अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास
बादरायाणिरुवाच
सा एवमाशंसित उद्धवेन
भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः ।
सभाजयन भृत्यवचो मुकुंद –
स्तमाबभाषे श्रवणीय वीर्यः ।। 1
श्री शुकदेव जी कहते हैं – परीक्षित ! वास्तव में भगवान् की लीला कथा ही श्रवण करने योग्य है । वे ही प्रेम और मुक्ति के दाता हैं । जब उनके परम प्रेमी भक्त उद्धव जी ने प्रार्थना की , तब यदुवंश विभूषण श्री भगवान् ने उनके प्रश्न की प्रशंसा कर के उनसे इस प्रकार कहा ।। 1
श्री भगवानुवाच
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ।। 2
भगवान् श्री कृष्ण ने कहा – देवगुरु वृहस्पति के शिष्य उद्धव जी ! इस संसार में प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते , जो दुर्जनों की कटु वाणी से बिंधे हुए अपने ह्रदय को संभाल सकें।। 2
न तथा तप्यते विद्धः पुमान बाणैः सुमर्मगैः।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां पुरुषेषवः।।3
मनुष्य का ह्रदय मर्म भेदी बाणों से भिड़ने पर भी उतनी पीड़ा का अनुभव नहीं करता , जितनी पीड़ा उसे दुष्ट जनों के मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुंचते हैं ।। 3
कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव ।
तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः ।। 4
उद्धव जी ! इस विषय में महात्मा लोग एक बड़ा पवित्र प्राचीन इतिहास कहा करते हैं , मैं वही तुम्हें सुनाऊँगा , तुम मन लगा कर उसे सुनो ।। 4
केनचिद भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः ।
स्मरता धृति युक्तं विपाकं निजकर्मणां ।। 5
एक भिक्षुक को दुष्टों ने बहुत सताया था । उस समय भी उसने अपना धैर्य न छोड़ा और उसे अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का फल समझ कर कुछ अपने मानसिक उदगार प्रकट किये थे । उन्हीं का इतिहास में वर्णन है ।। 5
अवंतिषु द्विजः कश्चिदासीदाढयतमः श्रिया ।
वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः ।। 6
प्राचीन समय की बात है , उज्जैन में एक ब्राह्मण रहता था । उसने खेती – व्यापार आदि करके बहुत सी धन – संपत्ति इकट्ठी कर ली थी । वः बहुत ही कृपण , कामी और लोभी था । क्रोध तो उसे बात – बात में आ जाया करता था ।। 6
ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्गमात्रेणापि नार्चिताः ।
शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः।। 7
उसने अपने जाति- बंधु और अतिथियों को कभी मीठी बात से भी प्रसन्न नहीं किया , खिलाने – पिलाने की तो बात ही क्या है । वः धर्म – कर्म से रीते ही घर में रहता और स्वयं भी अपनी धन – संपत्ति के द्वारा समय पर अपने शरीर को भी सुखी नहीं करता था ।। 7
दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्र बान्धवाः ।
दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन प्रियं ।। 8
उसकी कृपणता और बुरे स्वभाव के कारण उसके बेटे – बेटी , भाई – बंधु , नौकर – चाकर और पत्नी आदि सभी दुःखी रहते और मन ही मन उसका अनिष्ट चिंतन किया करते थे । कोई भी उसके मन को प्रिय लगने वाला व्यवहार नहीं करता था ।। 8
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः ।
धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पंचभागिनः ।।9
वह लोक – परलोक दोनों से ही गिर गया था । बस यक्षों के समान धन की रखवाली करता रहता था । उस धन से वह न तो धर्म कमाता था और न ही भोग भोगता था । बहुत दिनों तक इस प्रकार जीवन बिताने से उस पर पंच महायज्ञ के भागी देवता बिगड़ उठे ।।
तदवध्यानविस्त्रस्तपुण्यस्कंधस्य भूरिद ।
अर्थो अपया गच्छन्निधनं बह्वायास परिश्रमः ।। 10
उदार उद्धव जी ! पंच महायज्ञ के भागियों के तिरस्कार से उसके पूर्व – पुण्यों का सहारा – जिसके बल से अब तक धन टिका हुआ था – जाता रहा और जिसे बड़े उद्योग और परिश्रम से इकठ्ठा किया था , वह धन उसकी आँखों के सामने ही नष्ट – भ्रष्ट हो गया।। 10
ज्ञातयो जगृहुः किंचित किंचिद दस्यव उद्धव ।
