25वें श्लोक में ‘अव्ययम् ‘ विशेषण परमात्मा के लिये और 14वें अध्याय के 5वें श्लोक में ‘अव्ययम्’ विशेषण जीवात्मा के लिये आया है। संसार में व्यापक रूप से भी परमात्मा और जीवात्मा को समान बताया गया है जैसे – 8वें अध्याय के 22वें तथा 18वें अध्याय के 46वें श्लोक में ‘येन सर्वमिदं ततम्’ पदों से और 9वें अध्याय के चौथे श्लोक में ‘मया ततमिदं सर्वम्’ पदों से परमात्मा को सम्पूर्ण जगत में व्याप्त बताया गया है। इसी प्रकार दूसरे अध्याय के 17वें श्लोक में ‘येन सर्वमिदं ततम्’ पदों से जीवात्मा को भी सम्पूर्ण जगत में व्याप्त बताया गया है। जैसे नेत्रों की दृष्टि आपस में नही टकराती अथवा व्यापक होने पर भी शब्द परस्पर नहीं टकराते। ऐसे ही (द्वैतमत के अनुसार ) सम्पूर्ण जगत में समान रूप से व्याप्त होने पर भी निरवयव होने से परमात्मा और जीवात्मा की सर्वव्यापकता आपस में नहीं टकराती। ‘सर्वभूतहिते रताः’ – कर्मयोग के साधन में आसक्ति , ममता , कामना और स्वार्थ के त्याग की मुख्यता है। मनुष्य जब शरीर , धन , सम्पत्ति आदि पदार्थों को अपना और अपने लिये न मानकर उनको दूसरों की सेवा में लगाता है तब उसकी आसक्ति , ममता , कामना और स्वार्थभाव का त्याग स्वतः हो जाता है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्र की सेवा करना ही है वह अपने शरीर और पदार्थों को (दीन , दुःखी , अभावग्रस्त ) प्राणियों की सेवा में लगायेगा ही। शरीर को दूसरों की सेवा में लगाने से अहंता और पदार्थों को दूसरों की सेवा में लगाने से ममता नष्ट होती है। साधक का पहले से ही यह लक्ष्य होता है कि जो पदार्थ सेवा में लग रहे हैं वे सेव्य के ही हैं। अतः कर्मयोग के साधन में सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये ‘सर्वभूतहिते रताः’ पद का प्रयोग कर्मयोग का आचरण करने वाले के सम्बन्ध में करना ही अधिक युक्तिसङ्गत है परन्तु भगवान ने इस पद का प्रयोग यहाँ तथा 5वें अध्याय के 25वें श्लोक में – दोनों ही स्थानों पर ज्ञानयोगियों के सम्बन्ध में किया है। इससे यही सिद्ध होता है कि कर्मों से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिये कर्मयोग की प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता ज्ञानयोग में भी है। एक बात खास ध्यान देने की है। शरीर , पदार्थ और क्रिया से जो सेवा की जाती है वह सीमित ही होती है क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ मिलकर भी सीमित ही हैं परन्तु सेवा में प्राणिमात्र के हित का भाव असीम होने से सेवा भी असीम हो जाती है। अतः पदार्थों के अपने पास रहते हुए भी (उनमें आसक्ति , ममता आदि न करके) उनको सम्पूर्ण प्राणियों का मानकर उन्हीं की सेवा में लगाना है क्योंकि वे पदार्थ समष्टि के ही हैं। ऐसा असीम भाव होने पर जडता से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाने के कारण साधक को असीम तत्त्व (परमात्मा ) की प्राप्ति हो जाती है। कारण कि पदार्थों को व्यक्तिगत (अपना ) मानने से ही मनुष्य में परिच्छिन्नता (एकदेशीयता ) तथा विषमता रहती है और पदार्थों को व्यक्तिगत न मानकर सम्पूर्ण प्राणियों