कर्मयोग ~ अध्याय तीन
09-16 यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता तथा यज्ञ की महिमा का वर्णन
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥3 .9॥
यज्ञ-अर्थात-यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्म; कर्मणः-कर्म के अतिरिक्त ; अन्यत्र-अन्यथा, दूसरे ; लोक:-भौतिक संसार; अयम्-यह; कर्मबन्धनः-किसी के कर्मों के बन्धन; तत्-वह; अर्थम्-के लिए; कर्म-कर्म; कौन्तेय-कुन्तिपुत्र, अर्जुन; मुक्तसङ्गगः-आसक्ति रहित; समाचर-ध्यान से कार्य करना।
परमात्मा के लिए यज्ञ या कर्त्तव्य पालन के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त दूसरे ही कर्मों में लगा हुआ यह मुनष्य कर्मों से बँधता है और इस प्रकार के कर्म भौतिक संसार में बंधन का कारण बनते हैं। इसलिए हे कुन्ति पुत्र! भगवान के सुख के लिए और फल की आसक्ति के बिना अर्थात आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञ के लिये ही अपने नियत कर्तव्य-कर्म करो ।।3.9।।
( “यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र ” गीता के अनुसार कर्तव्यमात्र का नामयज्ञ है। यज्ञ शब्द के अन्तर्गत यज्ञ , दान , तप , होम , तीर्थसेवन , व्रत, वेदाध्ययन आदि समस्त शारीरिक , व्यावहारिक और पारमार्थिक क्रियाएँ आ जाती हैं। कर्तव्य मानकर किये जाने वाले व्यापार , नौकरी , अध्ययन , अध्यापन आदि सब शास्त्रविहित कर्मों का नाम भी यज्ञ है। दूसरों को सुख पहुँचाने तथा उनका हित करने के लिये जो भी कर्म किये जाते हैं वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। यज्ञार्थ कर्म करने से आसक्ति बहुत जल्दी मिट जाती है तथा कर्मयोगी के सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (गीता 4। 23) अर्थात् वे कर्म स्वयं तो बन्धनकारक होते नहीं बल्कि पूर्वसंचित कर्मसमूह को भी समाप्त कर देते हैं। वास्तव में मनुष्य की स्थिति उसके उद्दश्य के अनुसार होती है , क्रिया के अनुसार नहीं। जैसे व्यापारी का प्रधान उद्देश्य धन कमाना रहता है अतः वास्तव में उसकी स्थिति धन में ही रहती है और दुकान बंद करते ही उसकी वृत्ति धन की तरफ चली जाती है। ऐसे ही यज्ञार्थ कर्म करते समय कर्मयोगी की स्थिति अपने उद्देश्य परमात्मा में ही रहती है और कर्म समाप्त करते ही उसकी वृत्ति परमात्मा की तरफ चली जाती है। सभी वर्णों के लिये अलग-अलग कर्म हैं। एक वर्ण के लिये कोई कर्म स्वधर्म है तो वही दूसरे वर्णों के लिये (विहित न होनेसे) परधर्म अर्थात् अन्यत्र कर्म हो जाता है जैसे भिक्षा से जीवननिर्वाह करना ब्राह्मण के लिये तो स्वधर्म है पर क्षत्रिय के लिये परधर्म है। इसी प्रकार निष्कामभाव से कर्तव्यकर्म करना मनुष्य का स्वधर्म है और सकाम भाव से कर्म करना परधर्म है। जितने भी सकाम और निषिद्ध कर्म हैं वे सब के सब अन्यत्रकर्म की श्रेणी में ही हैं। अपने सुख , मान , बड़ाई , आराम आदि के लिये जितने कर्म किये जायँ वे सब के सब भी अन्यत्रकर्म हैं । अतः छोटा से छोटा तथा बड़ा से़ बड़ा जो भी कर्म किया जाय उसमें साधक को सावधान रहना चाहिये कि कहीं किसी स्वार्थ की भावना से तो कर्म नहीं हो रहा है । साधक उसी को कहते हैं जो निरन्तर सावधान रहता है। इसलिये साधक को अपनी साधना के प्रति सतर्क , जागरूक रहना ही चाहिये। अन्यत्रकर्म के विषय में दो गुप्त भाव (1) किसी के आने पर यदि कोई मनुष्य उसके प्रति आइये बैठिये आदि आदरसूचक शब्दों का प्रयोग करता है पर भीतर से अपने में सज्जनता का आरोप करता है अथवा ऐसा कहने से आने वाले व्यक्ति पर मेरा अच्छा असर पड़ेगा इस भाव से कहता है तो इसमें स्वार्थ की भावना छिपी रहने से यह अन्यत्रकर्म ही है ।