uddhav gita

 

 

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अथ विंशोऽध्यायः 

ज्ञानयोग , कर्मयोग और भक्तियोग

 

उद्धव उवाच

विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते ।

अवेक्षतेरविंदाक्ष गुणं दोषं च कर्मणां ।। 1

उद्धव जी ने कहा – कमलनयन श्री कृष्ण ! आप सर्व शक्तिमान हैं । आपकी आज्ञा ही वेद है ; उसमें कुछ कर्मों को करने की विधि है और कुछ के करने का निषेध है । यह विधि – निषेध कर्मों के गुण और दोष की परीक्षा करके ही तो होता है ।। 1

 

वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम।

द्रव्यदेशवयः कालान स्वर्गं नरकमेव च ।। 2

वर्णाश्रम – भेद , प्रतिलोम और अनुलोमरूप वर्णसंकर, कर्मों के उपयुक्त और अनुपयुक्त द्रव्य , देश , आयु और काल तथा स्वर्ग और नरक के भेदों का बोध भी वेदों से ही होता है ।। 2

 

गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव।

निःश्रेयसः कथं नृणां निषेधविधिलक्षणम ।। 3

इसमें संदेह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है , परन्तु उसमें विधि – निषेध ही तो भरा पड़ा है । यदि उसमें गुण और दोष में भेद करने वाली दृष्टि न हो , तो वह प्राणियों का कल्याण करने में समर्थ ही कैसे हो ? 3

 

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुस्तवेश्वर।

श्रेयस्त्वनुपलब्धेर्थे साध्यसाधनयोरपि ।। 4

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ! आपकी वाणी वेद ही पितर , देवता और मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ मार्ग – दर्शक का काम करता है ; क्योंकि उसी के द्वारा स्वर्ग – मोक्ष आदि अदृष्ट वस्तुओं का बोध होता है और इस लोक में भी किसका कौन सा साध्य है और क्या साधन – इसका निर्णय भी उसी से होता है ।। 4

 

गुणदोषभिदा दृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः ।

निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रमः ।। 5

प्रभो ! इसमें संदेह नहीं कि गुण और दोषों में भेद दृष्टि आपकी वाणी वेद के ही अनुसार है , किसी की अपनी कल्पना नहीं ; परन्तु प्रश्न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेद का निषेध भी करती है । यह विरोध देख कर मुझे भ्रम हो रहा है । आप कृपा कर के मेरा यह भ्रम मिटाइये ।। 5

 

श्री भगवानुवाच

योगास्त्रायो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया ।

ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायो न्योऽस्ति कुत्रचित ।। 6

भगवान श्री कृष्ण ने कहा – प्रिय उद्धव ! मैंने ही वेदों में एवं अन्यत्र भी मनुष्यों का कल्याण करने के लिए आधिकारिक भेद से तीन प्रकार के योगों का उपदेश किया है । वे हैं – ज्ञान , कर्म और भक्ति । मनुष्य के परम कल्याण के लिए इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है ।। 6

 

निर्विण्णानां ज्ञान योगो न्यासिनामिह कर्मसु ।

तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम ।। 7

उद्धव जी ! जो लोग कर्मों तथा उनके फलों से विरक्त हो गए हैं और उनका त्याग कर चुके हैं , वे ज्ञान योग के अधिकारी हैं । इसके विपरीत जिनके चित्त में कर्मों और उनके फलों से वैराग्य नहीं हुआ है , उनमें दुःख बुद्धि नहीं हुई है , वे सकाम व्यक्ति कर्म योग के अधिकारी हैं ।। 7

 

यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यह पुमान ।

न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोस्य ।।8

जो पुरुष न तो अत्यंत विरक्त हैं और न अत्यंत आसक्त ही हैं तथा किसी पूर्व जन्म के शुभ कर्म से सौभाग्यवश मेरी लीला- कथा आदि में उसकी श्रद्धा हो गयी है , वह भक्तियोग का अधिकारी है । उसे भक्तियोग के द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है ।। 8

 

तावत कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।

मत्कथा श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।। 9

कर्म के सम्बन्ध में जितने भी विधि निषेध हैं , उनके अनुसार तभी तक कर्म करना चाहिए जब तक कर्ममय जगत और उस से प्राप्त होने वाले स्वर्गादि सुखों से वैराग्य न हो जाये अथवा जब तक मेरी लीला – कथा के श्रवण – कीर्तन आदि में श्रद्धा न हो जाये ।। 9