के हित का भाव रखने से परिच्छिन्नता तथा विषमता मिट जाती है। इसके विपरीत साधारण मनुष्य का ममता वाले प्राणियों की सेवा करने का सीमित भाव रहने से वह चाहे अपना सर्वस्व उनकी सेवा में क्यों न लगा दे तो भी पदार्थों में तथा जिनकी सेवा करे उनमें आसक्ति , ममता आदि रहने से (सीमित भाव के कारण ) उसे असीम परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं होती। अतः असीम परमात्मतत्त्व की प्राप्ति के लिये प्राणिमात्र के हित में रति अर्थात् प्रीतिरूप असीम भाव का होना आवश्यक है। ‘सर्वभूतहिते रताः’ पद उसी भाव को व्यक्त करते हैं। ज्ञानयोग का साधक जडता से सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहता तो है परन्तु जब तक उसके हृदय में नाशवान पदार्थों का आदर है तब तक पदार्थों को मायामय अथवा स्वप्नवत समझकर उनका ऐसे ही त्याग कर देना उसके लिये कठिन है परन्तु कर्मयोग का साधक पदार्थों को दूसरों की सेवा में लगाकर उनका त्याग ज्ञानयोगी की अपेक्षा सुगमतापूर्वक कर सकता है। ज्ञानयोगी में तीव्र वैराग्य होने से ही पदार्थों का त्याग हो सकता है परन्तु कर्मयोगी थोड़े वैराग्य में ही पदार्थों का त्याग (परहित में ) कर सकता है। प्राणियों के हित में पदार्थों का सदुपयोग करने से जडता से सुगमतापूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। भगवान ने यहाँ ‘सर्वभूतहिते रताः’ पद देकर यही बताया है कि प्राणिमात्र के हित में रत रहने से पदार्थों के प्रति आदरबुद्धि रहते हुए भी जडता से सम्बन्ध-विच्छेद सुगमतापूर्वक हो जायगा। प्राणिमात्र का हित करने के लिये कर्मयोग ही सुगम उपाय है। निर्गुण उपासकों की साधना के अन्तर्गत अनेक अवान्तर भेद होते हुए भी मुख्य भेद दो हैं – (1) जड-चेतन और चर-अचर के रूप में जो कुछ प्रतीत होता है वह सब आत्मा या ब्रह्म है और (2) जो कुछ दृश्यवर्ग प्रतीत होता है वह अनित्य , क्षणभङ्गुर और असत है – इस प्रकार संसार का बोध करने पर जो तत्त्व शेष रह जाता है वह आत्मा या ब्रह्म है। पहली साधना में सब कुछ ब्रह्म है इतना सीख लेनेमात्र से ज्ञाननिष्ठा सिद्ध नहीं होती। जब तक अन्तःकरण में राग अर्थात् काम-क्रोध आदि विकार हैं तब तक ज्ञान-निष्ठा का सिद्ध होना बहुत कठिन है। जैसे राग मिटाने के लिये कर्मयोगी के लिये सभी प्राणियों के हित में रति होना आवश्यक है – ऐसे ही निर्गुण उपासना करने वाले साधकों के लिये भी प्राणिमात्र के हित में रति होना आवश्यक है – तभी राग मिटकर ज्ञान निष्ठा सिद्ध हो सकती है। इसी बात का लक्ष्य कराने के लिये यहाँ ‘सर्वभूतहिते रताः’ पद आये हैं। दूसरी साधना में जो साधक संसार से उदासीन रहकर एकान्त में ही तत्त्व का चिन्तन करते रहते हैं उनके लिये कर्मों का स्वरूप से त्याग सहायक तो होता है परन्तु केवल कर्मों का स्वरूप से त्याग कर देनेमात्र से ही सिद्धि प्राप्त नहीं होती (गीता 3। 