hari naam ki mahima

हरि नाम की महिमा | Hari naam ki mahima | Glory of Name of God | Bhagvannam ki mahima | भगवन्नाम की महिमा 

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hari naam ki mahima

 

परमात्मा अपने स्वरूप के यथार्थ ज्ञान से संसार बंधन के हेतु भूत पुण्य पाप रूप कर्म और उनसके कारण रूप अज्ञान सबको नष्ट कर देते हैं । इसीलिए वे पवित्रों मे पवित्र हैं ।

मोक्षदाता श्री हरि ध्यान करने वाले को सर्वदा रूप , आरोग्य , सम्पूर्ण पदार्थ और प्रासंगिक भोग भी दे देते हैं ।

जो अपना स्मरण किये जाने पर समस्त क्लेशों को दूर कर देते हैं और सब चिन्तनीयों को छोड़ कर उन अच्युत का ही चिंतन क्यों नहीं किया जाता ? 

 

 

स्नानादि समस्त कर्मों को करते हुए श्री नारायण देव का ध्यान करना चाहिए । यह भगवदस्मरण ही सम्पूर्ण दुष्कर्मों का प्रायश्चित है । इस विषय में श्रुति भी सहमत है ।

संसार रूप सर्प द्वारा डसे जाने से निश्चेष्ट हुए पुरुष के लिए एकमात्र औषधरूप ‘ कृष्ण ‘ इस मंत्र को सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है ।

अत्यंत पापी पुरुष भी एक पल के लिए भी अच्युत का ध्यान करने से बड़ा भारी तपस्वी और पापियों को भी पवित्र करने वाला हो जाता है ।

समस्त शास्त्रों का मंथन करने पर और उनका पुनः – पुनः विचार करने पर यही निश्चित होता है कि सर्वदा श्री नारायण का ध्यान करना चाहिए ।

आप लोगों को सर्वदा सत्व गुण संपन्न होकर एकमात्र श्री हरि का ही ध्यान करना चाहिए । आप सदा ॐ का जप और श्री केशव का ध्यान करें ।

उस परावर परमात्मा का दर्शन कर लेने पर जीव की अविद्या रूप ह्रदय ग्रंथि टूट जाती है । उसके सम्पूर्ण संशय नष्ट हो जाते हैं और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं ।

सुवर्ण आदि धातुओं को जिस प्रकार अग्नि पिघला देता है , उसी प्रकार जिसका भक्तियुक्त नाम संकीर्तन सम्पूर्ण पापों को विलीन करने वाला है ।

जिसके नाम का विवश होकर कीर्तन करने से भी मनुष्य तुरंत ही समस्त पापों से इस प्रकार छूट जाता है , जैसे सिंह से डरे हुए भेड़ियों से उसका शिकार ।

सत्ययुग में ध्यान से , त्रेता में यज्ञ अनुष्ठान से और द्वापर में भगवान के पूजन से मनुष्य जो कुछ प्राप्त करता है , वह कलयुग में श्री केशव का नाम संकीर्तन करने से ही पा लेता है ।

श्री हरि का यदि दुष्ट चित्त पुरुषों द्वारा भी स्मरण किया जाये तो वे उनके समस्त पापों को हर लेते हैं जैसे अनिच्छा से या अनजाने में भी यदि अग्नि का स्पर्श हो जाये अग्नि जला डालता है ।

जान कर अथवा बिना जाने किसी प्रकार भी किये हुए श्री वासुदेव के कीर्तन से जल में पड़े हुए नमक के समान समस्त पाप गल जाते हैं ।

जिसमें चित्त लगाने वाला नरक गामी नहीं होता , जिसके चिंतन में स्वर्गलोक भी विघ्नरूप है , जिसमें चित्त लग जाने पर ब्रह्मलोक भी तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अविनाशी प्रभु शुद्ध बुद्धिवाले पुरुषों के ह्रदय में स्थित हो कर उन्हें  मुक्ति प्रदान करता है । उस अच्युत का चिंतन करने से यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें क्या आश्चर्य है ?