 

स्वधर्मस्थो यजन यज्ञैरनाशीः काम उद्धव ।

न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत ।। 10

उद्धव ! इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में स्थित रहकर यज्ञों के द्वारा बिना किसी आशा और कामना के मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मों से दूर रह कर केवल विहित कर्मों का ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरक में नहीं जाना पड़ता ।। 10

 

अस्मिंल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोनघः शुचिः ।

ज्ञानं विशुद्ध माप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया ।। 11

अपने धर्म में निष्ठा रखने वाला पुरुष इस शरीर में रहते – रहते ही निषिद्ध कर्म का परित्याग कर देता है और रागादि मलों से भी मुक्त – पवित्र हो जाता है । इसी से अनायास ही उसे आत्मसाक्षात्कार रूप विशुद्ध तत्त्व ज्ञान अथवा द्रुत – चित्त होने पर मेरी भक्ति प्राप्त होती है ।। 11

 

स्वर्गिणोप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा ।

साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकं ।। 12

न नरः स्वर्गतिं कान्क्षेन्नारकीम व विचक्षणः।

नेमम लोकं च कांक्षेत देहावेशात प्रमाद्यति ।। 13

यह विधि – निषेध रूप कर्म का अधिकारी मनुष्य – शरीर बहुत ही दुर्लभ है । स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकों में रहने वाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं ; क्योंकि इसी शरीर अन्तःकरण की शुद्धि होने पर ज्ञान अथवा भक्ति की प्राप्ति हो सकती है , स्वर्ग अथवा नरक का भोग प्रधान शरीर किसी भी साधन के उपयुक्त नहीं है । बुद्धिमान पुरुष को न तो स्वर्ग की अभिलाषा करनी चाहिए और न नरक की ही । और तो क्या , इस मनुष्य – शरीर की भी कामना नहीं करनी चाहिए ; क्योंकि किसी भी शरीर में गुण बुद्धि और अभिमान हो जाने से अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति के साधन में प्रमाद होने लगता है ।। 12- 13

 

एतद विद्वान पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः।

अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम ।। 14

यद्यपि यह मनुष्य – शरीर है तो मृत्युग्रस्त ही , परन्तु इसके द्वारा परमार्थ की – सत्य वस्तु की प्राप्ति हो सकती है । बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि यह बात जानकर मृत्यु होने के पूर्व ही सावधान हो कर ऐसी साधना कर ले , जिस से वह जन्म – मृत्यु के चक्कर से सदा के लिए छूट जाये – मुक्त हो जाये ।। 14

 

छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडम वनस्पतिम ।

खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलंपटः।। 15

यह शरीर एक वृक्ष है । इसमें घोंसला बनाकर जीवरूप पक्षी निवास करता है  । इसे यमराज के दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं । जैसे पक्षी कटते हुए वृक्ष को छोड़ कर उड़ जाता है , वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीर को छोड़ कर मोक्ष का भागी बन जाता है । परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है । 15

 

अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः ।

मुक्तसंगः परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ।। 16

प्रिय उद्धव ! ये दिन और रात क्षण – क्षण में शरीर की आयु को क्षीण कर रहे हैं । यह जान कर जो भय से काँप उठता है , वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परम तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन – मरण से निरपेक्ष होकर अपने आत्मा में ही शांत हो जाता है ।

 

नृदेहमाद्यम सुलभं सुदुर्लभं

प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम।

मयानुकूलेन नभस्वतेरितम

पुमान भवाब्धिं न तरेत स आत्महा ।। 17

यह मनुष्य शरीर समस्त शुभ फलों की प्राप्ति का मूल है और अत्यंत दुर्लभ होने पर भी अनायास सुलभ हो गया है । इस संसार – सागर से पार जाने के लिए यह एक सुदृढ़ नौका है । शरण ग्रहण मात्र से ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं और स्मरण मात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ । इतनी सुविधा होने पर भी जो इस शरीर के द्वारा संसार सागर से पार नहीं हो जाता , वह तो अपने हाथों अपने आत्मा का हनन – अधः पतन कर रहा है । 17

 

यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः ।

अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः ।। 18

प्रिय उद्धव ! जब पुरुष दोष दर्शन के कारण कर्मों से उद्विग्न और विरक्त हो जाये , तब जितेन्द्रिय होकर वह योग में स्थित हो जाये और अभ्यास – आत्मानुसन्धान के द्वारा अपना मन मुझ परमात्मा में निश्छल रूप से धारण करे ।। 18

 

धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम 

अतन्द्रितो ऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत ।। 19

जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर – उधर भटकने लगे , तब झटपट बड़ी सावधानी से उसे मनाकर , समझा – बुझाकर , फुसलाकर अपने वश में कर ले । 19

 

मनोगतिं न विसृजेज्जीत प्राणो जितेन्द्रियः ।

सत्त्वसम्पन्नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत ।। 20

इन्द्रियों और प्राणों को अपने वश में रखे और मन को एक क्षण के लिए भी स्वतन्त्र न छोड़े । उसकी एक – एक चाल , एक – एक हरकत को देखता रहे । इस प्रकार सत्त्व संपंन्न बुद्धि के द्वारा धीरे – धीरे मन को अपने वश में कर लेना चाहिए ।। 20

 

एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः ।

हृदयज्ञ मन्विच्छन दमयस्येवावर्तो मुहुः ।। 21

जैसे सवार घोड़े को अपने वश में करते समय उसे अपने मनो – भाव की पहचान कराता रहता है – अपनी इच्छा के अनुसार उसे चलाना चाहना है और बार – बार फुसलाकर उसे अपने वश में कर लेता है , वैसे ही मन को फुसलाकर , उसे मीठी – मीठी बातें सुनाकर वश में कर लेना भी परम योग है ।

 

सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः ।

भवाप्य यावनुध्या येन्मनो यावत् प्रसीदति ।। 22

सांख्य शास्त्र में प्रकृति से लेकर शरीरपर्यंत सृष्टि का जो क्रम बतलाया गया है , उसके अनुसार सृष्टि – चिंतन करना चाहिए और जिस क्रम से शरीर आदि का प्रकृति में लय बताया गया है , उस प्रकार लय चिंतन करना चाहिए । यह क्रम तब तक जारी रखना चाहिए , जब तक मन शांत – स्थिर न हो जाये ।। 22

 

निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः ।

मंस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिंत्या ।। 23

जो पुरुष संसार से विरक्त हो गया है और जिसे संसार के पदार्थों में दुःख – बुद्धि हो गयी है , वह अपने गुरुजनों के उपदेश को भली भांति समझ कर बार – बार अपने स्वरूप के चिंतन में संलग्न रहता है । इस अभ्यास से बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चंचलता , जो अनात्मा शरीर आदि में आत्म बुद्धि करने से हुई है , छोड़ देता है । । 23

 

यमादिभिर्योग पथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया ।

मामार्चोपासनाभिर्वा नान्यैरयोग्यं स्मरेन्मनः ।। 24

यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि आदि योगमार्गों से वस्तु तत्त्व का निरीक्षण – परीक्षण करने वाली आत्म विद्या से तथा मेरी प्रतिमा की उपासना से – अर्थात कर्म योग , ज्ञान योग और भक्ति योग से मन परमात्मा का चिंतन करने लगता है ; और कोई उपाय नहीं है । 24

 

यदि कुर्यात प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम ।

योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ।। 25

उद्धव जी ! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं ; परन्तु यदि कभी उस से प्रमादवश कोई अपराध बन जाये तो योग के द्वारा ही उस पाप को जला डाले , कृच्छ्र चांद्रायण आदि दूसरे प्राश्चित कभी न करे । 25

 

स्वे स्वे ऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।

कर्मणां जात्य शुद्धा नामनेन नियमः कृतः ।

गुणदोष विधानेन संगानां त्याजनेच्छया।। 26

अपने – अपने अधिकार में जो निष्ठा है , वही गुण कहा गया है । इस गुण – दोष और विधि – निषेध के विधान से यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्ति का परित्याग हो जाये ; क्योंकि कर्म तो जन्म से ही अशुद्ध हैं , अनर्थ के मूल हैं । शास्त्र का तात्पर्य उनका नियंत्रण , नियम ही है । जहाँ तक हो सके प्रवृत्ति का संकोच ही करना चाहिए ।। 26