4) बल्कि सिद्धि प्राप्त करने के लिये भोगों से वैराग्य और शरीर-इन्द्रिय-मन-बुद्धि में अपनेपन के त्याग की अत्यन्त आवश्यकता है। इसलिये वैराग्य और निर्ममता के लिये ‘सर्वभूतहिते रताः’ होना आवश्यक है। ज्ञानयोग का साधक प्रायः समाज से दूर असङ्ग रहता है। अतः उसमें व्यक्तित्व रह जाता है जिसे दूर करने के लिये संसारमात्र के हित का भाव रहना अत्यन्त आवश्यक है। वास्तव में असङ्गता शरीर से ही होनी चाहिये। समाज से असङ्गता होने पर अहंभाव दृढ़ होता है अर्थात् मिटता नहीं। जब तक साधक अपने को शरीर से स्पष्टतः अलग अनुभव नहीं कर लेता तब तक संसार से अलग रहने मात्र से उसका लक्ष्य सिद्ध नहीं होता क्योंकि शरीर भी संसार का ही अङ्ग है और शरीर में तादात्म्य और ममता का न रहना ही उससे वस्तुतः अलग होना है। तादात्म्य और ममता मिटाने के लिये साधक को प्राणिमात्र के हित में लगना आवश्यक है। दूसरी बात यह है कि साधक सर्वदा एकान्त में ही रहे यह सम्भव भी नहीं है क्योंकि शरीरनिर्वाह के लिये उसे व्यवहार क्षेत्र में आना ही पड़ता है और वैराग्य में कमी होने पर उसके व्यवहार में अभिमान के कारण कठोरता आने की सम्भावना रहती है तथा कठोरता आने से उसके व्यक्तित्व (अहंभाव ) का नाश नहीं होता। अतः उसे तत्त्व की प्राप्ति में कठिनता होती है। व्यवहार में कहीं कठोरता न आ जाय इसके लिये भी यह जरूरी है कि साधक सभी प्राणियों के हित में रत रहे। ऐसे ज्ञानयोग के साधक द्वारा सेवाकार्य का विस्तार चाहे न हो परन्तु भगवान कहते हैं कि वह भी (सभी प्राणियों के हित में रति होने के कारण ) मेरे को प्राप्त कर लेगा। सगुणोपासक और निर्गुणोपासक – दोनों ही प्रकार के साधकों के लिये सम्पूर्ण प्राणियों के हित का भाव रखना जरूरी है। सम्पूर्ण प्राणियों के हित से अलग अपना हित मानने से अहम् अर्थात् व्यक्तित्व बना रहता है जो साधक के लिये आगे चलकर बाधक होता है। वास्तव में कल्याण अहम् के मिटने पर ही होता है। अपने लिये किये जाने वाले साधन से अहम् बना रहता है इसलिये अहम को पूर्णतया मिटाने के लिये साधक को प्रत्येक क्रिया (खाना , पीना , सोना आदि एवं जप , ध्यान , पाठ , स्वाध्याय आदि भी ) संसारमात्र के हित के लिये ही करनी चाहिये। संसार के हित में ही अपना हित निहित है। भगवान की मात्र शक्ति परहित में लग रही है। अतः जो सबके हित में लगेगा भगवान की शक्ति उसके साथ हो जायगी। केवल दूसरे के लिये वस्तुओं को देना और शरीर से सेवा कर देना ही सेवा नहीं है बल्कि अपने लिये कुछ भी न चाहकर दूसरे का हित कैसे हो? उसको सुख कैसे मिले ? इस भाव से कर्म करना ही सेवा है। अपने को सेवक कहलाने का भाव भी मन में नहीं रहना चाहिये। सेवा तभी हो सकती है जब सेवक जिसकी सेवा करता है उसे अपने से अभिन्न (अपने शरीर की तरह ) मानता है और बदले में उससे कुछ भी लेना नहीं चाहता। जैसे मनुष्य बिना किसी के उपदेश दिये अपने शरीर की सेवा स्वतः ही बड़ी सावधानी से करता है और सेवा करने का अभिमान भी नहीं करता – ऐसे ही सर्वत्र आत्मबुद्धि होने से सिद्ध महापुरुषों की स्वतः सबके हित में रति रहती है (गीता 6। 