दैवतः कालतः किंचिद ब्रह्म बन्धोर्नृपार्थिवात।। 11
उस नीच ब्राह्मण का कुछ धन तो उसके कुटुम्बियों ने ही छीन लिया , कुछ चोर चुरा ले गए । कुछ आग लग जाने आदि दैवी कोप से नष्ट हो गया , कुछ समय के फेर से मारा गया । कुछ साधारण मनुष्यों ने ले लिया और बच – खुचा कर और दंड के रूप में शासकों ने हड़प लिया ।। 11
स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः ।
उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम ।। 12
उद्धव जी ! इस प्रकार उसकी सारी संपत्ति जाती रही । न तो उसने धर्म ही कमाया और न भोग ही भोगे । इधर उसके सगे – सम्बन्धियों ने भी उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया । अब उसे बड़ी भयानक चिंता ने घेर लिया ।। 12
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः ।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत ।। 13
धन के नाश से उसके ह्रदय में बड़ी जलन हुई । उसका मन खेद से भर गया । आंसुओं के कारण गला रुंध गया । परन्तु इस तरह चिंता करते – करते ही उसके मन में संसार के प्रति महान दुःख बुद्धि और उत्कट वैराग्य का उदय हो गया ।। 13
स चाहेदमहो कष्टम वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृशः।। 14
अब वह ब्राह्मण मन – ही – मन कहने लगा – ‘ हाय ! हाय! बड़े खेद की बात है , मैंने इतने दिनों तक अपने को व्यर्थ ही इस प्रकार सताया । जिस धन के लिए मैंने सरतोड़ परिश्रम किया , वह न तो धर्म – कर्म में लगा और न मेरे सुख भोग के ही काम आया ।। 14
प्रायेणार्थाः कदर्याणां न सुखाय कदाचन ।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च ।। 15
प्रायः देखा जाता है कि कृपण पुरुषों को धन से कभी सुख नहीं मिलता । इस लोक में तो वे धन कमाने और रक्षा की चिंता से जलते रहते हैं और मरने पर धर्म न करने के कारण नरक में जाते हैं ।। 15
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपितान हन्तिश्वितरो रूपमिवेप्सितम ।। 16
जैसे थोड़ा सा भी कोढ़ सर्वांग सुन्दर स्वरूप को बिगाड़ देता है , वैसे ही तनिक सा भी लोभ यशस्वियों के शुद्ध यश और गुणियों के प्रशंसनीय गुणों पर पानी फेर फेता है । । 16
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये ।
नाशोपभोग आयासस्त्रा सश्चिंता भ्रमो नृणाम ।। 17
धन कमाने में , कमा लेने पर उसको बढ़ाने , रखने और खर्च करने में तथा उसके नाश और उपभोग में – जहाँ देखो वहीँ निरंतर परिश्रम , भय , चिंता और भ्रम का ही सामना करना पड़ता है ।। 17
स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।
भेदो वैरम विश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च ।। 18
एते पंचदशानार्था ह्यर्थमूला मता नृणाम ।
तस्मादनर्थमर्थाख्यां श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत।। 19
चोरी , हिंसा , झूठ बोलना , दम्भ , काम , क्रोध , गर्व , अहंकार , भेद बुद्धि , वैर , अविश्वास , स्पर्द्धा , लम्पटता , जुआ और शराब – ये पंद्रह अनर्थ मनुष्यों मे धन के कारण ही माने गए हैं । इसलिए कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि स्वार्थ एवं परमार्थ के विरोधी अर्थनाम धारी अनर्थ को दूर से ही छोड़ दें ।। 18- 19
भिद्यन्ते भ्रातरो दाराः पितरः सुहृदस्तथा।
एकास्निग्धाः काकिणिना सद्यः सर्वेऽरयः कृताः ।। 20
भाई – बंधु , स्त्री – पुत्र , माता – पिता , सगे – सम्बन्धी – जो स्नेह बंधन से बंधकर बिलकुल एक हुए रहते हैं – सब के सब कौड़ी के कारण इतने फट जाते हैं कि तुरंत एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं ।। 20
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम ।। 21
ये लोग थोड़े से धन के लिए भी क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते हैं । बात – की बात में सौहार्द्र सम्बन्ध छोड़ देते हैं , लाग -डाँट रखने लगते हैं और एकाएक प्राण लेने – देने पर उतारू हो जाते हैं । यहाँ तक कि एक – दूसरे का सर्वनाश कर डालते हैं ।। 21
