The Bhagavad Gita Chapter 18

 

 

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मोक्षसंन्यासयोग-  अठारहवाँ अध्याय

फल सहित वर्ण धर्म का विषय

 

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।18.43।।

 

शौयम्-शौर्य; तेजः-शक्ति; धृतिः-धैर्य; दाक्ष्यम् युद्धे-रण कौशल; च -और; अपि-भी; अपलायनम्-विमुख न होना; दानम्-उदार हृदय; ईश्वर-नेतृत्व; भावः-गुणः च-और; क्षात्रम् – योद्धा और शासक वर्ग; कर्म-कार्य; स्वभावजम्-स्वभाव से उत्पन्न गुण।

 

शूरवीरता , शौर्य, शक्ति, तेज , धैर्य, रण कौशल, युद्ध से पलायन न करने का संकल्प अथवा युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान देने में उदारता, नेतृत्व क्षमता, दक्षता, प्रजा के संचालन आदि की विशेष चतुरता-ये सब क्षत्रियों के कार्य के स्वाभाविक गुण या कर्म हैं।।18.43।।

 

शौर्यम् – मन में अपने धर्म का पालन करने की तत्परता हो , धर्ममय युद्ध (टिप्पणी प0 928) प्राप्त होने पर , युद्ध में चोट लगने , अङ्ग कट जाने , मर जाने आदि का किञ्चिन्मात्र भी भय न हो , घाव होने पर भी मन में प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटने पर भी पहले जैसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाता रहे इसका नाम शौर्य है। तेजः – जिस प्रभाव या शक्ति के सामने पापी-दुराचारी मनुष्य भी पाप , दुराचार करने में हिचकते हैं जिसके सामने लोगों की मर्यादाविरुद्ध चलने की हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादा में चलते हैं उसका नाम तेज है। धृतिः – विपरीत से विपरीत अवस्था में भी अपने धर्म से विचलित न होने और शत्रुओं के द्वारा धर्म तथा नीति से विरुद्ध अनुचित व्यवहार से सताये जाने पर भी धर्म तथा नीतिविरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादा में चलने का नाम धृति है।दाक्ष्यम् – प्रजा पर शासन करने की , प्रजा को यथायोग्य व्यवस्थित रखने की और उसका संचालन करने की विशेष योग्यता , चतुराई का नाम दाक्ष्य है। युद्धे चाप्यपलायनम् – युद्ध में कभी पीठ न दिखाना , मन में कभी हार स्वीकार न करना , युद्ध छोड़कर कभी न भागना – यह युद्धमें अपलायन है। दानम् – क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देने में कमी नहीं रखते , बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमान में दान-पुण्य करने का स्वभाव वैश्यों में देखने में आता है परन्तु वैश्य लोग देने में कसाकसी करते हैं अर्थात् इतने से ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय ? ऐसा द्रव्य का लोभ उनमें रहता है। द्रव्य का लोभ रहने से धर्म का पालन करने में बाधा आ जाती है , कमी आ जाती है जिससे सात्त्विक दान (गीता 17। 20) देने में कठिनता पड़ती है परन्तु क्षत्रियों में दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ दान शब्द क्षत्रियों के स्वभावमें आया है। ईश्वरभावश्च – क्षत्रियों में स्वाभाविक ही शासन करने की प्रवृत्ति होती है। लोगों के नीति , धर्म और मर्यादाविरुद्ध आचरण देखने पर उनके मन में स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहें हैं और उनको नीति , धर्म के अनुसार चलाने की इच्छा होती है। अपने शासन द्वारा सबको अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार चलाने का भाव रहता है। इस ईश्वरभाव में अभिमान नहीं होता क्योंकि क्षत्रियजाति में नम्रता , सरलता आदि गुण देखने में आते हैं। क्षात्रं कर्म स्वभावजम् – जो मात्र प्रजा की दुःखों से रक्षा करे उसका नाम क्षत्रिय है – क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। उस क्षत्रिय के जो स्वाभाविक कर्म हैं वे क्षात्रकर्म कहलाते हैं। अब वैश्य और शूद्र के स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

 

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