32)। उनके द्वारा प्राणिमात्र का कल्याण होता है परन्तु उनके मन में लेशमात्र भी ऐसा भाव नहीं होता कि हम किसी का कल्याण कर रहे हैं। उनमें अहंता का सर्वथा अभाव हो जाता है । अतः ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषों को आदर्श मानकर साधक को चाहिये कि सर्वत्र आत्मबुद्धि करके संसार के किसी भी प्राणी को किञ्चिन्मात्र भी दुःख न पहुँचाकर उनके हित में सदा तत्परता से स्वाभाविक ही रत रहे। ‘सर्वत्र समबुद्धयः’ – इस पद का भाव यह है कि निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासकों की दृष्टि सम्पूर्ण प्राणी पदार्थों में परिपूर्ण परमात्मा पर ही रहने के कारण विषम नहीं होती क्योंकि परमात्मा सम है (गीता 5। 19)। यहाँ भगवान ज्ञाननिष्ठा वाले उपासकों के लिये इस पद का प्रयोग करके एक विशेष भाव प्रकट करते हैं कि ज्ञानमार्गियों के लिये एकान्त में रहकर तत्त्व का चिन्तन करना ही एकमात्र साधन नहीं है क्योंकि ‘समबुद्धयः’ पद की सार्थकता विशेषरूप से व्यवहारकाल में ही होती है। दूसरी बात – संसार से हटकर शरीर को निर्जन स्थान में ले जाना ही सर्वथा एकान्त सेवन नहीं है क्योंकि शरीर भी तो संसार का ही एक अङ्ग है। शऱीर और संसार को अलग-अलग देखना विषमबुद्धि है। अतः शरीर और संसार को एक देखने पर ही समबुद्धि हो सकती है। वास्तविक एकान्त की सिद्धि तो परमात्मतत्त्व के अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थों अर्थात् शरीर और संसार की सत्ता का अभाव होने से ही होती है। साधन करने के लिये एकान्त भी उपयोगी है परन्तु सर्वथा एकान्तसेवी साधक के द्वारा व्यवहारकाल में भूल होना सम्भव है। शरीर में अपनापन न होना ही वास्तविक एकान्त है। अतः साधक को चाहिये कि वास्तविक एकान्त को लक्ष्य में रखकर अर्थात् शरीर , इन्द्रियाँ , मन और बुद्धि से अपनी अहंता-ममता हटाकर सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित रहे। ऐसे साधक ही वास्तव में समबुद्धि हैं।गीता में समबुद्धि का तात्पर्य समदर्शन है न कि समवर्तन। 5वें अध्याय के 18वें श्लोक में भगवान ने विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण तथा गाय , हाथी , कुत्ता और चाण्डाल – इन पाँच प्राणियों के नाम गिनाये हैं जिनके साथ व्यवहार में किसी भी प्रकार से समता होनी सम्भव नहीं। वहाँ भी ‘समदर्शिनः’ पद प्रयुक्त हुआ है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि सबके प्रति व्यवहार कभी समान नहीं हो सकता। व्यवहार एक समान कोई कर सकता भी नहीं और होना चाहिये भी नहीं। व्यवहार में भिन्नता होनी आवश्यक है। व्यवहार में साधक की विभिन्न प्राणी पदार्थों की आकृति और उपयोगिता पर दृष्टि रहते हुए भी वास्तव में उसकी दृष्टि उन प्राणीपदार्थों में परिपूर्ण परमात्मा पर ही रहती है। जैसे विभिन्न प्रकार के गहनों से तत्त्व (सोने ) में कोई अन्तर नहीं आता – ऐसे ही विभिन्न प्रकार के व्यवहार से साधक की तत्त्वदृष्टि में कोई अन्तर नहीं आता। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति साधक में आन्तरिक समता रहती है। यहाँ ‘समबुद्धयः’ पद से उस आन्तरिक समता की ओर ही लक्ष्य कराया गया है। सिद्ध महापुरुषों की दृष्टि में एक परमात्मा के सिवाय दूसरी सत्ता न रहने के कारण वे सदा और सर्वत्र समबुद्धि ही हैं। सिद्ध महापुरुषों की स्वतःसिद्ध स्थिति ही साधकों के लिये आदर्श होती है और उसी को लक्ष्य करके वे चलते हैं। साधकों की दृष्टि में परमात्मा के सिवाय अन्य पदार्थों की जितने अंश में सत्ता रहती है उतने ही अंश में उनकी बुद्धि में समता नहीं रहती। अतः साधक की बुद्धि में अन्य पदार्थों की स्वतन्त्र सत्ता जैसे-जैसे कम होती जायगी , वैसे-वैसे ही उसकी बुद्धि सम होती जायगी। साधक अपनी बुद्धि से सर्वत्र परमात्मा को देखने की चेष्टा करता है जबकि सिद्ध महापुरुषों की बुद्धि में परमात्मा स्वाभाविक रूप से इतनी घनता से परिपूर्ण हैं कि उनके लिये परमात्मा के सिवाय और कुछ है ही नहीं। इसलिये उनकी बुद्धि का विषय परमात्मा नहीं है बल्कि उनकी बुद्धि ही परमात्मा से परिपूर्ण है। अतः वे सर्वत्र ‘समबुद्धयः ‘ हैं। ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव ‘ – निर्गुण के उपासक कहीं यह समझ लें कि निर्गुण तत्त्व कोई दूसरा है और सगुण कोई दूसरा है इसलिये भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि निर्गुण ब्रह्म मुझसे भिन्न नहीं है (गीता 9। 4 14। 27)। सगुण और निर्गुण दोनों मेरे ही स्वरूप हैं। इन दोनों श्लोकों में भगवान ने निर्गुण उपासकों के लिये चार बातें बतायी हैं (1) निर्गुण तत्त्व का स्वरूप क्या है ? (2) साधक की स्थिति क्या है ? (3) उपासना का स्वरूप क्या है ? (4) साधक क्या प्राप्त करता है ? (1) अर्जुन ने इसी अध्याय के पहले श्लोक के उत्तरार्ध में जिस निर्गुणतत्त्व के लिये ‘अक्षरम्’ और ‘अव्यक्तम्’ दो विशेषण प्रयुक्त करके प्रश्न किया था उसी तत्त्व का विस्तार से वर्णन करने के लिये भगवान ने छः और विशेषण अर्थात् कुल आठ विशेषण दिये जिनमें पाँच निषेधात्मक (अक्षरम् , अनिर्देश्यम् , अव्यक्तम् , अचिन्त्यम् और अचलम् ) तथा तीन विध्यात्मक (सर्वत्रगम् , कूटस्थम् और ध्रुवम् ) विशेषण हैं। (2) सब देश , काल , वस्तु और व्यक्तियों में परिपूर्ण तत्त्व पर दृष्टि रहने से निर्गुण उपासकों की सर्वत्र समबुद्धि होती है। देहाभिमान और भोगों की पृथक् सत्ता मानने के कारण ही भोग भोगने की इच्छा होती है और भोग भोगे जाते हैं परन्तु इन निर्गुण उपासकों की दृष्टि में एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की पृथक् (स्वतन्त्र ) सत्ता न होने के कारण उनकी बुद्धि में भोगों का महत्त्व नहीं रहता। अतः वे सुगमतापूर्वक इन्द्रियों का संयम कर लेते हैं। सर्वत्र समबुद्धि वाले होने के कारण उनकी सब प्राणियों के हित में रति रहती है। इसलिये वे ‘सर्वभूतहिते रताः ‘ हैं। (3) साधक का सब समय उस निर्गुणतत्त्व की ओर दृष्टि रखना (तत्त्व के सम्मुख रहना) ही उपासना है। (4) भगवान कहते हैं कि ऐसे साधकों को जो निर्गुण ब्रह्म प्राप्त होता है – वह मैं ही हूँ। तात्पर्य यह है कि सगुण और निर्गुण एक ही तत्त्व है। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में भगवान ने दूसरे श्लोक में सगुण उपासकों को सर्वश्रेष्ठ बताया और तीसरे-चौथे श्लोकों में निर्गुण उपासकों को अपनी प्राप्ति की बात कही। अब दोनों प्रकार की उपासनाओं के अवान्तर भेद तथा कठिनाई एवं सुगमता का वर्णन आगे के तीन श्लोकों में करते हैं – स्वामी रामसुखदास जी