कर्मयोग ~ अध्याय तीन
01-08 ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता
न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥3 .4।।
न-नहीं; कर्मणाम् – कर्मों के; अनारम्भात्-विमुख रहकर; नैष्कर्म्यम्-कर्मफलों से मुक्ति; पुरुषः-मनुष्य; अष्नुते–प्राप्त करता है; न-नहीं; च-और; संन्यसनात्-त्याग से; एव-केवल; सिद्धिम्- सफलता; समधि गच्छति–पा लेता है।
न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकता है और न केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान में सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है अर्थात मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम ‘निष्कर्मता’ है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है॥4॥
( ” न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ” कर्मयोग में कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभाव से कर्म करने पर ही कर्मयोग की सिद्धि होती है । यह सिद्धि मनुष्य को कर्म किये बिना नहीं मिल सकती। मनुष्य के अन्तःकरण में कर्म करने का जो वेग विद्यमान रहता है उसे शान्त करने के लिये , कामना का त्याग करके कर्तव्यकर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करने पर यह वेग मिटता नहीं बल्कि बढ़ता है। ” नैष्कर्म्यम् अश्नुते ” पदों का आशय है कि कर्मयोग का आचरण करने वाला मनुष्य कर्मों को करते हुए ही निष्कर्मता को प्राप्त होता है। जिस स्थिति में मनुष्य के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते उस स्थिति को निष्कर्मता कहते हैं। कामना से रहित होकर किये गये कर्मों में फल देने की शक्ति का उसी प्रकार सर्वथा अभाव हो जाता है जिस प्रकार बीज को भूनने या उबालने पर उसमें पुनः अंकुर देने की शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है। अतः निष्काम मनुष्य के कर्मों में पुनः जन्म-मरण के चक्र में घुमाने की शक्ति नहीं रहती। कामना का त्याग तभी हो सकता है जब सभी कर्म दूसरों की सेवा के लिये किये जायँ अपने लिये नहीं। कारण कि कर्ममात्र का सम्बन्ध संसार से है और अपना (स्वरूप का) सम्बन्ध परमात्मा से है। अपने साथ कर्म का सम्बन्ध है ही नहीं। इसलिये जब तक अपने लिये कर्म करेंगे तब तक कामना का त्याग नहीं होगा और जब तक कामना का त्याग नहीं होगा तब तक निष्कर्मता की प्राप्ति नहीं होगी। “न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति” इस श्लोक के पूर्वार्ध में भगवान ने कर्मयोग की दृष्टि से कहा कि कर्मों का आरम्भ किये बिना कर्मयोगी को निष्कर्मता की प्राप्ति नहीं होती। अब श्लोक के उत्तरार्ध में सांख्ययोग की दृष्टि से कहते हैं कि केवल कर्मों का स्वरूप से त्याग कर देने से सांख्ययोगी को सिद्धि अर्थात् निष्कर्मता की प्राप्ति नहीं होती। सिद्धि की प्राप्ति के लिये उसे कर्तापन (अहंता) का त्याग करना आवश्यक है। अतः सांख्ययोगी के लिये कर्मों का स्वरूप से त्याग करना मुख्य नहीं है बल्कि अहंता का त्याग ही मुख्य है। सांख्ययोग में कर्म किये भी जा सकते हैं और किसी सीमा तक कर्मों का त्याग भी किया जा सकता है परन्तु कर्मयोग में सिद्धि प्राप्ति के लिये कर्म करना आवश्यक होता है (गीता 6। 