BhaktiYog ~ Bhagwat Geeta Chapter 12 | भक्तियोग ~ अध्याय बारह
अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग
01 – 12 साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय
अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥12.9॥
अथ-यदि,; चित्तम्-मन; समाधातुम् – स्थिर करना; न – नहीं; शक्नोषि-तुम समर्थ नहीं हो; मयि-मुझ पर; स्थिरम्-स्थिर भाव से; अभ्यासयोगेन-बार बार अभ्यास द्वारा भगवान में एकीकृत होना; ततः-तब; माम् – मेरा; इच्छ-इच्छा; आप्तुम् – प्राप्त करने की; धनञ्जय -धन और वैभव का स्वामी अर्जुन।
हे धनञ्जय ! यदि तुम दृढ़ता से – अचल भाव से मुझ पर अपना मन स्थिर करने में – मुझे अपना मन समर्पित करने में असमर्थ हो तो सांसारिक कार्यकलापों से मन को विरक्त कर भक्ति भाव से निरंतर मेरा स्मरण करने का अभ्यास करो अर्थात अभ्यास योग भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाओं के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए अर्थात मेरी प्राप्ति की इच्छा कर – प्रयत्न कर ॥12.9॥
( भगवत्प्राप्ति के लिए भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएं बारंबार करने का नाम ‘अभ्यास’ है । )
अथ चित्तं समाधातुं ৷৷. मामिच्छाप्तुं धनञ्जय – यहाँ ‘चित्तम्’ पद का अर्थ मन है परन्तु इस श्लोक का पीछे के श्लोक में वर्णित साधन से सम्बन्ध है इसलिये ‘चित्तम् ‘ पद से यहाँ मन और बुद्धि दोनों ही लेना युक्तिसंगत है।भगवान अर्जुन से कहते हैं कि अगर तू मन-बुद्धि को मेरे में अचल भाव से स्थापित करने में अर्थात् मेरे अर्पण करने में अपने को असमर्थ मानता है तो अभ्यासयोग के द्वारा मेरे को प्राप्त करने की इच्छा कर। अभ्यास और अभ्यासयोग पृथक – पृथक हैं। किसी लक्ष्य पर चित्त को बार-बार लगाने का नाम अभ्यास है और समता का नाम योग है। समता रखते हुए अभ्यास करना ही अभ्यासयोग कहलाता है। केवल भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से किया गया भजन , नाम-जप आदि अभ्यासयोग है। अभ्यास के साथ योग का संयोग न होने से साधक का उद्देश्य संसार ही रहेगा। संसार का उद्देश्य होने पर स्त्री-पुत्र , धन-सम्पत्ति , मान-बड़ाई , नीरोगता , अनूकूलता आदि की अनेक कामनाएँ उत्पन्न होंगी। कामना वाले पुरुष की क्रियाओं के उद्देश्य भी (कभी पुत्र , कभी धन , कभी मान-बड़ाई आदि ) भिन्न-भिन्न रहेंगे (गीता 2। 41)। इसलिये ऐसे पुरुष की क्रिया में योग नहीं होगा। योग तभी होगा जब क्रियामात्र का उद्देश्य (ध्येय ) केवल परमात्मा ही हो। साधक जब भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य रखकर बार-बार नाम जप आदि करने की चेष्टा करता है तब उसके मन में दूसरे अनेक संकल्प भी पैदा होते रहते हैं । अतः साधक को मेरा ध्येय भगवत्प्राप्ति ही है – इस प्रकार की दृढ़ धारणा करके अन्य सब संकल्पों से उपराम हो जाना चाहिये। ‘मामिच्छाप्तुम् ‘ पदों से भगवान् अभ्यासयोग को अपनी प्राप्ति का स्वतन्त्र साधन बताते हैं। पीछे के श्लोक में भगवान ने अपने में मन-बुद्धि अर्पण करने के लिये कहा। अब इस श्लोक में अभ्यासयोग के लिये कहते हैं। इससे यह धारणा हो सकती है कि अभ्यासयोग भगवान में मन-बुद्धि अर्पण करने का साधन है । अतः पहले अभ्यास के द्वारा मन-बुद्धि भगवान के अर्पण होंगे फिर भगवान की प्राप्ति होगी परन्तु मन-बुद्धि को अर्पण करने से ही भगवत्प्राप्ति होती हो – ऐसा नियम नहीं है। भगवान के कथन का तात्पर्य यह है कि यदि उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही हो अर्थात् उद्देश्य के साथ साधक की पूर्ण एकता हो तो केवल अभ्यास से ही उसे भगवत्प्राप्ति हो जायगी। जब साधक भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से बार-बार नामजप , भजन-कीर्तन , श्रवण आदि का अभ्यास करता है तब उसका अन्तःकरण शुद्ध होने लगता है और भगवत्प्राप्ति की इच्छा जाग्रत् हो जाती है। सांसारिक सिद्ध-असिद्धि में सम होने पर भगवत्प्राप्ति की इच्छा तीव्र हो जाती है। भगवत्प्राप्ति की तीव्र इच्छा होने पर भगवान से मिलने के लिये व्याकुलता पैदा हो जाती है। यह व्याकुलता उसकी अवशिष्ट सांसारिक आसक्ति एवं अनन्त जन्मों के पापों को जला डालती है। सांसारिक आसक्ति तथा पापों का नाश होने पर उसका एकमात्र भगवान में ही अनन्य प्रेम हो जाता है और वह भगवान में वियोग को सहन नहीं कर पाता। जब भक्त भगवान के बिना नहीं रह सकता तब भगवान भी उस भक्त के बिना नहीं रह सकते अर्थात् भगवान भी उसके वियोग को नहीं सह सकते और उस भक्त को मिल जाते हैं। साधक को भगवत्प्राप्ति में देरी होने का कारण यही है कि वह भगवान के वियोग को सहन कर रहा है। यदि उसको भगवान का वियोग असह्य हो जाय तो भगवान के मिलने में देरी नहीं होगी। भगवान की देश , काल , वस्तु , व्यक्ति आदि से दूरी है ही नहीं। जहाँ साधक है वहाँ भगवान हैं ही। भक्त में उत्कण्ठा की कमी के कारण ही भगवत्प्राप्ति में देरी होती है। सांसारिक सुखभोग की इच्छा के कारण ही ऐसी आशा कर ली जाती है कि भगवत्प्राप्ति भविष्य में होगी। जब भगवत्प्राप्ति के लिये व्याकुलता और तीव्र उत्कण्ठा होगी तब सुखभोग की इच्छा का स्वतः नाश हो जायगा और वर्तमान में ही भगवत्प्राप्ति हो जायगी। साधक का यदि आरम्भ से ही यह दृढ़ निश्चय हो कि मेरे को तो केवल भगवत्प्राप्ति ही करनी है (चाहे लौकिक दृष्टि से कुछ भी बने या बिगड़े) तो कर्मयोग , ज्ञानयोग या भक्तियोग – किसी भी मार्ग से उसे बहुत जल्दी भगवत्प्राप्ति हो सकती है।