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद द्विजाग्रयताम।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभाम् गतिम् ।। 22
देवताओं के भी प्रार्थनीय मनुष्य जन्म को और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण शरीर प्राप्त कर के जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ – परमार्थ का नाश करते हैं , वे शुभ गति को प्राप्त होते हैं ।। 22
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि।। 23
यह मनुष्य शरीर मोक्ष और स्वर्ग का द्वार है , इसको पाकर भी ऐसा कौन बुद्धिमान मनुष्य है जो अनर्थों के धाम धन के चक्कर में फंसा रहे ।। 23
देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन बंधूंश्च भागिनः ।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः ।। 24
जो मनुष्य देवता , ऋषि , पितर , प्राणी , जाति – भाई , कुटुम्बी और धन के दूसरे भागीदारों को उनका भाग देकर संतुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उसका उपभोग करता है , वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण तो अवश्य ही अधोगति को प्राप्त होता है ।। 24
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं न साधये।। 25
मैं अपने कर्तव्य से च्युत हो गया हूँ । मैंने प्रमाद में अपनी आयु , धन और बल – पौरुष खो दिए । विवेकी लोग जिन साधनों से मोक्ष तक प्राप्त कर लेते हैं , उन्हीं को मैंने धन इकट्ठा करने की व्यर्थ चेष्टा में खो दिया । अब बुढ़ापे में मैं कौन सा साधन करूंगा ।। 25
कस्मात संक्लिश्यते विद्वान व्यर्थयार्थेहयासकृत ।
कस्य चिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः ।। 26
मुझे मालूम नहीं होता कि बड़े – बड़े विद्वान भी धन की व्यर्थ तृष्णा से निरंतर क्यों दुःखी रहते हैं ? हो – न – हो , अवश्य ही यह संसार किसी की संसार किसी की माया से अत्यंत मोहित हो रहा है ।। 26
किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरुत ।
मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः।। 27
यह मनुष्य – शरीर काल के विकराल गाल में पड़ा हुआ है । इसको धन से , धन देने वाले देवताओं और लोगों से , भोग वासनाओं और उनको पूर्ण करने वालों से तथा पुनः – पुनः जन्म – मृत्यु के चक्कर में डालने वाले सकाम कर्मों से लाभ ही क्या है ?27
नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः ।
येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मानः प्लवः ।। 28
इसमें संदेह नहीं कि सर्वदेवस्वरूप भगवान् मुझ पर प्रसन्न हैं । तभी तो उन्होंने मुझे इस दशा में पहुंचाया है और मुझे जगत के प्रति यह दुःख – बुद्धि और वैराग्य दिया है । वस्तुतः वैराग्य ही इस संसार – सागर से पार होने के लिए नौका के समान है ।। 28
सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।
अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात सिद्ध आत्मनि ।। 29
मैं अब ऐसी अवस्था मे पहुंच गया हूँ । यदि मेरी आयु शेष हो तो मैं आत्मलाभ में ही संतुष्ट रहकर अपने परमार्थ के सम्बन्ध में सावधान हो जाऊँगा और अब जो समय बच रहा हूँ , उसमें अपने शरीर को तपस्या के द्वारा सुखा डालूँगा ।। 29
तत्र मामनुमोदेरन देवस्त्रि भुवनेश्वराः।
मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वांगः समसाधयत।। 30
तीनों लोकों के स्वामी देवगन मेरे इस संकल्प का अनुमोदन करें । अभी निराश होने की कोई बात नहीं है , क्योकि राजा खट्वांग ने तो दो घडी में ही भगवद्धाम की प्राप्ति कर ली थी ।। 30
श्री भगवानुवाच
इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः ।
उन्मुच्य ह्रदयग्रन्थीन शान्तो भिक्षुरभून्मुनिः ।।31
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – उद्धव जी ! उस उज्जैन निवासी ब्राह्मण ने मन – ही – मन इस प्रकार निश्चय करके ‘ मैं ‘ और ‘ मेरे ‘ पन की गाँठ खोल दी . इसके बाद वह शांत होकर मौनी सन्यासी हो गया ।। 31
स चचार महिमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः।