यज्ञार्थ कर्म नहीं। (2) सत्सङ्ग सभा आदि में कोई व्यक्ति मन में इस भाव को रखते हुए प्रश्न करता है कि वक्ता और श्रोतागण मुझे अच्छा जानकार समझेंगे तथा उन पर मेरा अच्छा असर पड़ेगा तो यह अन्यत्रकर्म ही है यज्ञार्थ कर्म नहीं। तात्पर्य यह है कि साधक कर्म तो करे पर उसमें स्वार्थ , कामना आदि का भाव नहीं रहना चाहिये। कर्म का निषेध नहीं है बल्कि सकामभाव का निषेध है। साधक को भोग और ऐश्वर्यबुद्धि से कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसी बुद्धि में भोग आसक्ति और कामना रहती है जिससे कर्मयोग का आचरण नहीं हो पाता। निर्वाह बुद्धि से कर्म करने पर भी जीने की कामना बनी रहती है। अतः निर्वाह बुद्धि भी त्याज्य है। साधक को केवल साधन-बुद्धि से ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। सबसे उत्तम साधक तो वह है जो अपनी मुक्ति के लिये भी कोई कर्म न करके केवल दूसरों के हित के लिये कर्म करता है। कारण कि अपना हित दूसरों के लिये कर्म करने से होता है अपने लिये कर्म करने से नहीं। दूसरों के हित में ही अपना हित है। दूसरों के हित से अपना हित अलग-अलग मानना ही गलती है। इसलिये लौकिक तथा शास्त्रीय जो कर्म किये जायँ वे सबके सब केवल लोकहितार्थ होने चाहिये। अपने सुख के लिये किया गया कर्म तो बन्धनकारक है ही , अपने व्यक्तिगत हित के लिये किया गया कर्म भी बन्धनकारक है। केवल अपने हित की तरफ दृष्टि रखने से व्यक्तित्व बना रहता है। इसलिये और तो क्या जप चिन्तन ध्यान समाधि भी केवल लोकहित के लिये ही करे। तात्पर्य यह कि स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों से होने वाली मात्र क्रिया संसार के लिये ही हो अपने लिये नहीं। कर्म संसार के लिए है और संसार से सम्बन्ध-विच्छेद होने पर परमात्मा के साथ योग अपने लिये है। इसी का नाम है कर्मयोग। “लोकोऽयं कर्मबन्धनः ” कर्तव्यकर्म (यज्ञ) करने का अधिकार मुख्य रूप से मनुष्य को ही है। इसका वर्णन भगवान ने आगे सृष्टिचक्र के प्रसङ्ग (3। 14 16) में भी किया है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्रका हित करना उनको सुख पहुँचाना होता है उसीके द्वारा कर्तव्यकर्म हुआ करते हैं। जब मनुष्य दूसरों के हितके लिये कर्म न करके केवल अपने सुख के लिये कर्म करता है तब वह बँध जाता है।आसक्ति और स्वार्थभाव से कर्म करना ही बन्धनका कारण है। आसक्ति और स्वार्थ के न रहने पर स्वतः सबके हितके लिये कर्म होते हैं। बन्धन भाव से होता है क्रिया से नहीं। मनुष्य कर्मों से नहीं बँधता बल्कि कर्मों में वह जो आसक्ति और स्वार्थभाव रखता है उनसे ही वह बँधता है। “तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर यहाँ मुक्तसङ्गः ” पद से भगवान का यह तात्पर्य है कि कर्मों में पदार्थों में तथा जिनसे कर्म किये जाते हैं उन शरीर , मन , बुद्धि आदि सामग्री में ममता , आसक्ति होने से ही बन्धन होता है। ममता , आसक्ति रहने से कर्तव्यकर्म भी स्वाभाविक एवं भली-भाँति नहीं होते। ममता-आसक्ति न रहने से परहित के लिये कर्तव्यकर्म का स्वतः आचरण होता है और यदि कर्तव्यकर्म प्राप्त न हो तो स्वतः निर्विकल्पता में , स्वरूप में स्थिति होती है। परिणामस्वरूप साधन निरन्तर होता है ओर असाधन कभी होता ही नहीं। आलस्य और प्रमाद के कारण नियत कर्म का त्याग करना तामस त्याग कहलाता है (गीता 18। 7) जिसका फल मूढ़ता अर्थात् मूढ़योनियों की प्राप्ति है – “अज्ञानं तमसः फलम् ” (गीता 14। 16)। कर्मों को दुःखरूप समझ कर उनका त्याग करना राजस त्याग कहलाता है (गीता 18। 8) जिसका फल दुःखों की प्राप्ति है – रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुन को कर्मों का त्याग करने के लिये नहीं कहते बल्कि स्वार्थ , ममता , फलासक्ति , कामना , वासना , पक्षपात आदि से रहित होकर शास्त्रविधि के अनुसार सुचारुरूप से उत्साहपूर्वक कर्तव्यकर्मों को करने की आज्ञा देते हैं जो सात्त्विक त्याग कहलाता है (गीता 18। 9)। स्वयं भगवान् भी आगे चलकर कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी करना शेष नहीं है फिर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (3। 2223)।