अग्नि को शांत करने में जल और अन्धकार को दूर करने में सूर्य समर्थ है तथा कलियुग में पाप समूह की शांति का उपाय श्री हरि का नाम संकीर्तन है ।

श्री हरि का नाम ही , नाम ही , नाम ही मेरा जीवन है । इसके अतिरिक्त कलियुग में और कोई सहारा है ही नहीं , है ही नहीं , है ही नहीं ।

सर्व व्यापक विष्णु भगवान का स्तवन करने से मनुष्य निष्पाप हो जाता है । विष्णु भगवान् का नित्य प्रति पूजन करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ।

जिनके ह्रदय में समस्त मंगलों के स्थान भगवान् श्री हरि विराजते हैं उन्हें कभी किसी कार्य में कोई अमंगल प्राप्त नहीं होता ।

श्री जनार्दन भगवान् का सदा समाहित होकर चिंतन करना चाहिए । यही इसजीव की परम रक्षा है । भला जो भगवान् के आश्रित है उसे कौन कष्ट पहुंच सकता है ?

हजार बार गंगा स्नान करने से और करोड़ बार पुष्कर क्षेत्र में नहाने से जो पाप नष्ट होते हैं वे श्री हरि का स्मरण करने से ही नष्ट हो जाते हैं ।

जो पुरुष अविनाशी नारायणदेव का एक मुहूर्त में भी चिंतन करता है वह भी सिद्धि प्राप्त कर लेता है । फिर जो भगवत्परायण है उसकी तो बात ही क्या है ।

जितने भी तप और कर्मरूप प्रायश्चित हैं उन सबमें श्री कृष्ण का स्मरण करना ही सर्वश्रेष्ठ है ।

मनुष्यों को नरक की यातनाएं प्राप्त कराने वाले कलियुग के अति उग्र दोष जिनका एक बार स्मरण करने से भी लीन हो जाते हैं

श्री गोविन्द एक बार स्मरण किये जाने पर भी मनुष्यों के सैंकड़ों जन्मों में किये हुए पाप पुंज को इस प्रकार तुरंत ही भस्म कर देते हैं जैसे अग्नि रुई के ढेर को जला डालता है ।

जिस प्रकार ऊंची – ऊंची लपटों वाला अग्नि वायु के साथ मिल कर सूखी घास को जला डालता है उसी प्रकार चित्त में स्थित विष्णु भगवान योगियों के समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं .

बिना ध्यान के एक मुहूर्त निकल जाने पर भी लुटेरों से लुटे हुए व्यक्ति के समान अत्यंत विलाप करना चाहिए।

समस्त प्राणियों के प्रभु जगद्गुरु जनार्दन का निरंतर स्मरण करने से मनुष्य समस्त दुःखों को दूर कर देता है और जिन – जिन की इच्छा करता है उन सभी कार्यों को सिद्ध कर लेता है ।

इस प्रकार एकाग्रचित्त हो कर श्री मधुसूदन का स्मरण करते रहने से मनुष्य जन्म , मृत्यु और जरारूप ग्रहों से पूर्ण संसार सागर को पार कर लेगा ।

इस दोषपूर्ण कलियुग में भी विषयासक्त मनुष्य समस्त पापों को कर के भी श्री गोविन्द का चिंतन करने से पवित्र हो जाता है ।

जप , होम तथा अर्चना आदि में जिसका चित्त भगवान वासुदेव में लगा हुआ है उसके लिए इन्द्रत्व आदि फल विघ्न रूप ही हैं ।

तीनों लोकों के स्वामी , अनुपम प्रभाव शाली तथा तथा अनेक रूप से प्रकट होने वाले भगवान को सिर झुका कर थोड़ा सा प्रणाम करने से मनुष्य के हज़ारों महाकल्पों में , जन्म – जन्मान्तरों में किये हुए सम्पूर्ण पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं ।

श्री कृष्ण चंद्र को किया हुआ एक प्रणाम भी दस अश्वमेध यज्ञों के बराबर  , स्नान के समान पवित्र करने वाला है । उनमें भी दस अश्वमेध करने वाले का तो पुनर्जन्म होता है किन्तु कृष्ण को प्रणाम करने वाले का पुर्जन्म कभी नहीं होता ।

