BhaktiYog ~ Bhagwat Geeta Chapter 12 | भक्तियोग ~ अध्याय बारह
अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग
01 – 12 साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥12.8॥
मयि-मुझमें; एव-अकेले ही; मन:-मन को; आधत्स्व-स्थिर; मयि-मुझमें; बुद्धिम्-बुद्धि; निवेशय-समर्पित करो; निवसिष्यसि-तुम सदैव निवास करोगे; मयि-मुझमें; एव-अकेले ही; अतःऊर्ध्वम्-तत्पश्चात; न – कभी नहीं; संशयः-सन्देह।
अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही लगाओ अर्थात अपने मन को केवल मुझ पर स्थिर करो और अपनी बुद्धि मुझे समर्पित कर दो। इस के पश्चात् तुम सदैव मुझ में स्थित रहोगे- मुझमें ही निवास करोगे- इसमें कोई संदेह नहीं हैं॥12.8॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय – भगवान के मत में वे ही पुरुष उत्तम योगवेत्ता हैं जिनको भगवान के साथ अपने नित्य-योग का अनुभव हो गया है। सभी साधकों को उत्तम योगवेत्ता बनाने के उद्देश्य से भगवान अर्जुन को निमित्त बनाकर यह आज्ञा देते हैं कि मुझ परमेश्वर को ही परम श्रेष्ठ और परम प्रापणीय मानकर बुद्धि को मेरे में लगा दे और मेरे को ही अपना परम प्रियतम मानकर मनको मेरे में लगा दे। भगवान में हमारी स्वतःसिद्ध स्थिति (नित्ययोग ) है परन्तु भगवान में मन-बुद्धि के न लगने के कारण हमें भगवान के साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध का अनुभव नहीं होता। इसलिये भगवान कहते हैं कि मन-बुद्धि को मेरे में लगा फिर तू मेरे में ही निवास करेगा (जो पहले से ही है) अर्थात् तुझे मेरे में अपनी स्वतःसिद्ध स्थिति का अनुभव हो जायगा। मन-बुद्धि लगाने का तात्पर्य यह है कि अब तक मनुष्य जिस मन से जड संसार में ममता , आसक्ति , सुखभोग की इच्छा , आशा आदि के कारण बार-बार संसार का ही चिन्तन करता रहा है और बुद्धि से संसार में ही अच्छे-बुरे का निश्चय करता रहा है उस मन को संसार से हटाकर भगवान में लगाये तथा बुद्धि के द्वारा दृढ़ता से निश्चय करे कि मैं केवल भगवान का ही हूँ और केवल भगवान ही मेरे हैं तथा मेरे लिये सर्वोपरि , परमश्रेष्ठ एवं परम प्रापणीय भगवान ही हैं। ऐसा दृढ़ निश्चय करने से संसार का चिन्तन और महत्त्व समाप्त हो जायगा और एक भगवान के साथ ही सम्बन्ध रह जायगा। यही मन-बुद्धि का भगवान में लगाना है। मन-बुद्धि लगाने में भी बुद्धि का लगाना मुख्य है। किसी विषय में पहले बुद्धि का ही निश्चय होता है और फिर बुद्धि के उस निश्चय को मन स्वीकार कर लेता है। साधन करने में भी पहले (उद्देश्य बनाने में ) बुद्धि की प्रधानता होती है फिर मन की प्रधानता होती है। जिन पुरुषों का लक्ष्य भगवत्प्राप्ति नहीं है उनके मन-बुद्धि भी वे जिस विषय में लगाना चाहेंगे उस विषय में लग सकते हैं। उस विषय में मन-बुद्धि लग जाने पर उन्हें सिद्धियाँ तो प्राप्त हो सकती हैं पर (भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य न होने से ) भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः साधक को चाहिये कि बुद्धि से यह दृढ़ निश्चय कर ले कि मुझे भगवत्प्राप्ति ही करनी है। इस निश्चय में बड़ी शक्ति है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होने में सबसे बड़ी बाधा है – भोग और संग्रह का सुख लेना। सुख की आशा से ही मनुष्य की वृत्तियाँ , धन , मान-बड़ाई आदि पाने का उद्देश्य बनाती हैं इसलिये उसकी बुद्धि बहुत भेदों वाली तथा अनन्त हो जाती है (गीता 2। 