कर्तव्यकर्मों का अच्छी तरह आचरण करने में दो कारणों से शिथिलता आती है (1) मनुष्य का स्वभाव है कि वह पहले फल की कामना कर के ही कर्म में प्रवृत्त होता है। जब वह देखता है कि कर्मयोग के अनुसार फल की कामना नहीं रखनी है तब वह विचार करता है कि कर्म ही क्यों करूँ ? (2) कर्म आरम्भ करने के बाद जब अन्त में उसे पता लग जाय कि इसका फल विपरीत होगा तब वह विचार करता है कि मैं कर्म तो अच्छा से अच्छा करूँ पर फल विपरीत मिले तो फिर कर्म करूँ ही क्यों ? कर्मयोगी न तो कोई कामना करता है और न कोई नाशवान फल ही चाहता है वह तो मात्र संसार का हित सामने रखकर ही कर्तव्यकर्म करता है। अतः उपर्युक्त दोनों कारणों से उसके कर्तव्यकर्म में शिथिलता नहीं आ सकती। मनुष्य का प्रायः ऐसा स्वभाव हो गया है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखायी देता है उसी कर्म को वह बड़ी तत्परता से करता है परन्तु वही कर्म उसके लिये बन्धनकारक हो जाता है। अतः इस बन्धन से छूटने के लिये उसे कर्मयोग के अनुसार आचरण करने की बड़ी आवश्यकता है। कर्मयोग में सभी कर्म केवल दूसरों के लिये किये जाते हैं अपने लिये कदापि नहीं। दूसरे कौन कौन हैं ? इसे समझना भी बहुत जरूरी है। अपने शरीर के सिवाय दूसरे प्राणीपदार्थ तो दूसरे हैं ही पर ये अपने कहलाने वाले स्थूलशरीर , सूक्ष्मशरीर (इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि , प्राण) और कारणशरीर (जिसमें माना हुआ अहम् है) भी स्वयं से दूसरे ही हैं । कारण कि स्वयं (जीवात्मा) चेतन परमात्मा का अंश है और ये शरीर आदि पदार्थ जड प्रकृति के अंश है। समस्त क्रियाएँ जड में और जड के लिये ही होती हैं। चेतन में और चेतन के लिये कभी कोई क्रिया नहीं होती। अतः करना अपने लिये है ही नहीं , कभी हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं। हाँ , संसार से मिले हुए इन शरीर आदि जड पदार्थों को चेतन जितने अंश में मैं , मेरा और मेरे लिये मान लेता है उतने अंश में उसका स्वभाव अपने लिये करने का हो जाता है। अतः दूसरों के लिये कर्म करने से ममता-आसक्ति सुगमता से मिट जाती है।शरीर की अवस्थाएँ ( बचपन , जवानी आदि ) बदलने पर भी मैं वही हूँ इस रूप में अपनी एक निरन्तर रहने वाली सत्ता का प्राणिमात्र को अनुभव होता है। इस अपरिवर्तनशील सत्ता (अपने होनेपन) की परमात्मतत्त्व के साथ स्वतः एकता है और परिवर्तनशील शरीर , इन्द्रियाँ मन , बुद्धि आदि की संसार के साथ स्वतः एकता है। हमारे द्वारा जो भी क्रिया की जाती है वह शरीर , इन्द्रियों आदि के द्वारा ही की जाती है क्योंकि क्रियामात्र का सम्बन्ध प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थों के साथ है स्वयं (अपने स्वरूप) के साथ नहीं। इसलिये शरीर के सम्बन्ध के बिना हम कोई भी क्रिया नहीं कर सकते। इससे यह बात निश्चितरूप से सिद्ध होती है कि हमें अपने लिये कुछ भी नहीं करना है जो कुछ करना है संसार के लिये ही करना है। कारण कि करना उसी पर लागू होता है जो स्वयं कर सकता है। जो स्वयं कुछ कर ही नहीं सकता उसके लिये करने का विधान है ही नहीं। जो कुछ किया जाता है संसार की सहायता से ही किया जाता है। अतः करना संसार के लिये ही है। अपने लिये करने से ही मनुष्य कर्मों से बँधता है ” यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयं कर्मबन्धनः” । विनाशी और परिवर्तनशील शरीर , इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि आदि के साथ अपने अविनाशी और अपरिवर्तनशील स्वरूप का कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिये अपना और अपने लिये कुछ भी नहीं है। शरीरादि की सहायता के बिना हम कुछ नहीं कर सकते इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। अपने सत्स्वरूप में कभी कोई कमी नहीं आती और कमी आये बिना कोई इच्छा नहीं होती इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये। इस प्रकार जब क्रिया और पदार्थ से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (जो वास्तव में है) तब यदि ज्ञान के संस्कार हैं तो स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है और यदि भक्ति के संस्कार हैं तो भगवान में प्रेम हो जाता है। पूर्वश्लोक में भगवान ने कहा कि यज्ञ (कर्तव्यकर्म) के अतिरिक्त कर्म बन्धनकारक होते हैं। अतः इस बन्धन से मुक्त होने के लिये कर्मों का स्वरूप से त्याग न करके कर्तव्यबुद्धि से कर्म करना आवश्यक है। अब कर्मों की अवश्यकर्तव्यता को पुष्ट करने के लिये और भी कारण बताते हैं – स्वामी रामसुखदास जी )