जिनका वर्ण अलसी के फूल के समान है उन पीताम्बरधारी श्री अच्युत भगवान् गोविन्द को जो प्रणाम करेंगें उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं है ।

भगवान चक्रपाणि को शठता या दम्भ से किया हुआ नमस्कार भी निस्संदेह संसार के स्थूल बंधनों को काटने वाला होता है ।

श्रुति , स्मृति , इतिहास और पुराणों के वचनो से यही बात सिद्ध होती है कि भगवान गोविन्द पवित्रों में पवित्र हैं ।

वह मंगलों का मंगल है , देवों का देव है क्योंकि वह प्रकाश आदि में सबसे बढ़ कर है । भूत प्राणियों का जो अव्यय नाशरहित पिता है अर्थात उत्पन्न करने वाला है। ऐसा जो देव है लोक में वही एकमात्र देव है ।

एक देव है जो सब प्राणियों में छिपा हुआ है , सर्वत्र व्याप्त है , सब जीवों का अनतरातमा है , कर्मों का अध्यक्ष है अर्थात कर्म विभाग का विभाग करने वाला है , सब भूतों का अधिष्ठान है तथा सबका साक्षी , सबको चेतना देने वाला , एकमात्र और निर्गुण है ।

जो सबसे पहले ब्रह्मा को रचता है और फिर उसे वेद प्रदान करता है , आत्मबुद्धि और आत्मज्ञान को प्रकाशित करने वाले उस देव की मैं मुमुक्षु शरण लेता हूँ ।

ऐसा श्वेताश्वर शाखा के मन्त्रोपनिषद में कहा गया है ।

छान्दोग्योपनिषद में कहा है – इस देवता ने इच्छा की । वह एक ही अद्वितीय था ।

 

 

hari naam mahima

 

प्र – जीवात्मा और परमात्मा में तो भेद है फिर एक ही देव कैसे हो सकता है ?

उ – श्रुतिया कहती हैं कि ऐसा मत कहो क्योंकि जीवात्मा को रचकर परमात्मा उसी में प्रविष्ट हो गया । वह इस शरीर में नख से लेकर शिका पर्यन्त अनुप्रविष्ट है । अविकारी परमात्मा का बुद्धि और उसकी वृत्तियों के साक्षी रूप से प्रवेश करे जाने के कारण जीवात्मा और परमात्मा में अभेद है । यदि कहें कि परमात्मा जीवात्मा में प्रविष्ट हुआ तो जीवात्मा और परमात्मा में परस्पर भेद हुआ क्योंकि एक का दूसरे में प्रवेश हुआ तो फिर जीव और परमात्मा में एकता कैसे हो सकती है ? तो ऐसा कहना ठीक नहीं , क्योंकि एक ही देव अनेक प्रकार से स्थित है । एक होने पर भी अनेक प्रकार से विचार किया जाता है । श्रुतियाँ कहती हैं कि तुम एक ही अर्थात तुम परमात्मा ही अनेकों में प्रविष्ट हो । इस प्रकार श्रुतियों द्वारा एक का ही अनेक प्रकार प्रवेश कहा जाता है । इसलिए प्रविष्ट हुओं में भेद नहीं है ।