भिक्षार्थं नगरग्रामानसंगोऽलक्षितोऽविशत ।। 32
अब उसके चित्त में किसी भी स्थान , वास्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति ना रही । उसने अपने मन , इन्द्रिय और प्राणों को वश में कर लिया । वह पृथ्वी पर स्वच्छंदरुप से विचरने लगा । वह भिक्षा के लिए नगर और गाँवों मे जाता अवश्य था , परन्तु इस प्रकार जाता था कि उसे कोई पहचान न पाता था ।। 32
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः ।
दृष्ट्वा पर्यभवन भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः ।। 33
उद्धव जी ! वह भिक्षुक अवधूत बहुत बूढा हो गया था । दुष्ट उसे देखते ही टूट पड़ते और तरह – तरह से उसका तिरस्कार करके उसे तंग करते ।। 33
केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम।
पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन।। 34
कोई उसका दंड छीन लेता , तो कोई भिक्षा पात्र ही झटक ले जाता । कोई कमण्डलु उठा ले जाता तो कोई आसन , रूद्राक्ष माला और कंथा ही ले के भाग जाता । कोई तो उसकी लंगोटी और वस्त्र को ही इधर – उधर डाल देते ।। 34
प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुनेः।
अन्नं च भैक्ष्य सम्पन्नं भुंजानस्य सरित्तटे।। 35
मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि ।
यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत ।। 36
कोई – कोई वे वस्तुएं दे कर और कोई दिखला – दिखलाकर फिर छीन लेते । जब वह अवधूत मधुकरी ( भिक्षा ) मांगकर लाता और बाहर नदी तट पर भोजन करने बैठता , तो पापी लोग कभी उसके सिर पर मूत्र विसर्जन कर देते तो कभी थूक देते । वे लोग उस मौनी अवधूत को तरह – तरह से बोलने के लिए विवश करते और जब वह इस पर भी ना बोलता तो उसे पीटते ।। 35-36
तरजयंत्यपरे वाग्भिः स्तेनो ऽयमिति वादिनः ।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद बध्यतां बध्यतामिति।। 37
कोई उसे चोर कह कर डांटने – डपटने लगता । कोई कहता ‘ इसे बाँध लो , बाँध लो ‘ और फिर उसे रस्सी से बाँधने लगते ।। 37
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत स्वजनोज्झितः ।। 38
कोई उसका तिरस्कार करके इस प्रकार ताना कसते कि ‘ देखो – देखो , अब इस कृपण ने धर्म का ढोंग रचा है। धन – संपत्ति जाती रही , स्त्री – पुत्रों ने घर से निकाल दिया ; तब इसने भीख माँगने का रोजगार लिया है ।। 38
अहो एष महासारो धृतिमान गिरिराडिव ।
मौनेन साधयत्यर्थं बकवद दृढ़निश्चयः ।। 39
ओहो ! देखो तो सही , यह मोटा – तगड़ा भिखारी धैर्य में बड़े भारी पर्वत के समान है । यह मौन रहकर अपना काम बनाना चाहता है । सचमुच यह बगुले से भी बढ़कर ढोंगी और दृढनिश्चयी है । 39
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयंति च।
तं बबंधुर्निरुरुधुर्यता क्रीडनकं द्विजम ।। 40
कोई उस अवधूत की हंसी उड़ाता , तो कोई उस पर अधोवायु छोड़ देता । जैसे लोग तोता – मैना आदि पालतू पक्षियों को बाँध लेते या पिंजड़े में बंद कर लेते हैं , वैसे ही उसे भी वे लोग बाँध देते और घरों में बंद कर देते ।। 40
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत।
भोक्त व्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ।। 41
किन्तु वह सब कुछ चुपचाप सह लेता । उसे कभी ज्वर आदि के कारण दैहिक पीड़ा सहनी पड़ती , कभी सर्दी – गर्मी आदि से दैवी कष्ट उठाना पड़ता और कभी दुर्जन लोग अपमान आदि के द्वारा उसे भौतिक पीड़ा पहुंचाते ; परन्तु भिक्षुक के मन में इस से कोई विकार नहीं होता । वह समझता कि यह सब मेरे पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है और इसे मुझे अवश्य भोगना पड़ेगा ।। 41
परिभूत इमां गाथामगायत नराधमैः ।
पातयद्भिः स्वधर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम ।। 42
यद्यपि नीच मनुष्य तरह – तरह के तिरस्कार करके उसे उसके धर्म से गिराने की चेष्टा किया करते , फिर भी वह बड़ी दृढ़ता से अपने धर्म में स्थिर रहता सात्त्विक धैर्य का आश्रय लेकर कभी – कभी ऐसे उदगार प्रकट किया करता ।। 42