41) परन्तु अगर भगवत्प्राप्ति का ही एक निश्चय हो तो इस निश्चय में इतनी पवित्रता और शक्ति है कि दुराचारी से दुराचारी पुरुष को भी भगवान साधु मानने के लिये तैयार जो जाते हैं । इस निश्चयमात्र के प्रभाव से वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परमशान्ति प्राप्त कर लेता है (गीता 9। 3031)। मैं भगवान का ही हूँ और भगवान ही मेरे हैं – ऐसा निश्चय (साधक की दृष्टि में ) बुद्धि में हुआ प्रतीत होता है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। बुद्धि में ऐसा निश्चय दिखने पर भी साधक को इस बात का पता नहीं होता कि वह स्वयं पहले से ही भगवान में स्थित है। वह चाहे इस बात को न भी जाने पर वास्तविकता यही है। स्वयं भगवान में स्थित होने की पहचान यही है कि इस सम्बन्ध की कभी विस्मृति नहीं होती। अगर यह केवल बुद्धि की बात हो तो भूली भी जा सकती है पर मैंपन की बात को साधक कभी नहीं भूलता। जैसे मैं विवाहित हूँ यह मैंपन का निश्चय है , बुद्धि का नहीं। इसीलिये मनुष्य इस बात को कभी नहीं भूलता। अगर कोई यह निश्चय कर ले कि मैं अमुक गुरु का शिष्य हूँ तो इस सम्बन्ध के लिये कोई अभ्यास न करने पर भी यह निश्चय उसके भीतर अटल रहता है। स्मृति में तो स्मृति रहती ही है विस्मृति में भी सम्बन्ध की स्मृति का अभाव नहीं होता क्योंकि सम्बन्ध का निश्चय मैंपन में है। इस प्रकार संसार में माना हुआ सम्बन्ध भी जब स्मृति और विस्मृति दोनों अवस्थाओं में अटल रहता है तब भगवान के साथ जो सदा से ही नित्यसम्बन्ध है उसकी विस्मृति कैसे हो सकती है ? अतः मैं भगवान का ही हूँ और भगवान ही मेरे हैं – इस प्रकार मैंपन (स्वयं ) के भगवान में लग जाने से मन-बुद्धि भी स्वतः भगवान में लग जाते हैं। मन-बुद्धि में अन्तःकरण चतुष्टय का अन्तर्भाव है। मन के अन्तर्गत चित्त का और बुद्धि के अन्तर्गत अहंकार का अन्तर्भाव है। मन-बुद्धि भगवान में लगने से अहंकार का आधार स्वयं भगवान में लग जायगा और परिणामस्वरूप मैं भगवान का ही हूँ और भगवान ही मेरे हैं – ऐसा भाव हो जायगा। इस भाव से निर्विकल्प स्थिति होने से मैंपन भगवान में लीन हो जायगा। विशेष बात- साधारणतया अपना स्वरूप (मैंपन का आधार ‘स्वयम्’ ) मन , बुद्धि , शरीर आदि के साथ दिखता है पर वास्तव में इनके साथ है नहीं। सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि बचपन से लेकर अब तक शरीर , इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि आदि सब के सब बदल गये पर मैं वही हूँ। अतः मैं बदलने वाला नहीं हूँ – इस बात को आज से ही दृढ़तापूर्वक मान लेना चाहिये (साधारणतया मनुष्य बुद्धि से ही समझने की चेष्टा करता है पर यहाँ स्वयं से जानने की बात है )। विचार करें – एक ओर अपना स्वरूप नहीं बदला यह सभी का