कठोपनिषद में कहा है कि जिस प्रकार संसार में व्याप्त हुआ एक ही अग्नि पृथक – पृथक आकारों के संयोग से भिन्न – भिन्न रूपवाला होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा भिन्न – भिन्न रूपों के अनुरूप और उनके बाहर भी स्थित है । जैसे एक ही विश्वव्यापी वायु भिन्न – भिन्न रूपों के अनुसार तद्रूप हो गया । उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक ही भिन्न – भिन्न रूपों के संयोग से उनके अनुरूप है और उनसे बाहर भी सर्वत्र व्याप्त है । जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत का नेत्र सूर्य दर्शन जन्य वाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता , उसी प्रकार समस्त प्राणियों का एक अंतरात्मा परमेश्वर उन सबके दुःखों से लिप्त होता , क्योंकि वास्तव में वह शरीर से भिन्न है । समस्त भूतों का एक ही अंतरात्मा है , जो सबको वश में करनेवाला है और अपने एक ही रूप को नाना प्रकार का कर लेता है । अपने अंतःकरण में स्थित उस देव को धीर पुरुष देखते हैं , उन्हीं को नित्य सुख प्राप्त होता है औरों को नहीं । जो नित्यों का नित्य और चेतनों का चेतन है तथा जो अकेला ही अनेकों की कामनाओं को पूर्ण करता है , उसे जो धीर पुरुष अपने अंतःकरण में स्थित देखते हैं , उन्हें ही नित्यशान्ति प्राप्ति होती है , औरों को नहीं।

बृहदारण्यकोपनिषद में कहा है – आरम्भ में यह एकमात्र ब्रह्म ही था , अकेला होने वह भूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं । इसके अतिरिक्त और कोई दृष्टा नहीं है ।

ईशावास्य में कहा है कि वह एक है , चलता नहीं है , तथापि मन से अधिक वेग वाला है । एकत्व देखने वाले को फिर क्या शोक और मोह ?

श्रुति कहती है कि पहले यह एकमात्र आत्मा ही था और कोई चेष्टा करने वाली वस्तु नहीं थी। समस्त प्राणियों के भीतर जो पुरुष है वह मेरा आत्मा है – ऐसा जाने ।

ऋग्वेद का भी कथन है कि उस एक को ही ब्राह्मण लोग नाना प्रकार से कहते हैं । उस एक की ही नाना प्रकार से कल्पना करते हैं । वह एक ही देव पृथ्वी और स्वर्ग को रचता हुआ वह अकेला ही सम्पूर्ण लोकों को धारण किये हुए है । अनेक प्रकार से बढ़ाया हुआ अग्नि एक ही है ।

छान्दोग्य उपनिषद में भी कहा है – हे सौम्य ! पहले एकमात्र यह अद्वितीय सत ही था ।

श्री गीतोपनिषद में कहा है कि जो पुरुष एकत्व में स्थित हो कर सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझ परमात्मा को भजता है वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मुझ में ही बर्तता है । पंडितजन विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण में , गौ में , हाथी में , कुत्ते में और चांडाल में भी सामान दृष्टि रखने वाले होते हैं । हे अर्जुन ! मैं सम्पूर्ण भूतों के अंतःकरण में स्थित उनका आत्मा हूँ तथा मैं ही समस्त प्राणियों का आदि , मध्य और अंत भी हूँ ।

जिस समय भूतों के पृथक – पृथक भाव को एक परमात्मा के संकल्प में ही स्थित देखता है और उसी से सब भूतों का विस्तार हुआ जानता है उस समय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है । इसलिए सर्व धर्मों को त्यागकर केवल एक मेरी ही शरण को प्राप्त हो । मैं तुझको सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा , तू शोक मत कर ।

हरि वंश पुराण में कहा गया है कि -हे विप्रगण ! आप लोगों को सत्वगुण में स्थित हो कर सर्वदा एकमात्र श्री हरी का ही ध्यान करना चाहिए । आप सदा ओमकार का जप और श्री केशव का ध्यान करें । हे पुरुषोत्तम! निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओं में एक आप ही आश्चर्य रूप और धन्य हैं । हे महाबाहो ! संसार में आपके समान और कोई भी नहीं है।

जो कुछ मनु ने कहा है वह ओषधिरूप है । यह श्रुति मनु का माहात्म्य बताने वाली है । मनु जी कहते हैं कि समस्त भूतों में स्थित अपने आत्मा को और समस्त भूतों को अपने आत्मा में देखता हुआ आत्मयज्ञ करने वाला पुरुष स्वराज्य लाभ करता है ।

वह एक ही जनार्दन भगवान् संसार की रचना , स्थिति और संहार करने वाली ब्रह्मा , विष्णु और शिव रूप तीन संज्ञाओं को प्राप्त होता है ।