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदुःखहेतु-
र्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति
संसारचक्रं परिवर्तयेद यत।। 43
ब्राह्मण कहता – मेरे सुख अथवा दुःख का कारण न ये मनुष्य हैं , न देवता हैं , न शरीर है और न ग्रह , कर्म एवं काल आदि ही हैं । श्रुतियाँ और महात्मा जन मन को ही इसका परं कारण बताते हैं और मन ही इस सारे संसार – चक्र को चला रहा ।। 43
मनो गुणान वै सृजते बलीय –
स्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि ।
शुक्लानि कृष्नान्यथ लोहितानि
तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ।। 44
सचमुच यह मन बहुत बलवान है । इसी ने विषयों , उनके कारण गुणों और उनसे सम्बन्ध रखने वाली वृत्तियों की सृष्टि की है । उन वृत्तियों के अनुसार ही सात्त्विक , राजस और तामस – अनेकों प्रकार के कर्म होते हैं और कर्मों के अनुसार ही जीव की गतिविधियां होती हैं ।
अनीह आत्मा मनसा समीहता
हिरण्यमयो मत्सख उद्विचष्टे ।
मनः स्वलिंगं परिगृह्य कामान
जुषन निबद्धो गुणसंगतोऽसौ ।। 45
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च
श्रुतं च कर्माणि च साद व्रतानि ।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः
परो हि योगो मनसः समाधिः ।। 46
दान , अपने धर्म का पालन , नियम , यम, वेदाध्ययन , सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत – इन सबका अंतिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाये , भगवान् में लग जाये । मन का समाहित हो जाना ही परम योग है ।। 46
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं
दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यं ।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद
दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः।। 47
जिसका मन शांत और समाहित है , उसे दान आदि सत्कर्मों का फल प्राप्त हो चुका है । अब उनसे कुछ भी लेना – देना बाकी नहीं है । और जिसका मन चंचल है अथवा आलस्य से अभिभूत हो रहा है , उसको इन दानादि शुभ कर्मों से अब तक कोई लाभ नहीं हुआ है ।। 47
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन स्म देवा
मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो ही देवः सहसः सहीयान
युञ्जयाद वशे तं स हि देवदेवः।। 48
सभी इन्द्रियाँ मन के वश में वश में हैं । मन किसी भी इन्द्रिय के वश में नहीं है । यह मन बलवान से भी बलवान अत्यंत भयंकर देव है । जो इसको अपने वश में कर लेता है , वही देव – देव – इन्द्रियों का विजेता है ।। 48
तं दुर्जयं शत्रुंसह्यवेग –
मरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित ।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्राण्यु
दासीन रिपून विमूढाः ।।49
सचमुच मन बहुत बड़ा शत्रु है । इसका आक्रमण असह्य है । यह बाहरी शरीर को ही नहीं , हृदयादि मर्म स्थानों को भी भेदता रहता है । इसे जीतना बहुत ही कठिन है । मनुष्यों को चाहिए कि सबसे पहले इसी शत्रु पर विजय प्राप्त करे ; परन्तु होता है यह कि मूर्ख लोग इसे तो जीतने का प्रयत्न करते नहीं , दूसरे मनुष्यों से झूठ मूठ झगड़ा – बखेड़ा करते रहते हैं और इस जगत के लोगों को ही मित्र – शत्रु उदासीन बना लेते हैं 49
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा
ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः ।
एषो ऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण
दुरंतपारे तमसि भ्रमन्ति ।। 50
साधारणतः मनुष्यों की बुद्धि अंधी हो रही है । तभी तो वे इस मनः कल्पित शरीर को ‘ मैं ‘ और ‘ मेरा ‘ मान बैठते हैं और फिर इस भ्रम के फंदे में फंस जाते हैं कि ‘ यह मैं हूँ और यह दूसरा । ‘ इसका परिणाम यह होता है कि वे इस अनंत अज्ञानान्धकार में ही भटकते रहते हैं ।। 50
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत
किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत.