प्रत्यक्ष अनुभव है और आस्तिकों एवं भगवान में श्रद्धा रखने वालों के भगवान भी कभी नहीं बदले दूसरी ओर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि सब के सब बदल गये और संसार भी बदलता हुआ प्रत्यक्ष दिखता है। इससे सिद्ध हुआ कि कभी न बदलने वाले ‘स्वयम्’ और भगवान दोनों एक जाति के हैं जब कि निरन्तर बदलने वाले शरीर और संसार दोनों एक जाति के हैं। न बदलने वाले ‘स्वयम् ‘ और भगवान दोनों ही व्यक्तरूप से नहीं दिखते जब कि बदलने वाले शरीर और संसार – दोनों ही व्यक्तरूप से प्रत्यक्ष दिखते हैं। बदलने वाले मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ-शरीरादि को पकड़कर ही ‘स्वयम्’ अपने को बदलने वाला मान लेता है। वास्तव में अहं का जो सत्तारूप से आधार (स्वयम् ) है , वह कभी नहीं बदलता क्योंकि वह परमात्मा का अंशस्वरूप है। वास्तव में मैं क्या हूँ ? इसका तो पता नहीं पर मैं हूँ , इस होनेपन में थोड़ा भी सन्देह नहीं है। जैसे संसार प्रत्यक्ष दिखता है – ऐसे ही मैंपन का भी भान होता है। इसलिये तत्त्वतः मैं क्या है? इसकी खोज करना साधक के लिये बहुत उपयोगी है। मैं क्या है? इसका तो पता नहीं परन्तु संसार (शरीर ) क्या है? इसका तो पता है ही। संसार (शरीर ) उत्पत्ति-विनाश वाला है सदा एकरस रहने वाला नहीं है – यह सबका अनुभव है। इस अनुभव को निरन्तर जाग्रत रखना चाहिये। यह नियम है कि संसार और मैं – दोनों में से किसी एक का भी ठीक-ठीक ज्ञान होने पर दूसरे के स्वरूप का ज्ञान अपने आप हो जाता है। मैं का प्रकाशक और आधार (अपना स्वरूप) चेतन और नित्य है। इसलिये उत्पत्ति-विनाश वाले जड संसार से स्वरूप का कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वरूप का तो भगवान से स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध को पहचानना ही मैं की वास्तविकता का अनुभव करना है। इस सम्बन्ध को पहचान लेने पर मन-बुद्धि स्वतः भगवान में लग जायँगे (टिप्पणी प0 637)। ‘निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ‘ – यहाँ ‘अत ऊर्ध्वम्’ – पदों का भाव यह है कि जिस क्षण मन-बुद्धि भगवान्में पूरी तरह लग जायँगे अर्थात् मन-बुद्धि में किञ्चिन्मात्र भी अपनापन नहीं रहेगा उसी क्षण भगवत्प्राप्ति हो जायगी। ऐसा नहीं है कि मन-बुद्धि पूर्णतया लगने के बाद भगवत्प्राप्ति में काल का कोई व्यवधान रह जाय। भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! मुझमें ही मन-बुद्धि लगाने पर तू मुझमें निवास करेगा , इसमें संशय नहीं है। इससे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुन के हृदय में कुछ संशय है तभी भगवान ‘न संशयः’ पद देते हैं। यदि संशय की सम्भावना न होती तो इस पद को देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वह संशय क्या है मनुष्य के हृदय में प्रायः यह बात बैठी हुई है कि कर्म अच्छे होंगे , आचरण अच्छे होंगे , एकान्त में ध्यान लगायेंगे , तभी परमात्मा की प्राप्ति होगी और यदि इस प्रकार साधन नहीं कर पाये तो परमात्मप्राप्ति असम्भव है। इस भ्रम को दूर करने के लिये भगवान कहते हैं कि मेरी प्राप्ति का उद्देश्य रखकर मन-बुद्धि को मेरे में लगाना जितना कीमती है ये सब साधन मिलकर भी उतने कीमती नहीं हो सकते। अतः मन-बुद्धि को मेरे में लगाने से निश्चय ही मेरी प्राप्ति होगी इसमें कोई संशय नहीं है – ‘मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।’ (गीता 8। 7)। जब तक बुद्धि में संसार का महत्त्व है और मन से संसार का चिन्तन होता रहता है तब तक (परमात्मा में स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी ) अपनी स्थिति संसार में ही समझनी चाहिये। संसार में स्थिति अर्थात् संसार का सङ्ग रहने से ही संसार-चक्र में घूमना पड़ता है। उपर्युक्त पदों से अर्जुन का संशय दूर करते हुए भगवान कहते हैं कि तू यह चिन्ता मत कर कि मेरे में मन-बुद्धि सर्वथा लग जाने पर तेरी स्थिति कहाँ होगी ? जिस क्षण तेरे मन-बुद्धि एकमात्र मेरे में सर्वथा लग जायँगे उसी क्षण तू मेरे में ही निवास करेगा। मन-बुद्धि भगवान में लगाने के सिवाय साधक के लिये और कोई कर्तव्य नहीं है। मन भगवान में लगाने से संसार का चिन्तन नहीं होगा और बुद्धि भगवान में लगाने से साधक संसार के आश्रय से रहित हो जायगा। संसार का किसी प्रकार का चिन्तन और आश्रय न रहने से भगवान का ही चिन्तन और भगवान का ही आश्रय होगा जिससे भगवान की ही प्राप्ति होगी। यहाँ मन के साथ चित्त को तथा बुद्धि के साथ अहम् को भी ले लेना चाहिये क्योंकि भगवान में चित्त और अहम के लगे बिना तू मेरे में ही निवास करेगा यह कहना सार्थक नहीं होगा। सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र ईश्वर (परमात्मा ) का ही साक्षात् अंश यह जीवात्मा है परन्तु यह इस सृष्टि के एक तुच्छ अंश (शरीर , इन्द्रियों , मन , बुद्धि आदि ) को अपना मानकर इनको अपनी ओर खींचता है (गीता 15। 7) अर्थात् इनका स्वामी बन बैठता है। वह (जीवात्मा ) इस बात को सर्वथा भूल जाता है कि ये मन-बुद्धि आदि भी तो उसी परमात्मा की समष्टि सृष्टि के ही अंश हैं। मैं उसी परमात्मा का अंश हूँ और सर्वदा उसी में स्थित हूँ । इसको भूलकर वह अपनी अलग सत्ता मानने लगता है। जैसे एक करोड़पति का मूर्ख पुत्र उससे अलग होकर अपनी विशाल कोठी के एक-दो कमरों पर अपना अधिकार जमाकर अपनी उन्नति समझ लेता है पर जब उसे अपनी भूल समझ में आ जाती है तब उसे करोड़पति का उत्तराधिकारी होने में कठिनाई नहीं होती। इसी लक्ष्य से भगवान कहते हैं कि जब तू इन व्यष्टि मन-बुद्धि को मेरे अर्पण कर देगा (जो स्वतः ही मेरे हैं क्योंकि मैं ही समष्टि मन-बुद्धि का स्वामी हूँ ) तो स्वयं इनसे मुक्त होकर (वास्तव में पहले से ही मेरा अंश और मेरे में ही स्थित होने के कारण) निःसन्देह मेरे में ही निवास करेगा। भगवान ने सातवें अध्याय के चौथे श्लोक में पाँच महाभूत , मन , बुद्धि और अंहकार – इस प्रकार आठ भागों में विभक्त अपनी अपरा (जड ) प्रकृति का वर्णन किया और पाँचवें श्लोक में इससे भिन्न अपनी जीवभूता परा (चेतन ) प्रकृति का वर्णन किया। इन दोनों प्रकृतियों को भगवान ने अपनी कहा । अतः इन दोनों के स्वामी भगवान हैं। इन दोनों में जड प्रकृति का कार्य होने से अपरा प्रकृति तो निकृष्ट है और चेतन परमात्मा का अंश होने से परा प्रकृति श्रेष्ठ है (गीता 15। 