विज्ञान के सिवा और कोई वस्तु कभी कुछ भी नहीं है । यह एक विज्ञान ही अपने – अपने कर्मों के भेद से विभिन्न चित्तवालों को भिन्न – भिन्न प्रकार का प्रतीत हो रहा है । वह ज्ञान शुद्ध , निर्मल , शोक हीन और लोभादि सम्पूर्ण संगों से रहित है । वही एकमात्र सत श्रेष्ठ परमेश्वर है तथा वही वासुदेव है उस से पृथक और कुछ नहीं है ।

जब कि समस्त देह में एक ही पुरुष व्याप्त है , तब आप कौन हैं ? मैं अमुक हूँ ; यह कहना व्यर्थ है ।

जिस प्रकार दृष्टि दोष से एक ही आकाश श्वेत , नील आदि अनेकों भेद वाला दिखाई पड़ता है , उसी प्रकार भ्रांत दृष्टि पुरुषों को एक ही आत्मा अलग – अलग दिखाई पड़ता है । यहाँ जो कुछ है वह सब एक अच्युतभगवान ही है । उस के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । वही मैं हूँ । वही मैं हूँ ; वही तू है और वह आत्मस्वरूप ही यह सब कुछ है । भेद दृष्टि रूप मोह को छोड़ । उन जड़ भरत के इस प्रकार कहने पर उस परमार्थ दृष्टि वाले नृपश्रेष्ठ रहूगण ने भेद – भाव को त्याग दिया ।

यमराज ने अपने दूतों से कहा कि यह सम्पूर्ण संसार और मैं एकमात्र परम पुरुष वासुदेव ही हैं । जिनकी हृदयस्थ अनंत भगवान् में ऐसी दृढ भावना हो गयी है उन्हें तुम दूर से ही छोड़ कर निकल जाया करो ।

मैं , महादेव जी और आप सब भी नारायणस्वरूप ही हैं । जो उनकी विभूतियाँ हैं , उन्हीं की न्यूनता तथा अधिकता परस्पर बाध्य – बाधक रूप से रहती है ।

भगवन कृष्ण बलराम से कहते हैं कि हे विश्वात्मन ! आप और मैं दोनों इस संसार के एक ही कारण हैं । इस संसार के लिए हम दोनों भिन्न रूप से स्थित हैं ।

विष्णु पुराण में श्री कृष्ण चंद्र महादेव जी से कहते है कि जो अभय आपने दिया है वह सब मैंने भी दिया है । हे शंकर ! आप अपने को मुझसे पृथक न देखें । जो मैं हूँ वही आप और देवता , असुर तथा मनुष्यों के सहित यह सारा संसार है । जिन पुरुषों का चित्त अविद्या से मोहित हो रहा है वे ही भेद भाव देखने वाले होते हैं ।

भविष्योत्तर पुराण में श्री महादेव जी का वचन है कि जो लोग मुझे अथवा ब्रह्मा जी को विष्णु से अलग देखते हैं , वे कुतर्क बुद्धि मूढ़जन नीचे नरक में गिरकर दुःख भोगते हैं तथा जो दुष्टबुद्धि मूढ़लोग मुझे और ब्रह्माजी को श्री विष्णु से पृथक देखते हैं उन्हें उससे ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है ।

हरिवंश पुराण में कैलाश यात्रा के प्रसंग में महेश्वर का कथन है कि समस्त भावों के आदि , मध्य और अंत आप ही हैं । यह सम्पूर्ण विश्व आप ही से हुआ है और आप ही में लीन होता है ।

हे जनार्दन ! हे सर्वव्यापक देव ! मैं ही तू है और तू ही मैं हूँ । सम्पूर्ण त्रिलोकी में हम दोनों का शब्द से या अर्थ से किसी प्रकार भी भेद नहीं है ।