जिह्वां क्वचित संदशति स्वदद्भिस्त
द्वेदनायां कतमाय कुप्येत ।। 51
यदि मान लें कि मनुष्य ही सुख – दुःख का कारण है , तो भी उनसे आत्मा का क्या सम्बन्ध ? क्योंकि सुख – दुःख पहुंचाने वाला भी मिटटी का शरीर है और भोगने वाला भी । कभी भोजन आदि के समय यदि अपने दाँतों से ही अपनी जीभ कट जाये और उससे पीड़ा होने लगे , तो मनुष्य किस पर क्रोध करेगा ?
दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु
किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत
यदंगमंगेन निहन्यते क्वचित
क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ।।52
यदि ऐसा मान लें कि देवता ही दुःख के कारण हैं तो भी इस दुःख से आत्मा की क्या हानि ? क्योंकि यदि दुःख के कारण देवता हैं , तो इन्द्रियाभिमानी देवताओं के रूप में उनके भोक्ता भी तो वे ही हैं । और देवता सभी शरीरों में एक हैं ‘ जो देवता एक शरीर में हैं ; वे ही दूसरे में भी हैं । ऐसी दशा में यदि अपने ही शरीर के किसी एक अंग से दूसरे अंग को चोट लग जाये तो भला तो भला , किस पर क्रोध किया जायेगा ? 52
आत्मा यदि स्यात सुखदुःखहेतु
किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः ।
न ह्यात्मनोऽन्यद यदि तन्मृषा स्यात
क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखं ।। 53
यदि ऐसा माने कि आत्मा ही सुख सुख – दुःख का कारण है तो वह तो अपना आप ही है , कोई दूसरा नहीं ; क्योंकि आत्मा से भिन्न कुछ और है ही नहीं । यदि द्वारा कुछ प्रतीत होता है तो वह मिथ्या है । इसलिए न सुख है , न दुःख ; फिर क्रोध कैसा ? क्रोध का निमित्त ही क्या ? 53
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत
किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।
ग्रहैर्गृहस्यैव वदन्ति पीडां
क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ।।54
यदि ग्रहों को सुख – दुःख का निमित्त मानें , तो उनसे भी अजन्मा आत्मा की क्या हानि ? उनका प्रभाव भी जन्म – मृत्यु शील शरीर पर ही होता है । ग्रहों की पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करनेवाले शरीरको ही होती है और आत्मा उन ग्रहों और शरीरों से सर्वथा परे है । तब भला वो किस पर क्रोध करे ? 54
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत
किमात्मनस्तद्धि जडा जडत्वे ।
देहस्त्वचित पुरुषोऽयम सुपर्णः
क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलं ।। 55
यदि कर्मों को ही सुख – दुःख का कारण मानें तो , तो उनसे आत्मा का क्या प्रयोजन ? क्योंकि वे तो एक पदार्थ के जड़ और चेतन – उभयरूप होने पर ही हो सकते हैं । ( जो वास्तु विकारयुक्त और अपना हिताहित जानने वाली होती है , उसी से कर्म हो सकते हैं ; अतः वह विकारयुक्त होने के कारण जड़ होनी चाहिए और हिताहित का ध्यान रखने के कारण चेतन ।) किन्तु देह तो अचेतन है और उसमें पक्षी रूप से रहने वाला आत्मा सर्वथा निर्विकार और साक्षीमात्र है । इस प्रकार कर्मों का तो कोई आधार ही सिद्ध नहीं होता । फिर क्रोध किस पर करें ? 55
कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत
किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत स्यात
क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वं ।।56