7) परन्तु परा प्रकृति (जीव ) भूल से अपरा प्रकृति को अपनी तथा अपने लिये मानकर उससे बँध जाती है तथा जन्म-मरण के चक्र में पड़ जाती है (गीता 13। 21)। इसलिये भगवान इस श्लोक में यह कह रहे हैं कि मन-बुद्धि रूप अपरा प्रकृति से अपनापन हटाकर इनको मेरी ही मान ले जो वास्तव में मेरी ही है। इस प्रकार मन-बुद्धि को मेरे अर्पण करने से इनके साथ भूल से माना हुआ सम्बन्ध टूट जायगा और तेरे को मेरे साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्यसम्बन्ध का अनुभव हो जायगा। भगवत्प्राप्तिसम्बन्धी विशेष बात – भगवान की प्राप्ति किसी साधनविशेष से नहीं होती। कारण कि ध्यानादि साधन शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियों के आश्रय से होते हैं। शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ आदि प्रकृति के कार्य होने से जड वस्तुएँ हैं। जड पदार्थों के द्वारा चिन्मय भगवान खरीदे नहीं जा सकते क्योंकि प्रकृति के सम्पूर्ण पदार्थ मिलकर भी चिन्मय परमात्मा के समान कभी नहीं हो सकते। सांसारिक पदार्थ कर्म (पुरुषार्थ ) करने से ही प्राप्त होते हैं । अतः साधक भगवान की प्राप्ति को भी स्वाभाविक ही कर्मों से होने वाली मान लेता है। इसलिये भगवत्प्राप्ति के सम्बन्ध में भी वह यही सोचता है कि मेरे द्वारा किये जाने वाले साधन से ही भगवत्प्राप्ति होगी। मनु-शतरूपा , पार्वती आदि को तपस्या से ही अपने इष्ट की प्राप्ति हुई – इतिहास-पुराणादि में इस प्रकार की कथाएँ पढ़ने-सुनने से साधक के अन्तःकरण में ऐसी छाप पड़ जाती है कि साधन के द्वारा ही भगवान मिलते हैं और उसकी यह धारणा क्रमशः दृढ़ होती रहती है परन्तु साधन से ही भगवान मिलते हों – ऐसी बात वस्तुतः है नहीं। तपस्यादि साधनों से जहाँ भगवान की प्राप्ति हुई दिखती है वहाँ भी वह जड के साथ माने हुए सम्बन्ध का सर्वथा विच्छेद होने से ही हुई है न कि साधनों से। साधन की सार्थकता असाधन (जड के साथ माने हुए सम्बन्ध ) का त्याग करने में ही है। भगवान सबको सदा-सर्वदा स्वतः प्राप्त हैं ही किन्तु जड के साथ माने हुए सम्बन्ध का सर्वथा त्याग होने पर ही उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। इसलिये भगवत्प्राप्ति जडता के द्वारा नहीं बल्कि जडता के त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद ) से होती है। अतः जो साधक अपने साधन के बल से भगवत्प्राप्ति मानते हैं वे बड़ी भूल में हैं। साधन की सार्थकता केवल जडता का त्याग कराने में है – इस रहस्य को न समझकर साधन में ममता करने और उसका आश्रय लेने से साधक का जड के साथ सम्बन्ध बना रहता है। जब तक हृदय में जडता का किञ्चिन्मात्र भी आदर है तब तक भगवत्प्राप्ति कठिन है। इसलिये साधक को चाहिये कि वह साधन की सहायता से जडता के साथ सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर ले। एकमात्र भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से किये जाने वाले साधन से जडता का सम्बन्ध सुगमतापूर्वक छूट जाता है – स्वामी रामसुखदास जी