हे गोविन्द ! संसार में जो – जो आपके महान नाम हैं , वे ही मेरे भी हैं । इसमें कोई विचार करने की बात ही नहीं है । हे गोपते ! हे जगन्नाथ ! जो आपकी उपासना है वही मेरी हो । हे देव ! जो आपसे द्वेष करता है , इसमें संदेह नहीं , वह मुझसे भी द्वेष करता है । हे देव ! क्योंकि मैं भूतपति भी आप ही का विस्तार हूँ । इसलिए हे सर्व व्यापक देव ! ऐसी कहीं कोई वस्तु नहीं है जो आपसे रहित हो । जो कुछ था , जो कुछ है और जो कुछ है और जो कुछ होगा । हे जगत्पते ! हे देवेश्वर ! वह सब आप ही हैं , आप के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।

ये सब वाक्य एकत्व का प्रतिपादन करने वाले हैं ।

 जो सबका प्रकाशक , परम अर्थात उत्तम और महान – बृहत् चिन्मय प्रकाश है । जिसके विषय में ‘ जिस तेज से प्रकाशित होकर सूर्य तप्त है ‘ उसे देवगण ज्योति कहते हैं ‘ वहां न सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और न चन्द्रमा या तारों का प्रकाश – श्रुतियों तथा स्मृतियों से यही प्रमाणित होता है ।

जो परम तप अर्थात तपने वाला यानि आज्ञा देने वाला है । जो इस लोक को , परलोक को तथा समस्त प्राणियों को उनके भीतर स्थित हो कर शासित करता है । इस श्रुति के द्वारा अंतर्यामी ब्राह्मण में उसको सबका नियामक कहा गया है ।

तैत्तरीय श्रुति में भी कहा गया है कि इसी के भय से वायु चलता है , इसी के भय से सूर्य उदित होता है तथा इसी के भय से अग्नि , इंदरा और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ।

तप्त है अथवा शासन करता है इसलिए वह तप है । उसका ऐश्वर्य अपरिमित है इस कारण वह महान है । श्रुति भी कहती है कि वह सर्वेश्वर है ।

जो सत्यादि लक्षणों वाला परब्रह्म तथा महत्ता युक्त होने के कारण महान है और जो पुनरावृत्ति कि शंका से रहित परम , श्रेष्ठ परायण या आश्रय है ।

जो देव परम तेज अर्थात सूर्य आदि तेज से भी तेज , परम तप , परम ब्रह्म और परम परायण है वही समस्त प्राणियों कि परम गति है ।

स्तुति रूप अर्चन की अधिक मान्यता का कारण क्या है ? इसका उत्तर है- हिंसा आदि पाप कर्म का अभाव तथा अन्य पुरुष एवं द्रव्य , देश और काल आदि के नियम की अनावश्यकता ही इसकी अधिक मान्यता का कारण है । अर्थात नाम जप और भगवान की पूजा अर्चना स्तुति जप के लिए किसी भी प्रकार के नियमों की आवश्यकता नहीं है , भक्त अपनी श्रद्धा , भक्ति और प्रेम के अनुसार प्रभु की अर्चना पूजा नाम जप कर सकता है । न ही इसमें किसी प्रकार की हिंसा या जीव बलि आदि की आवश्यकता है न ही कठोर नियमों के पालन की ।

विष्णुपुराण में कहा है कि सत्ययुग में ध्यान से , त्रेता में यज्ञ और अनुष्ठान से , द्वापर में पूजा करने से मनुष्य जो कुछ पाता था वह कलियुग में भगवन कृष्ण का नाम संकीर्तन करने से ही पा लेता है ।

मनु जी का कहना है कि इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मण अन्य कर्म करे या न करे वह केवल जप से ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है । अतः ब्राह्मण ‘ मित्र ‘ अर्थात सबका मित्र कहलाता है । 

महाभारत में कहा गया है कि सम्पूर्ण धर्मों में जप सर्व श्रेष्ठ धर्म कहा जाता है क्योंकि जप यज्ञ प्राणियों कि हिंसा किये बिना ही संपन्न हो जाता है । 

भगवान का भी गीता में वचन है कि यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ ।

इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही भीष्म जी ने यह कहा है कि समस्त धर्मों में यही धर्म सबसे अधिक मान्य है ।

 

 

 

 

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