3)। श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य को व्यवहार में परमार्थ सिद्धि की कला सिखाती है। उसका आशय कर्तव्य-कर्म कराने में है छुड़ाने में नहीं। इसलिये भगवान् कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों ही साधनों में कर्म करने की बात कहते हैं। यह एक स्वाभाविक बात है कि जब साधक अपना कल्याण चाहता है तब वह सांसारिक कर्मों से उकताने लगता है और उन्हें छोड़ना चाहता है। इसी कारण अर्जुन भी कर्मों से उकताकर भगवान से पूछते हैं कि जब कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों प्रकार के साधनों का तात्पर्य समता से है तो फिर कर्म करने की बात आप क्यों कहते हैं ? मुझे युद्ध जैसे घोर कर्म में क्यों लगाते हैं ? परन्तु भगवान ने दोनों ही प्रकार के साधनों में अर्जुन को कर्म करने की आज्ञा दी है , जैसे कर्मयोग में ” योगस्थः कुरु कर्माणि” (गीता 2। 48) और सांख्ययोग में “तस्माद्युध्यस्व भारत” (गीता 2। 18)। इससे सिद्ध होता है कि भगवान का अभिप्राय कर्मों को स्वरूप से छुड़ाने में नहीं बल्कि कर्म कराने में है। हाँ भगवान् , कर्मों में जो जहरीला अंश कामना , ममता और आसक्ति है उसका त्याग करके ही कर्म करने की आज्ञा देते हैं। कर्मों का स्वरूप से त्याग करने की अपेक्षा साधक को उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये। कर्मयोगी निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हुए शरीर , इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि , पदार्थ आदि को संसार की वस्तु मानकर संसार की सेवा में लगाता है और कर्मों तथा पदार्थों के साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता (गीता 5। 11)। ज्ञानयोग में सत असत की , विवेक की प्रधानता रहती है। अतएव ज्ञानयोगी ऐसा मानता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं अर्थात् शरीर , इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि आदि से ही कर्म हो रहे हैं। मेरा कर्मों के साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है (गीता 3। 28 5। 89)। प्रायः सभी साधकों के अनुभव की बात है कि कल्याण की उत्कट अभिलाषा जाग्रत् होते ही कर्म पदार्थ और व्यक्ति (परिवार) से उनकी अरुचि होने लगती है परन्तु वास्तव में देह के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने से यह आराम-विश्राम की इच्छा ही है जो साधक की उन्नति में बाधक है। साधकों के मन में ऐसा भाव रहता कि कर्म , पदार्थ और व्यक्ति का स्वरूप से त्याग करने पर ही हम परमार्थ मार्ग में आगे बढ़ सकते हैं परन्तु वास्तव में इनका स्वरूप से त्याग न करके इनमें आसक्ति का त्याग करना ही आवश्यक है। सांख्ययोग में उत्कट वैराग्य के बिना आसाक्ति का त्याग करना कठिन होता है परन्तु कर्मयोग में वैराग्य की कमी होने पर भी केवल दूसरों के लिये कर्म करने से आसक्ति का त्याग सुगमतापूर्वक हो जाता है। गीता ने एकान्त में रहकर साधन करने का भी आदर किया है परन्तु एकान्त में सात्त्विक पुरुष तो साधन-भजन में अपना समय बिताता है पर राजस पुरुष संकल्प-विकल्प में , तामस पुरुष निद्रा-आलस्य-प्रमाद में अपना समय बिताता है जो पतन करनेवाला है। इसलिये साधक की रुचि तो एकान्त की ही रहनी चाहिये अर्थात् सांसारिक कर्मों का त्याग करके पारमार्थिक कार्य करने में ही उसकी प्रवृत्ति रहनी चाहिये परन्तु कर्तव्यरूप से जो कर्म सामने आ जाय उसको वह तत्परतापूर्वक करे। उस कर्म में उसका राग नहीं होना चाहिये। राग न तो जनसमुदाय में होना चाहिये और न अकर्मण्यता में ही। कहीं भी राग न रहने से साधक का बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है। वास्तव में शरीर को एकान्त में ले जाने को ही एकान्त मान लेना भूल है क्योंकि शरीर संसार का ही एक अंश है। अतः शरीर से सम्बन्ध-विच्छेद होना अर्थात् उसमें अहंता-ममता न रहना ही वास्तविक एकान्त है- स्वामी रामसुखदास जी )