 

जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु  ।

वेद दुःखात्मकान कामान परित्यागे अप्यनीश्वरः ।। 27

ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढ़निश्चयः ।

जुषमाणश्च तान कामान दुःखोदकार्मंश्च गर्हयन।। 28

जो साधक समस्त कर्मों से विरक्त हो गया हो , उनमे दुःख बुद्धि रखता हो, मेरी लीला – कथा के प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोग वासनाएं दुःख रूप हैं , किन्तु इतना सब जान कर भी जो उनके परित्याग में समर्थ न हो , उसे चाहिए कि उन भोगों को तो भोग ले ; परन्तु उन्हें सच्चे ह्रदय से दुःखजनक समझे और मन – ही – मन उनकी निंदा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य समझे । साथ ही इस दुविधा कि स्थिति से छुटकारा पाने के लिए श्रद्धा , दृढ निश्चय और प्रेम से मेरा भजन करे । 27- 28

 

प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मास कृन्मुनेः।

कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते।।29

इस प्रकार मेरे बतलाये हुए भक्तियोग के द्वारा निरंतर मेरा भजन करने से मैं उस साधक के ह्रदय में आकर बैठ जाता हूँ और विराजमान होते ही उसके ह्रदय की सारी वासनाएं अपने संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती हैं।29

 

भिद्यते ह्रदय ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टे अखिलात्मनि ।। 30

इस तरह जब उसे मुझ सर्वात्मा का साक्षात्कार हो जाता हैं , तब तो उसके ह्रदय की गाँठ टूट जाती हैं , उसके सरे संशय छिन्न -भिन्न हो जाते हैं और कर्म – वासनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं ।। 30

 

तस्मान्मद्भक्ति युक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।

न ज्ञानम् न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह।।31

इसी से जो योगी मेरी भक्ति से युक्त और मेरे चिंतन में मग्न रहता है , उसके लिए ज्ञान और वैराग्य की आवश्यकता नहीं होती । उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्ति के द्वारा ही हो जाता है ।। 31

 

यत कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञान वैराग्यतश्च यत  ।

योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरि तरैरपि ।। 32

सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा ।

स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद यदि वाञ्छति ।। 33

कर्म , तपस्या, ज्ञान , वैराग्य , योगाभ्यास , दान , धर्म और दूसरे कल्याण साधनों से जो कुछ स्वर्ग , अपवर्ग , मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है , वह सब मेरा भक्त मेरे भक्ति योग के प्रभाव से ही , यदि चाहे तो , अनायास ही प्राप्त कर लेता है ।। 32-33

 

न किंचित साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम ।

वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यं पुनर्भवम ।। 34

मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं ; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओं की तो बात ही क्या – वे कैवल्य मोक्ष भी नहीं लेना चाहते ।। 34

 

निर्पेक्ष्यं परं प्राहुरनिः श्रेयसमनल्पकम।

तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य में भवेत् ।। 35

उद्धव जी ! सबसे श्रेष्ठ एवं महान निः श्रेयस ( परम कल्याण ) तो निरपेक्षता ही दूसरा नाम है । इसलिए जो निरपेक्ष और निष्काम होता है , उसी को मेरी भक्ति प्राप्त होता है । 35

 

न मय्येकान्तभक्तानां गुण दोषोद्भवा गुणाः।

साधूनां समचित्तानाम बुद्धेः परमुपेयुषां।। 36

मेरे अनन्य प्रेमी भक्तों का और उन समदर्शी महात्माओं का ; जो बुद्धि से अतीत परम तत्त्व को प्राप्त हो चुके हैं , इन विधि और निषेध से होने वाले पुण्य और पाप से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता ।। 36

 

एवमेतान मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः।

क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानम यद् ब्रह्म परमं विदुः ।। 37

इस प्रकार जो लोग मेरे बतलाए हुए इन ज्ञान , भक्ति और कर्म मार्गों का आश्रय लेते हैं , वे मेरे परम कल्याण – स्वरूप धाम को प्राप्त होते हैं , क्योंकि वे परब्रह्मतत्त्व  को जान लेते हैं ।। 37

 

इति श्रीमदभागवतेमहापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेदशस्कन्धे विंशोध्यायः ।। 20

 

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