यदि ऐसा मानें कि काल ही सुख – दुःख का कारण है , तो आत्मा पर उसका क्या प्रभाव ? क्योंकि काल तो आत्मस्वरूप ही है । जैसे आग आग को नहीं जला सकती और बर्फ बर्फ को नहीं गला सकती, वैसे ही आत्मस्वरूप काल अपने आत्मा को ही सुख – दुःख नहीं पंहुचा सकता । फिर किस पर क्रोध किया जाये ? आत्मा शीत – ऊष्ण, सुख – दुःख आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत है ।56
न केनचित क्वापि कथं चनास्य
द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।
यथाहमः संसृतिरुपिणः स्या-
देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः।। 57
आत्मा प्रकृति के स्वरूप , धर्म , कार्य , लेश , सम्बन्ध और गंध से भी रहित है । उसे कभी कहीं किसी के द्वारा किसी भी प्रकार से द्वंद्व का स्पर्श ही नहीं होता । वह तो जन्म – मृत्यु के चक्र में भटकने वाले अहंकार को ही होता है । जो इस बात को जान लेता है , वह फिर किसी भी भय के निमित्त से भयभीत नहीं होता । । 57
एतां सा आस्थाय परात्म निष्ठा-
मध्यासितां पूर्व तमैर्महर्षिभिः।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं
तमो मुकुन्दांगघ्रिनिषेवयैव ।। 58
बड़े – बड़े प्राचीन ऋषि – मुनियों ने इस परमात्म निष्ठा का आश्रय ग्रहण किया है । मैं भी इसी का आश्रय ग्रहण करूंगा और मुक्ति तथा प्रेम के दाता भगवान् के चरण कमलों कि सेवा के द्वारा ही इस दुरन्त अज्ञान सागर को अनायास ही पार कर लूँगा ।।58
श्री भगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः
प्रव्रज्य गां पयर्टमान इत्थं।
निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-
दकम्पितोऽमुं मुनिराह गाथाम ।। 59
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – उद्धव जी ! उस ब्राह्मण का धन क्या नष्ट हुआ , उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया । अब वह संसार से विरक्त हो गया था और संन्यास लेकर पृथ्वी में स्वच्छंद विचार रहा था । यद्यपि दुष्टों ने उसे बहुत सताया , फिर भी वह अपने धर्म में अटल रहा , तनिक भी विचलित न हुआ ।। उस समय वह मौनी अवधूत मन – ही – मन इस प्रकार का गीत गाया करता था ।। 59
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः ।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः ।। 60
उद्धव जी ! इस संसार में मनुष्य को कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता , यह तो उसके चित्त का भ्रम मात्र है । यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र , उदासीन और शत्रु के भेद अज्ञान कल्पित हैं ।। 60
तस्मात् सर्वात्मना तात निग्रहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान योगसंग्रहः ।। 61
इसलिए प्यारे उद्धव ! अपनी वृत्तियों को मुझमें तन्मय कर दो और इस प्रकार अपनी सारी शक्ति लगाकर मन को वश में कर लो और फिर मुझमें ही नित्यमुक्त होकर स्थित हो जाओ । बस , सारे योगसाधन का इतना ही सार – संग्रह है ।।61
या एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः ।
धार यञ्छ्रा वयञ्छ्रण्वन द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते।। 62
यह भिक्षुक का गीत क्या है , मूर्तिमान ब्रह्मज्ञान – निष्ठा ही है । जो पुरुष एकाग्रचित्त से इसे सुनता , सुनाता और धारण करता है वह कभी सुख – दुःखादि द्वंद्वों के वश में नहीं होता । उनके बीच में भी वह सिंह के समान दहाड़ता रहता है । 63
इति श्रीमदभागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादश स्कन्धे त्रयोविंशो ऽध्यायः ।। 23